प्रशांत महासागर में 4000 मीटर की गहराई पर ऑक्सीजन की खोज की सबसे पहली खबर 2024 में नेचर जियोसाइन्स जर्नल में प्रकाशित हुई थी। यह खोज ए. स्वीटमैन की टीम ने की थी। इसके साथ ही वैज्ञानिकों के बीच गहमागहमी शुरू हो गई। कारण यह था कि इतनी गहराई पर ऑक्सीजन का पाया जाना एक रहस्य जैसा था क्योंकि वहां सूरज की रोशनी तो पहुंचती नहीं जो प्रकाश संश्लेषण की क्रिया को ऊर्जा दे सके। गौरतलब है कि धरती पर ऑक्सीजन मूलत: पेड़-पौधों द्वारा सूरज के प्रकाश की उपस्थिति में सम्पन्न प्रकाश संश्लेषण की प्रक्रिया से ही पैदा होती है। लिहाज़ा, यह सवाल स्वाभाविक है कि इतनी गहराई के अंधकार में कौन-सी प्रक्रिया ऑक्सीजन उत्पादन को अंजाम दे रही है।  

         समंदर के पेंदे में धातुओं से बनी डल्लियां

अब वैज्ञानिक समुद्र की गहराई में और प्रयोगशाला में समुद्री गहराई की परिस्थितियां निर्मित करके इस सवाल का जवाब पाने की कोशिश करेंगे। इसके लिए वैज्ञानिक एक शोध जहाज़ नौटिलस पर सवार होकर हवाई और मेक्सिको के बीच स्थित क्लेरियन-क्लिपरटन क्षेत्र में जाएंगे जहां पहली खोज की गई थी और समुद्र में कुछ खोजी यंत्र उतारकर नमूने एकत्रित करेंगे और वहां कई चीज़ों का मापन भी करेंगे। 
ये खोजी यंत्र पानी की अम्लीयता का मापन करेंगे। यदि अम्लीयता अधिक मिलती है तो कहा जा सकेगा कि वहां हाइड्रोजन की उपस्थिति बहुत ज़्यादा है अर्थात वहां पानी के अणु टूट रहे हैं।
मूल अध्ययन के दौरान ऑक्सीजन उस क्षेत्र में मिली थी जहां कई धातुओं से बनी डल्लियां (जैसी बड़ी होती हैं) मिली थीं। इनमें मैंगनीज़ और कोबाल्ट जैसी मूल्यवान धातुएं भी पाई गई थीं। ये डल्लियां वहां करोड़ों साल पहले बनी होंगी। वैज्ञानिकों ने इसके आधार पर अनुमान लगाया था कि शायद यही धातुएं पानी के विघटन को उत्प्रेरित कर रही हैं – लगभग उसी तरह जैसे प्रयोगशाला में पानी के विद्युत विच्छेदन से हाइड्रोजन और ऑक्सीजन बनती है। यह एक संभावना मात्र है। यह भी हो सकता है कि वहां मौजूद सूक्ष्मजीव यह ऑक्सीजन बना रहे हों। मौजूदा खोजबीन इन दो संभावनाओं के बीच निर्णय करने का प्रयास है। इसके लिए कई कसौटियों पर आधारित मापन ज़रूरी है और खोजी यंत्रों पर तमाम किस्म के उपकरण लगाए गए हैं। (स्रोत फीचर्स)