जैसे-जैसे दुनिया की आबादी बढ़ रही है, ज़्यादा दिन चलने वाले और पौष्टिक खाद्य की ज़रूरत भी बढ़ रही है। इस सम्बंध में, 2024 में लुबिस एवं साथियों द्वारा संपादित पुस्तक बायोमास कन्वर्ज़न एंड सस्टेनेबल बायोरिफाइनरी पठनीय है। यह किताब जैविक पदार्थ (बायोमास) अपशिष्ट का अन्य रूप में उपयोगी इस्तेमाल और बायोरिफाइनरी के इस्तेमाल में हुई हालिया तरक्की पर प्रकाश डालती है, और प्रबंधित पुनरुपयोग से जैविक अपशिष्ट और उप-उत्पादों को कम करने के तरीकों पर चर्चा करती है। विश्व स्वास्थ्य संगठन का कहना है कि जैसे-जैसे आबादी बढ़ रही है, जैविक कचरे को खाद्य उत्पादों में तब्दील करने के तरीके खोजना आवश्यक होता जा रहा है।
हमारे भोजन में कई तरह की सब्ज़ियां, अंडे और मांस शामिल होते हैं। इनको पकाने के लिए काटते या साफ करते समय हम इनका अखाद्य हिस्सा (छीलकर या छांटकर) अलग करते हैं, और कचरे की तरह फेंक देते हैं। गाजर के साथ भी हम यही करते हैं, इसका छिलका, ऊपरी नोक और डंठल की तरफ का हिस्सा हम छील-काटकर अलग कर देते हैं। गाजर के कुछ हिस्सों से हम मिठाई भी बनाते हैं, और बाकी हिस्सा खाने लायक न होने के कारण फेंक देते हैं, जो बर्बाद ही जाता है। उपरोक्त पुस्तक में गगन जे. कौर और साथियों का आलेख इस मुद्दे पर विस्तार से बात करता है; शीर्षक है ‘असेसमेंट ऑफ कैरट रिजेक्ट्स एंड वेस्ट्स फॉर फूड प्रोडक्ट एंड एज़ ए बायोफ्यूल’।
इसी संदर्भ में, दिसंबर 2025 में जर्नल ऑफ एग्रीकल्चरल एंड फूड केमिस्ट्री में जर्मनी की गीसेन युनिवर्सिटी के इंस्टीट्यूट ऑफ फूड केमिस्ट्री के मार्टिन गैंड के नेतृत्व में एक अंतर्राष्ट्रीय वैज्ञानिक दल का शोध पत्र छपा था। यह अध्ययन गाजर के कचरे से कवक पनपाने की बात करता है। कवकों (फफूंद) के पोषण प्राप्त करने के तरीके पौधों और जंतुओं से सर्वथा अलग हैं।
पौधों के विपरीत, कवक प्रकाश संश्लेषण नहीं करते। उनमें जड़ें भी नहीं होतीं जिनकी मदद से वे बढ़ सकें। बल्कि कवक तो बाहरी स्रोतों से अपना भोजन-पोषण प्राप्त करते हैं। और तो और, जंतुओं से उलट, कवक पाचन के पहले भोजन ग्रहण नहीं करते, बल्कि वे जैविक चीज़ों को तोड़ने/पचाने के लिए अपने आसपास शक्तिशाली एंज़ाइम छोड़ते हैं और फिर मायसेलिया की मदद से अपने आसपास मौजूद पोषण अवशोषित करते हैं। बताते चलें कि मायसेलिया कवक में जड़ जैसी संरचना होती है जो तंतुनुमा जाल बनाती है।
पोषण हासिल करने का अनोखा तरीका उन्हें विभिन्न पर्यावरणों में पनपने के काबिल बनाता है और उनकी पारिस्थितिक भूमिकाओं को मज़बूत करता है। कवक में लगभग हर जैविक चीज़ को अपघटित करने की ज़बरदस्त क्षमता भी होती है, जिसमें वह खाद्य कचरा भी शामिल है जिसे हम पचा नहीं पाते।
कवक का एक आम उदाहरण मशरूम है, जिसका इस्तेमाल शोरबा, तरी, पास्ता और पिज़्ज़ा बनाने में किया जाता है। यह पूरी तरह से शाकाहारी खाद्य है और इसमें विटामिन तथा एंटीऑक्सीडेंट भरपूर मात्रा में पाए जाते हैं। मशरूम ऐसे कवक हैं जो उपलब्ध बाहरी पोषक तत्वों का इस्तेमाल करके पनपते हैं, जिनमें खाद्य कचरा भी शामिल है। हमारे आहार में भी मशरूम शामिल हो सकते हैं। दिसंबर 2025 में एक शोध समूह ने विभिन्न देशों के 100 से ज़्यादा तरह के मशरूम का परीक्षण किया और पाया कि वे गैर-खाद्य कचरे को उपयोगी बनाने में काफी असरदार हैं।
शोधकर्ताओं ने गाजर के कचरे पर अध्ययन केंद्रित किया, और देखा कि कवक उन्हें कैसे पचाते हैं और उससे खाने लायक चीज़ें बनाते हैं। उदाहरण के लिए, टीम ने गाजर के छिलके वगैरह पर पनपाए गुलाबी ओइस्टर मशरूम के मायसेलिया से वीगन पैटीज़ बनाई। ये वीगन पैटीज़ कुछ व्यंजनों में सोया की जगह इस्तेमाल की जा सकती हैं।
हममें से कई लोग अपने भोजन में कई तरह से गाजर खाते हैं; जैसे सब्ज़ी बनाकर, सलाद में या गाजर का हलवा वगैरह बनाकर। लेकिन रसोइए और आहारविद सलाह देंगे कि हमें इन व्यंजनों में मशरूम का ज़्यादा इस्तेमाल करना चाहिए क्योंकि ये सेहत के लिए फायदेमंद हैं। कवक की मदद से खाद्य कचरे को प्रोटीन और विटामिन युक्त खाद्य में बदलकर भविष्य में शायद खाद्य सुरक्षा हासिल की जा सकती है। (स्रोत फीचर्स)