लगभग पचास वर्ष पूर्व अपोलो मिशन से लाई गई चंद्रमा की चट्टानों में मौजूद खनिज बताते हैं कि करीब 3.5 अरब साल पूर्व चंद्रमा पर बहुत शक्तिशाली चुंबकीय क्षेत्र था, जो लाखों साल तक बना रहा। लेकिन इतनी ताकतवर चुंबकीय शक्ति के लिए चंद्रमा के भीतर पिघला और गतिशील कोर होना ज़रूरी है। वैज्ञानिकों का मानना था कि चांद का अपेक्षाकृत छोटी साइज़ का कोर जल्दी ठंडा हो गया होगा। लेकिन उसी समय की कुछ अन्य चट्टानें संकेत दे रही थीं कि चंद्रमा का चुंबकीय क्षेत्र कमज़ोर था। इन दोनों अवलोकनों के कारण रहस्य पैदा हुआ।    
अब एक नए अध्ययन से राह खुली है। नेचर जियोसाइंस में प्रकाशित शोध के अनुसार, चंद्रमा पर लगातार शक्तिशाली चुंबकीय क्षेत्र नहीं था। बल्कि 4 अरब से 3.5 अरब साल पूर्व के दरम्यान बार-बार सीमित समय के लिए लेकिन बहुत शक्तिशाली चुंबकीय क्षेत्र बनता था।
अपोलो मिशन द्वारा लाई गई कुछ ज्वालामुखीय चट्टानों की ध्यानपूर्वक जांच से पता चला कि उनमें कम टाइटेनियम वाली चट्टानों की तुलना में अधिक टाइटेनियम वाली चट्टानों में चुंबकीय शक्ति अधिक थी। यह भी स्पष्ट हुआ कि दोनों तरह की चट्टानें चुंबकीय जानकारी सहेजकर रखने में समान रूप से सक्षम थीं। यानी फर्क चट्टानों की चुंबकीय सूचना को सहेजने की क्षमता में नहीं, बल्कि इस बात में था कि उनकी चुंबकीय क्षेत्र पैदा करने की क्षमता में अंतर था।
शोधकर्ताओं का अनुमान है कि अरबों साल पहले चंद्रमा के अंदर, मैंटल की गहराई में मौजूद टाइटेनियम-समृद्ध चट्टानें समय-समय पर पिघलती थीं। जिसके लिए गर्मी कोर तथा आसपास के पदार्थ से मिलती थी। इससे कुछ समय के लिए कोर में मंथन शुरू हो जाता और एक शक्तिशाली चुंबकीय क्षेत्र बन जाता था। जब यह पिघला हुआ मैग्मा सतह पर ठंडा होकर ठोस बन जाता, तो उस समय का चुंबकीय असर उसके भीतर दर्ज रह जाता था।
इस नए विचार के अनुसार, चंद्रमा पर लगातार और लंबे समय तक बना रहने वाला चुंबकीय क्षेत्र नहीं था। बल्कि वहां बार-बार बहुत शक्तिशाली चुंबकीय क्षेत्र थोड़े-थोड़े समय (5,000 साल से भी कम के समय) के लिए बनता था। शेष लंबे समय तक कमज़ोर चुंबकीय क्षेत्र रहता था। यही वजह हो सकती है कि कुछ चट्टानों में शक्तिशाली चुंबकीय गुण दिखते हैं, जबकि उसी समय की अन्य चट्टानों में नहीं।
यह अंतर शायद नमूने इकट्ठा करने की जगह के कारण हो सकता है। अपोलो मिशन ज़्यादातर ज्वालामुखीय मैदानों में उतरे थे, जहां बार-बार लावा बहा था। संभव है कि वहां ऐसी चट्टानें ज़्यादा मिली हों जो विस्फोटों के दौरान बनी थीं, जिससे ऐसा लगा कि चुंबकीय क्षेत्र लंबे समय तक लगातार शक्तिशाली था।
कुछ विशेषज्ञों का मत है कि यह नया विचार चंद्रमा के पूरे चुंबकीय इतिहास को नहीं समझा पाता। फिर भी यह जांच के लिए एक नई दिशा ज़रूर देता हैै।
आगे की प्रगति नए मिशनों से लाए जाने वाले नमूनों की मदद से आगे बढ़ेगी, जैसे चीन के चंद्रमिशन के नमूनों के अध्ययन से। (स्रोत फीचर्स)