कल्पना कीजिए, रात का खाना खत्म हुआ और सामने एक गिलास दूध हाज़िर हो गया। कुछ लोगों के लिए यह एक सुखद आदत है। लेकिन कुछ लोगों के पेट में दूध पहुंचते ही एक अजीब हलचल शुरू हो जाती है - गैस बनना, मरोड़ उठना, पेट फूलना और कभी-कभी दस्त भी लग जाते हैं। क्या इसके पीछे दूध दोषी है? या हमारे भीतर कुछ ऐसा है जो बदल चुका है, चुपके से, बिना बताए! 
यह कहानी है लैक्टोज़ असहिष्णुता की। एक ऐसी अवस्था जिसे अक्सर ‘दूध से एलर्जी' समझ लिया जाता है। लेकिन यह वास्तव में पाचन के जैव रसायन की एक बेहद रोचक और जैव विकास सम्बंधी गाथा है।
लैक्टोज़ क्या है?
दूध को संपूर्ण आहार कहा जाता है, और इसका एक बड़ा कारण है उसमें मौजूद शर्करा, जिसे हम लैक्टोज़ कहते हैं। रासायनिक दृष्टि से यह एक डाईसेकराइड है, यानी दो सरल शर्करा अणुओं से मिलकर बना अणु। देखा जाए तो, साधारण शकर (सुक्रोज़) भी एक डाईसेकराइड होती है और ग्लूकोज़ तथा फ्रक्टोज़ के अणुओं के जुड़ने से बनती है: शकर = ग्लूकोज़ + फ्रक्टोज़
इसी प्रकार से दूध में उपस्थित शर्करा (लैक्टोज़) भी दो शर्करा अणुओं से जुड़कर बनी होती है: लैक्टोज़ = ग्लूकोज़ + गैलेक्टोज़
जब हम दूध पीते हैं तो आंतों में लैक्टोज़ टूटकर ग्लूकोज़ और गैलेक्टोज़ बन जाते हैं। असहिष्णुता की कहानी यहीं से शुरू होती है।
लैक्टोज़ पाचन की दिक्कत 
हमारी छोटी आंत की भीतरी सतह पर असंख्य सूक्ष्म उंगली-नुमा संरचनाएं होती हैं जिन्हें विलाई कहते हैं। इन्हीं विलाई पर एक विशेष एंज़ाइम काम करता है लैक्टेज़। लैक्टेज़ ही वह सूक्ष्म रसायन है जिस पर दूध, खासकर लैक्टोज़, पचाने की पूरी ज़िम्मेदारी टिकी है।
लैक्टेज़ दरअसल लैक्टोज़ के दोनों अणुओं के बीच की रासायनिक कड़ी को तोड़ता है, जिससे ग्लूकोज़ और गैलेक्टोज़ अलग-अलग हो जाते हैं। ये दोनों सरल शर्कराएं आसानी से रक्तप्रवाह में अवशोषित होकर शरीर को ऊर्जा देती हैं।
यदि लैक्टेज़ पर्याप्त मात्रा में है तो लैक्टोज़ टूटता है, दूध पचता है, ऊर्जा मिलती है, सब सुचारू चलता है। यदि लैक्टेज़ पर्याप्त मात्रा में नहीं है तो कहानी बदल जाती है।
अपचित लैक्टोज़ जब छोटी आंत से आगे बड़ी आंत में पहुंचता है, तो वहां रहने वाले अरबों जीवाणु, जिन्हें सामूहिक रूप से आंतों का माइक्रोबायोटा कहते हैं, इसे अपने भोजन के रूप में ‘किण्वित' करने लगते हैं।
यह किण्वन क्रिया कई उत्पाद बनाती है - हाइड्रोजन गैस, कार्बन डाईऑक्साइड, और कभी-कभी मीथेन भी। साथ ही, लैक्टोज़ आंत में पानी को अपनी ओर खींचता है, जिससे दस्त की स्थिति बन सकती है। महत्वपूर्ण बात यह है कि समस्या दूध में नहीं, बल्कि उसे पचाने की हमारी घटी हुई क्षमता में है।
ऐसा क्यों होता है?
मनुष्य, गाय, बकरी, हाथी वगैरह सभी स्तनधारी जीव जन्म के बाद मां के दूध पर निर्भर रहते हैं। इसलिए प्रकृति ने शिशु को लैक्टेज़ का भरपूर उत्पादन करने की क्षमता दी है।
लेकिन जैसे-जैसे बच्चा ठोस आहार ग्रहण करने लगता है और दूध उसके जीवन का एकमात्र ऊर्जा-स्रोत नहीं रहता, शरीर लैक्टेज़ बनाने के लिए ज़िम्मेदार जीन (LCT) की सक्रियता को धीरे-धीरे कम करने लगता है। यह कोई बीमारी नहीं है बल्कि एक स्वाभाविक, सुनियोजित जैविक प्रक्रिया है।
एक अनोखा मोड़
लगभग दस हज़ार वर्ष पहले, जब युरोप, अरब और अफ्रीका के कुछ हिस्सों में पशुपालन और डेयरी संस्कृति का उदय हुआ, तो एक जेनेटिक उत्परिवर्तन हुआ जिसने प्रकृति की ‘लॉटरी' में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
जिन व्यक्तियों में यह उत्परिवर्तन था, उनके शरीर में वयस्क होने पर भी लैक्टेज़ बनता रहा। वे बड़े होने पर दूध पीते रह सकते थे और उन्हें पशुओं के दूध से अतिरिक्त कैलोरी, प्रोटीन और कैल्शियम मिलता था। यह अकाल और कठिन परिस्थितियों में उनके जीवित रहने में सहायक था। इस अतिरिक्त पोषण स्रोत ने इन व्यक्तियों को अधिक संतानें पैदा करने की संभावना दी, और यह जीन पीढ़ी-दर-पीढ़ी फैलता गया। इस परिघटना को लैक्टेज़ पर्सिस्टेंस या लैक्टोज़ सहिष्णुता कहते हैं।
लैक्टोज़ असहिष्णुता के प्रकार
प्राथमिक लैक्टोज़ असहिष्णुता: सबसे सामान्य प्रकार। उम्र के साथ LCT जीन की सक्रियता स्वाभाविक रूप से घटती है। यह जेनेटिक रूप से निर्धारित होती है और स्थायी होती है।
द्वितीयक लैक्टोज़ असहिष्णुता: किसी संक्रमण, सीलिएक रोग, क्रोह्न रोग, या आंत की सूजन के कारण लैक्टेज़ उत्पादन अस्थायी रूप से कम हो जाता है। मूल रोग के उपचार के बाद यह प्राय: ठीक हो सकता है।
जन्मजात लैक्टोज़ असहिष्णुता: यह अत्यंत दुर्लभ है। शिशु जन्म से ही लैक्टेज़ एंज़ाइम नहीं बना पाता। मां का दूध भी पच नहीं पाता, इसलिए इसमें तत्काल चिकित्सकीय हस्तक्षेप आवश्यक होता है।
लैक्टोज़ असहिष्णुता का अर्थ जीवनभर दूध का पूर्ण परित्याग नहीं है। कई व्यावहारिक रास्ते खुले हैं, जैसे:
- लैक्टोज़-मुक्त दूध और दुग्ध उत्पादों का उपयोग करें।
- दही और पनीर अक्सर पच जाते हैं।
- डेयरी उत्पाद खाने से पहले लैक्टेज़ एंज़ाइम सप्लीमेंट लें। थोड़ी मात्रा से शुरू करें और धीरे-धीरे असर जांचें।
- कैल्शियम के वैकल्पिक स्रोत (तिल, पालक, सोयाबीन, बादाम दूध) अपनाएं।
- किसी भी परिवर्तन से पहले चिकित्सक से परामर्श अवश्य लें।
यहां एक महत्वपूर्ण चेतावनी भी है: दूध और डेयरी उत्पाद कैल्शियम और विटामिन डी के प्रमुख स्रोत हैं। इन्हें बिना उचित विकल्पों के छोड़ना हड्डियों को प्रभावित कर सकता है, विशेषकर बच्चों और महिलाओं में।
लैक्टोज़ असहिष्णुता के आंकड़ों से यह आश्चर्यजनक तथ्य सामने आता है कि दुनिया की लगभग 60–70 प्रतिशत वयस्क आबादी इसी अवस्था में है। तो फिर प्रश्न यह है कि क्या दूध न पचना असामान्य है, या वयस्क होने पर भी दूध पचना एक विशेष जेनेटिक अपवाद है?
विज्ञान का उत्तर स्पष्ट है: दूध न पचना जैविक रूप से सामान्य है। जैव विकास की दृष्टि से देखें तो लैक्टेज़ पर्सिस्टेंस यानी वयस्कावस्था में भी लैक्टोज़ पचाने की क्षमता वास्तव में एक अपवाद है।
यह हमें यह भी याद दिलाता है कि ‘सामान्य' की परिभाषा अक्सर हमारी सांस्कृतिक और भौगोलिक पृष्ठभूमि से आकार लेती है, विज्ञान से नहीं।
अंत में
दूध से दूरी बनाने की ज़रूरत शरीर की जैविक विविधता का एक ईमानदार संकेत है। हमारा शरीर समय के साथ बदलता है; जो शिशु अवस्था में सहज था, वह वयस्क होने पर बदल सकता है। एक व्यक्ति के लिए स्वाभाविक, दूसरे के लिए असहज हो सकता है। शरीर कोई एक स्थिर मशीन नहीं, बल्कि एक बदलती हुई जैविक कहानी है — और हर कहानी का अपना स्वाद है। (स्रोत फीचर्स)

