प्राचीन समय में ग्रीक के एक शहर एल्यूसिस में एक अनुष्ठान हुआ करता था, जिसे नाम दिया गया है एल्यूसिनियन मिस्ट्रीज़। मिस्ट्रीज़ इसलिए कि एक तो उस समय सख्त पाबंदियों के कारण इस संस्कार में होने वाली चीज़ों का खुलासा करने की मनाही थी, और अब भी इसके कई पहलू वैज्ञानिकों के लिए रहस्य ही बने हुए हैं। इन रहस्यों में से एक है इस अनुष्ठान के दौरान पीया जाने वाली पेय, काइकॉन, जिसे दीक्षा लेने वाले लोगों द्वारा एक देवी के सम्मान में पीया जाता था। ऐसा माना जाता था कि देवी अपना गम गलत करने के लिए काइकॉन पीती थीं। जिन्होंने भी काइकॉन पीया था उनके बयानों से पता चलता है कि इसे पीने के बाद एक अलग ही अनुभव होता है; जैसे आप किसी दूसरी ही दुनिया में पहुंच गए हों। उनके ये विवरण ऐसे लगते थे जैसे अनुभव अक्सर लायसर्जिक एसिड डाईइथाइलएमाइड (LSD) जैसे मतिभ्रम उत्पन्न करने वाले ड्रग्स लेने पर होते हैं।
लेकिन अब ऐसा लगता है कि वैज्ञानिकों ने अलौकिक दुनिया में ले जाने वाले इस पेय को बनाने का नुस्खा पता कर लिया है। वैज्ञानिकों का कहना है कि प्राचीन ग्रीक पुजारिनें जौ पर पनपने वाली एक परजीवी फफूंद से काइकॉन बनाती थीं, जो LSD जैसा असर देती थीं और जिसे पीकर लोगों को अजीबोगरीब चीज़ें दिखती थीं और विचित्र अनुभव होते थे।
दरअसल हर संस्कृति, समुदाय में दुनिया और उसके क्रियाकलापों को समझाने के लिए कुछ पारंपरिक-पौराणिक कहानियां प्रचलित होती हैं। प्राचीन ग्रीकवासियों के पास भी कुछ कहानियां थीं। जैसे एक कहानी के अनुसार, पाताललोक का शासक हेडिस पृथ्वी की फसल की देवी डिमीटर की बेटी पर्सेफोन का हरण कर लेता है। देवता हेडिस के साथ समझौता करते हैं, और तय होता है कि पर्सेफोन हर साल के कुछ दिन अपनी मां के साथ पृथ्वी पर बिताएगी और साल के बाकी दिन पाताल में रहेगी। जब पर्सेफोन पाताल में होती, देवी डिमीटर दुख में इतना डूब जाती हैं कि पृथ्वी पर फसलें उगना बंद हो जाती हैं। अपना दुख दूर करने के लिए देवी डिमीटर काइकॉन नामक पेय पीती हैं। ग्रीक पुराणों में यह मौत और पुनर्जन्म के चक्र का एक कहानी-फलसफा है जिसे एल्यूसिनियन संस्कार के समय दीक्षा लेने वालों को रस्मी तौर पर सुनाया जाता था।
हालांकि इस संस्कार की रस्मों को गोपनीय रखे जाने के कड़े नियम थे, लेकिन फिर भी कहीं-कहीं थोड़ा उल्लेख मिल जाता है। जैसे सातवीं सदी ईसा पूर्व की एक इबारत में काइकॉन बनाने के नुस्खे के बारे में अंदाज़ा मिलता है। इबारत में डिमीटर बताती हैं कि काइकॉन में “जौ, पानी और थोड़ा पुदीना” होता है। इस इबारत के आधार पर वैज्ञानिकों का अंदाज़ा था कि इस पेय में जंगली घास और अनाजों पर पनपने वाली फफूंद एर्गोट मतिभ्रम करने वाली अलौकिक अनुभूति की ज़िम्मेदार होती होंगी। जैसा कि अब वैज्ञानिक जानते हैं कि कुछ विशिष्ट परिस्थितियों में, जैसे कि क्षारीय माध्यम में, एर्गोट से लायसर्जिक एसिड एमाइड्स बन सकते हैं। लायसर्जिक एसिड एमाइड्स LSD जैसे ही रसायन होते हैं और वैसा ही प्रभाव देते हैं। लेकिन यह भी पता है कि यदि एर्गोट को ठीक से प्रोसेस नहीं किया जाए तो इसके विषैले यौगिक अपना असर दिखाते हैं, नतीजतन ऐंठन, गैंग्रीन जैसी समस्या हो सकती है और यहां तक कि मौत भी हो सकती है।
उक्त जानकारी के आधार पर, काइकॉन का नुस्खा पता कर रहे शोधकर्ताओं को इतना अंदाज़ा तो था कि प्राचीन पुजारिनें राख से बने क्षारीय घोल की मदद से एर्गोट से लायसर्जिक एसिड एमाइड्स हासिल करती होंगी। लेकिन ठीक तरीका स्पष्ट नहीं हो पाया था, क्योंकि ज़रा भी गड़बड़ी जानलेवा हो सकती थी।
यह पता करने के लिए शोधकर्ताओं ने एर्गोट फफूंद को पीसकर पाउडर बनाया और अलग-अलग क्षारीयता और सांद्रता वाले राख के घोल में मिला दिया। इसके बाद, उन्होंने इस मिश्रण को अलग-अलग समयावधि के लिए उबाला। इस तरह उन्होंने नमूनों को 48 अलग-अलग तरीकों से गर्म किया।
उन्हें मात्र एक तरीके से एर्गोट से ऐसा यौगिक मिला जो विषैलेपन से मुक्त था और मतिभ्रम जैसा असर देता था। शोधकर्ताओं को एक निश्चित क्षारीयता वाले राख के घोल में एर्गोट मिलाकर, उसे 120 मिनट तक उबालने पर लायसर्जिक एसिड एमाइड्स प्राप्त हुए थे।
साइंटिफिक रिपोर्ट्स में प्रकाशित इन नतीजों से पता चलता है कि हज़ारों साल पहले भी लोग LSD जैसे यौगिक बनाकर उनका उपयोग करते थे। लेकिन कुछ वैज्ञानिक इन निष्कर्षों के प्रति थोड़ा चेताते हैं: उनका कहना है कि यह अध्ययन महज संभावना बताता है कि ग्रीकवासी पेय बनाने के लिए ऐसा करते होंगे, लेकिन वे वास्तव में ऐसा करते थे या नहीं, पता नहीं।
एक रास्ता तो यह हो सकता है कि एल्यूसिस में मिले प्राचीन बर्तनों में एर्गोट के अवशेष खोजे जाएं। यदि मिलते हैं तो पक्के तौर पर कुछ कहा जा सकेगा। आगे शोधकर्ताओं का इरादा भी ऐसे ही अवशेष तलाश करने का है। (स्रोत फीचर्स)
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Srote - May 2026
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