उष्णकटिबंधीय क्षेत्रों के गर्म और निचले स्थानों में रहने वाले कीट अत्यधिक गर्मी में भी जीवित रहने की क्षमता के लिए जाने जाते हैं। लेकिन एक बड़े अंतर्राष्ट्रीय अध्ययन से पता चला है कि इनमें से कई कीट पहले ही अपनी सहनशक्ति के तापमान की सीमा के करीब रह रहे हैं। ऐसे में अगर पृथ्वी का तापमान और बढ़ता है, तो इन प्रजातियों के लिए बड़ा खतरा पैदा हो सकता है। नेचर पत्रिका में प्रकाशित इस शोध में यह देखा गया कि अलग-अलग कीट प्रजातियां गर्मी पर किस तरह प्रतिक्रिया देती हैं ताकि यह समझा जा सके कि जलवायु परिवर्तन उष्णकटिबंधीय क्षेत्रों में कीटों की विविधता को कैसे प्रभावित कर सकता है। 
गौरतलब है कि स्तनधारियों के विपरीत, कीट अपने शरीर का तापमान खुद नियंत्रित नहीं कर सकते। उनके शरीर का तापमान लगभग पूरी तरह आसपास के वातावरण पर निर्भर करता है। इसलिए अधिक गर्मी से बचने के लिए वे छांव में चले जाना, मिट्टी में दुबक जाना या ठंडक के समय में ही सक्रिय रहना जैसे तरीके अपनाते हैं। उनके शरीर में कुछ खास प्रकार के प्रोटीन भी बनते हैं, जो अधिक तापमान से कोशिकाओं को नुकसान से बचाने में मदद करते हैं। इन्हें ‘हीट शॉक प्रोटीन’ कहा जाता है। लेकिन इस सुरक्षा की भी एक सीमा है। जब तापमान एक हद से ऊपर चला जाता है, तो कीट हिलना-डुलना बंद कर देते हैं और अंतत: मर जाते हैं।
कीटों की अधिकतम ऊष्मा-सहनशीलता सीमा को समझने के लिए वैज्ञानिकों ने लगभग 2300 प्रजातियों पर एक बड़ा फील्ड अध्ययन किया। यह काम पर्यावरण वैज्ञानिक किम ली होल्ज़मैन के शोध से शुरू हुआ था। उन्होंने पेरू के एंडीज़ पर्वत क्षेत्र में अलग-अलग ऊंचाइयों से कई मौसमों के दौरान कीट इकट्ठा किए। हर कीट को एक छोटी ट्यूब में रखकर धीरे-धीरे बढ़ती गर्मी के संपर्क में लाया गया। वैज्ञानिक यह देखते रहे कि किस तापमान पर कीट हिलना-डुलना बंद कर देता है, क्योंकि यही उसकी गर्मी सहने की अधिकतम सीमा मानी जाती है। बाद में इसी तरह का प्रयोग केन्या के एक अन्य उष्णकटिबंधीय पर्वतीय क्षेत्र में भी किया गया।
अध्ययन से पता चला कि गर्म और निचले इलाकों में रहने वाले कीट आम तौर पर ठंडे और ऊंचे इलाकों के कीटों की तुलना में ज़्यादा तापमान सहन कर सकते हैं। लेकिन इसके साथ एक बड़ी समस्या भी है। निचले इलाकों का वातावरण पहले ही उस अधिकतम तापमान के बहुत निकट है, जिसे वहां रहने वाले कीट सह सकते हैं। इसलिए अगर तापमान थोड़ा भी बढ़ता है, तो वे जल्दी ही अपनी सहनशीलता की सीमा पार कर सकते हैं।
अध्ययन में यह भी पाया गया कि अलग-अलग कीट समूहों की गर्मी सहने की क्षमता अलग होती है। उदाहरण के लिए, मक्खियां सबसे ज़्यादा संवेदनशील हैं और औसतन लगभग 39 डिग्री सेल्सियस पर ही उनकी गतिविधि रुकने लगती है। भृंग (बीटल) थोड़े मज़बूत होते हैं और करीब 41 डिग्री सेल्सियस तक गर्मी सह सकते हैं। मधुमक्खियां और अन्य कॉलोनी बनाकर रहने वाले कीट इससे थोड़ी अधिक गर्मी झेल सकते हैं। टिड्डे और उनसे मिलती-जुलती प्रजातियां सबसे ज़्यादा सहनशील पाई गईं, जो लगभग 44 डिग्री सेल्सियस तक का तापमान सह सकती हैं।
इन समूहों के अंतर को समझने के लिए वैज्ञानिकों ने सैकड़ों कीट प्रजातियों के जेनेटिक डैटा का अध्ययन किया। कंप्यूटर मॉडल की मदद से उन्होंने देखा कि कीटों के शरीर में मौजूद हीट शॉक प्रोटीन की संरचना किस तापमान पर बिखरने लगती है। नतीजे प्रयोगों से मिले परिणामों से मेल खाते थे; जिन प्रजातियों के प्रोटीन अधिक स्थिर थे, वे अधिक गर्मी सहन कर पाए। इससे संकेत मिलता है कि गर्मी सहने की यह सीमा कीटों की जैविक बनावट से जुड़ी है। और जैविक बनावट सहस्राब्दियों में बदलती है। अर्थात इन कीट प्रजातियों की स्थिति कमोबेश स्थिर रहेगी।
यह अध्ययन चिंताजनक है। जलवायु मॉडल बताते हैं कि इस सदी के अंत तक उष्णकटिबंधीय क्षेत्रों का तापमान इतना बढ़ सकता है कि लगभग आधी कीट आबादियां कुछ घंटों तक भविष्य की गर्मी झेलने के बाद बेहोशी जैसी स्थिति में पहुंच सकती हैं। वैज्ञानिकों का कहना है कि इतनी चरम स्थिति आने से पहले ही कीटों की संख्या घटने लग सकती है, क्योंकि लंबे समय तक गर्मी का दबाव उनके जीवित रहने और प्रजनन की क्षमता को कम कर देता है।
कीट पर्यावरण में बहुत महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। परागण, जैविक कचरे का विघटन करके वे खाद्य संजाल का एक ज़रूरी हिस्सा होते हैं। अगर उनकी संख्या घटती है, तो इसका असर पूरे पारिस्थितिकी तंत्र पर पड़ सकता है। शोधकर्ता कहते हैं कि यह पूरी तरह स्पष्ट नहीं है कि उष्णकटिबंधीय कीट बदलते मौसम के साथ कैसे तालमेल बिठाएंगे। लेकिन अध्ययन दर्शाता है कि दुनिया के सबसे गर्म इलाकों में तापमान में थोड़ी-सी बढ़ोतरी भी कई कीट प्रजातियों की सहनशीलता को परास्त कर सकती है। (स्रोत फीचर्स)
-
Srote - May 2026
- जलवायु परिवर्तन और पौधों का जल्दी फूलना
- जलवायु परिवर्तन, अंतर्राष्ट्रीय तनाव और बढ़ता जल संकट
- बढ़ती गर्मी से कीटों पर बढ़ता संकट
- तेहरान में ‘ब्लैक रेन’ से बढ़ा स्वास्थ्य संकट
- समुद्र की गहराइयों में ऑक्सीजन कैसे आई
- चंद्रमा के प्राचीन चुंबकीय क्षेत्र का रहस्य
- पृथ्वी पर ‘आज़माइशी’ जीवन की खोज
- कोशिकाओं के अनजाने-अनसमझे उपांग को काम पर लगाया
- एक छोटे से पौधे के साथ जीव विज्ञान में चहलकदमी
- कुछ लोगों को ठंड कम क्यों लगती है?
- एक गिलास दूध और एक छोटा-सा एंज़ाइम
- गाजर के डंठल-छिलकों से खाद्य सामग्री का निर्माण
- विश्वास, उम्मीद और अच्छी सेहत का जीवविज्ञान
- क्या ‘विज्ञान-समर्थित’ सप्लीमेंट्स सच में भरोसेमंद हैं?
- क्यों आती है चिपकू टेप से चर्रर्रर्रररर की आवाज़
- जेलीफिश मनुष्यों के समान सोती है
- उड़ते समय भौंरे खुद को ठंडा कैसे रखते हैं?
- प्राचीन ग्रीक पुजारिनें अनुष्ठान पेय कैसे बनाती थीं
- खुशबू से ठगने वाले बीटल्स
