छल-धोखा सिर्फ हमारे साथ नहीं होता। जीवजगत में भी कई ऐसे उदाहरण मिलते हैं जहां एक जीव अपने फायदे के लिए दूसरे जीव का इस्तेमाल करता है। जैसे, कुछ ऑर्किड के फूल मधुमक्खियों को छलते हैं। इन ऑर्किड के फूलों का रूप-रंग मादा मधुमक्खी की तरह होता है और वे उन्हीं की तरह महक बिखेरते हैं। मादा की तलाश कर रही नर मधुमक्खी इन फूलों पर चली जाती है। संभोग तो होता नहीं लेकिन संभोग की कोशिश में उनके शरीर पर ऑर्किड के परागकण चिपक जाते हैं। ऑर्किड का परागण हो जाता है, बदले में मधुमक्खी को कुछ नहीं मिलता। 
वैज्ञानिकों को अब ऐसी ही एक और धोखाधड़ी के बारे में पता चला है। इसमें मधुमक्खियों को धोखा देते हैं भृंग यानी बीटल्स: ब्लिस्टर बीटल के लार्वा फूल जैसी महक बिखेरते हैं, जिससे मधुमक्खियां उनके पास खिंची चली आती हैं। फिर, लार्वा मधुमक्खी से चिपक जाते हैं, चिपके-चिपके उनके छत्तों में पहुंच जाते हैं और उनके अंडे खा जाते हैं।
मैक्स प्लैंक इंस्टीट्यूट फॉर केमिकल इकॉलॉजी के कार्बनिक रसायनज्ञ रयान आलम की बीटल्स के अध्ययन में दिलचस्पी थी। ब्लिस्टर बीटल आत्मरक्षा के लिए कैंथेरीडिन नामक विषैला रसायन छोड़ते हैं, जिससे त्वचा पर फफोले उभर आते हैं। जब आलम को पता चला कि ब्लिस्टर बीटल की कुछ प्रजातियां घास और पौधों के सिरे पर चढ़ जाती हैं तो वे हैरान रह गए। 
वे सोचने लगे कि कहीं इनके लार्वा कोई गंध तो नहीं छोड़ते। जांच के लिए वे जर्मनी के घास के मैदानों से 40 युरोपियन ब्लैक ऑयल बीटल (Meloe proscarabaeus) इकट्ठा करके प्रयोगशाला ले आए। यहां बीटल्स ने प्रजनन किया और हज़ारों अंडे दिए। अंडे से निकलने के बाद लार्वा प्रयोगशाला की घास पर चढ़ गए। कैंथेरीडिन रसायन से बनने वाले फफोलों से बचने के लिए दस्ताने पहनकर आलम ने लार्वा इकट्ठा किए और उन्हें मसल दिया। फिर उन्होंने इस लार्वा-चटनी की गैस क्रोमैटोग्राफी की और देखा कि इसमें कौन-कौन-से रसायन मौजूद हैं।
उन्हें लार्वा में मोनोटर्पिनॉइड्स नामक कुछ अणु मिले। ये कीटों में तो कम मिलते हैं, लेकिन पौधों में आम तौर पर पाए जाते हैं। लार्वा में सबसे अधिक पाए गए आठ अणुओं में से कई प्राय: फूलों में पाए जाते हैं। जैसे लिनेलूल ऑक्साइड और लिलेक एल्डिहाइड। फूलों में ये रसायन परागणकर्ताओं को आकर्षित करते हैं। लेकिन फूलों में पाए जाने वाले रसायन किसी कीट में मिलना हैरानी की बात थी।
तो सवाल था कि क्या वाकई कीट में मौजूद ये रसायन मधुमक्खियों को न्यौता देते हैं? इसे जांचने के लिए शोधकर्ताओं ने एक Y-शेप का रास्ता बनाया, जिसका एक रास्ता बीटल-लार्वा से बिखेरी गई खुशबू की ओर जाता था और दूसरा रास्ता व्हीटग्रास की खुशबू की ओर। मधुमक्खी दोनों में से कोई एक खुशबू चुन सकती थी। रेड मेसन मधुमक्खियों (Osmia bicornis) और बेयर-सैडल्ड सेलोफेन मधुमक्खियों (Colletes similis), दोनों ने व्हीटग्रास की बजाय लार्वा से निकलने वाली फूल-जैसी खुशबू का मार्ग चुना।
शोधकर्ताओं ने यह भी पता लगाया कि बीटल लार्वा फूल जैसे रसायन कैसे बनाते हैं। पता चला कि उनमें इन रसायनों का निर्माण उन्हीं एंज़ाइम्स से होता है, जिनसे ये पौधे में बनते हैं।
मादा-सरीखी खुशबू फैलाने की बजाय फूल-जैसी खुशबू बिखेरने से फायदा यह है कि इस खुशबू से नर और मादा दोनों मधुमक्खियां आकर्षित होती हैं। और सिर्फ मादा मधुमक्खियां ही अपने छत्ते में वापस लौटती हैं, नर नहीं। तो क्यों न छत्ते तक पहुंचने के लिए नर को छोड़कर सीधे मादा से लिफ्ट ली जाए। लार्वा वसंत की शुरुआत में, असली फूल खिलने से पहले, घास के तनों पर चढ़ जाते हैं। और उन्हें फूल समझकर बेचारी मधुमक्खियां उनके पास खिंची चली आती हैं और ठगी जाती हैं।
हो सकता है इस तरह की महकती नकल जीवजगत में और भी आम हो, जिन पर लोगों का ध्यान न गया हो। ध्यान न जाने का कारण यह हो सकता है कि हम मनुष्य नाक से उतना काम नहीं लेते जितना आंखों से लेते हैं। तो, आंख-नाक-कान खुले रखकर निसर्ग को निहारें, सूंघें और सुनें बहुत कुछ रोचक हाथ लग सकता है। (स्रोत फीचर्स)