आम तौर पर कोशिकाओं के बारे में बताया जाता है कि उनमें एक कोशिका झिल्ली होती है, पादप कोशिकाओं में कोशिका भित्ती होती है, एक केंद्रक होता है, माइटोकॉण्ड्रिया होते हैं, रिक्तिकाएं होती हैं। लेकिन कोशिकाओं में हज़ारों की संख्या में एक ऐसा उपांग होता है जिसके बारे में ज़्यादा मालूमात नहीं हैं।
इन उपांगों को वॉल्ट (तिज़ोरी) कहते हैं और इनकी खोज कैलिफोर्निया विश्वविद्यालय, लॉस एंजेल्स के जीव वैज्ञानिक लियोनार्ड रोम और नैन्सी केडेर्शा ने 1986 में की थी। तभी से वे इनकी गुत्थी सुलझाने की जद्दोजहद कर रहे हैं। बहरहाल, रहस्य बरकरार है लेकिन इनका एक उपयोग खोज लिया गया है।  
वॉल्ट्स मनुष्यों सहित अधिकांश यूकेरियोटिक (केंद्रक-युक्त) कोशिकाओं के कोशिका द्रव्य में पाए जाने वाले खोखले, बैरल के आकार के राइबोन्यूक्लिक प्रोटीन कण होते हैं। ये कोशिकाओं में पाए जाने वाले सबसे बड़े कणों में से हैं (70 नैनोमीटर)। इनका आवरण मेजर वॉल्ट प्रोटीन (MVP) से बना होता है और अंदर छोटे वॉल्ट आरएनए सहित तीन प्रोटीन होते हैं। एक औसत मानव कोशिका में लगभग 10,000 से 1,00,000 वॉल्ट्स होते हैं, विशेष रूप से मैक्रोफेज जैसी प्रतिरक्षा कोशिकाओं में। ये मुख्य रूप से कोशिका द्रव्य में और कोशिका कंकाल से जुड़े पाए जाते हैं और साथ ही नाभिकीय छिद्र पर भी पाए जा सकते हैं।
कोशिकाओं में क्या चल रहा है यह पता लगाने के लिए वैज्ञानिक आम तौर पर या तो किसी कोशिका में किसी क्षण पाए गए प्रोटीन्स (प्रोटियोम) का अध्ययन करते हैं या किसी कोशिका में पाए गए आरएनए अणुओं (ट्रांसक्रिप्टोम) का अध्ययन करते हैं। प्रोटीन्स कोशिका की क्रिया के प्रमुख उत्पाद होते हैं और इन्हें देखकर बताया जा सकता है कि उस समय किसी कोशिका में क्या-क्या क्रियाएं हुई हैं। दूसरी ओर, आरएनए वह अणु होता है जिसके आधार पर प्रोटीन्स बनते हैं। केंद्रक में मौजूद डीएनए के रूप में इस बात की समस्त सूचना होती है कि किसी कोशिका में कौन-कौन से प्रोटीन बन सकते हैं। इस डीएनए के खंड जीन्स कहलाते हैं। ज़रूरत के अनुसार इन जीन्स के अनुलेख बनाए जाते हैं। ये अनुलेख आरएनए के रूप में होते हैं और यही कोशिका द्रव्य में जाकर सम्बंधित प्रोटीन का निर्माण करवाते हैं। तो किसी कोशिका के समस्त आरएनए का विश्लेषण करके यह बताया जा सकता है कि उसमें किन प्रोटीन्स का निर्माण हो रहा है या हाल ही में हुआ है। इस विश्लेषण को ट्रांसक्रिप्टोम विश्लेषण कहते हैं। 
इस मामले में दिक्कत यह है कि आरएनए अत्यंत अस्थिर अणु होता है और सम्बंधित प्रोटीन बनवाने का काम पूरा होने के बाद जल्द ही (मिनटों में) नष्ट हो जाता है। तो ट्रांसक्रिप्टोम विश्लेषण से आपको कुछ समय पहले की गतिविधियों की जानकारी नहीं मिल सकती। यहीं पर वॉल्ट्स का पदार्पण हुआ।
ब्रॉड इंस्टीट्यूट के जैव-चिकित्सा इंजीनियर फाइ चेन यह जानना चाहते थे कि किसी कोशिका में पिछले कुछ दिनों में कौन-कौन से जीन्स प्रोटीन निर्माण में सक्रिय रहे हैं। विचार यह था कि संदेशवाहक आरएनए (m-RNA, जो प्रोटीन बनवाते हैं) को कैद कर लिया जाए, ताकि बाद में पता लगाया जा सके कि पिछले कुछ दिनों में कौन-कौन से जीन्स से m-RNA बने थे। 
पहला विचार यह आया कि इसके लिए पोली (A) बाइंडिंग प्रोटीन (PABP) की मदद ली जाए। यह वह प्रोटीन है जिसे स्वाभाविक रूप से m-RNA के एक सिरे पर जोड़ा जाता है और यह m-RNA की हिफाज़त करता है। कोशिश यह थी कि इस प्रोटीन (PABP) को किसी अन्य टिकाऊ अणु से जोड़ दिया जाए। जब यह संकुल m-RNA से जुड़ेगा तो m-RNA संरक्षित रहेगा जिसे बाद में देखा जा सकेगा।
इसके लिए सर्वप्रथम उन्होंने PABP को एक बैक्टीरिया प्रोटीन से जोड़ा। मगर इससे काम नहीं बना। तब सुझाव मिला कि इस काम के लिए रहस्यमयी वॉल्ट्स की मदद ली जाए। अंदर से तो वॉल्ट्स खोखले होते हैं। m-RNA को वॉल्ट के अंदर पहुंचाने के लिए टीम ने यह रणनीति अपनाई कि PABP के जीन को MVP से जुड़ने वाले अंदरुनी प्रोटीन के जीन से संलग्न कर दिया।
जैसा कि हमने देखा ये वॉल्ट प्रोटीन की तीन परतों से घिरे होते हैं। सबसे ऊपर होता है मेजर वॉल्ट प्रोटीन (MVP) और अंदर दो छोटे वॉल्ट प्रोटीन के अस्तर होते हैं। अलबत्ता, बाहरी आवरण गतिशील होता है और इसमें समय-समय पर छिद्र खुलते हैं। इन्हीं छिद्रों से होकर छोटे अणु अंदर जा सकते हैं।
वॉल्ट के आवरण में अंदर घुसने के लिए बाहर से आने वाले प्रोटीन या अन्य अणुओं को आवरण के वॉल्ट पोली (एडीपी राइबोस) पोलीमरेज़ प्रोटीन (VPARP) से जुड़ना होता है। यह एक संकेत के रूप में काम करता है। जब कोई प्रोटीन या अन्य अणु इससे जुड़ जाता है तो उसे वॉल्ट के अंदर प्रवेश मिल जाता है।
शोधकर्ता इसी मार्ग का उपयोग करके मनचाहे अणु को वॉल्ट के अंदर पहुंचाते हैं। इसके लिए MVP प्रोटीन पर ऐसे स्थल तैयार किए जाते हैं जो मनचाहे अणु से जुड़ सकें।
इस परिवर्तित PABP जीन को कोशिका में जोड़ दिया गया और साथ में MVP जीन की अतिरिक्त प्रतियां भी डाल दी गईं। हुआ यह कि इस परिवर्तित PABP ने m-RNA को पकड़ा (जो वह सामान्य तौर पर भी करता है) और उसे वॉल्ट के अंदर पहुंचा दिया। इसके बाद टीम ने यह किया कि वॉल्ट्स को रासायनिक विधि से खोला और वहां मौजूद m-RNA का क्षार अनुक्रम पता किया। इससे यह पता चल सका कि वहां उपस्थित m-RNA अणुओं की उत्पत्ति किन जीन्स से हुई है।
यानी इस विधि में m-RNA अणुओं को वॉल्ट में कैद कर लिया जाता है जहां ये काफी समय तक (लगभग 7 दिन तक) सुरक्षित रहते हैं। कोशिकाओं को गर्मी या कम ऑक्सीजन जैसी परिस्थितियों में उनकी जेनेटिक प्रतिक्रिया देखकर इस विधि की जांच की गई। टीम ने इन वॉल्ट्स का उपयोग करके उन जीन्स का पता भी लगाया जो फेफड़े के कुछ कैंसर को स्वीकृत औषधियों का प्रतिरोध करने में मदद करते हैं। m-RNA रिकॉर्ड करने वाले वॉल्ट्स को उन्होंने कैंसर कोशिकाओं में डाला और फिर उन कोशिकाओं को औषधि के संपर्क में रखा। टीम यह चिंहित कर पाई कि कौन से सुरक्षात्मक जीन्स थे जो उपचार से पहले ही सक्रिय थे। पहले के अध्ययनों में सिर्फ उन्हीं जीन्स की पहचान की गई थी जो उपचार की प्रतिक्रिया स्वरूप सक्रिय होते हैं। जब टीम ने इस नए चिंहित जीन को लक्ष्य करने वाली दवा भी जोड़ दी तो प्रथम उपचार की प्रतिरोधी अधिकांश कोशिकाएं मारी गई।
इसे टीम ने टाइम-वॉल्ट या टाइम कैप्सूल भी कहा है। कुछ लोग इसे आणविक सेल्फी भी कह रहे हैं। इसके चिकित्सा में कई उपयोग सोचे जा रहे हैं। वैसे चेन यह देखने की कोशिश कर रहे हैं कि क्या यह विधि एक-एक कोशिका के स्तर पर काम करेगी जिसकी मदद से यह पता लगाया जा सकेगा कि किसी कोशिका में पिछले कुछ दिनों में कौन-कौन से जीन सक्रिय रहे हैं। (स्रोत फीचर्स)