अमेरिकी लेखक और एक्टिविस्ट हेलन केलर इंसानी क्षमता और संभावना की एक अंतर्राष्ट्रीय मिसाल हैं। बहरेपन और अंधेपन से ग्रसित हेलन केलर ने लिखा था, “आशावाद वह विश्वास है जो कामयाबी की ओर ले जाता है। उम्मीद और भरोसे के बिना कुछ भी नहीं किया जा सकता।”
आशावाद को भविष्य में अच्छा और हितकर होने की सकारात्मक उम्मीद रखने के रूप में समझा जा सकता है। यह एक इंसानी खूबी है जिसे बेहतर सेहत और बेहतर ज़िंदगी से भी जोड़कर देखा जाता है। आशावाद यह तय करता है कि हम भविष्य को कैसे देखते-सोचते हैं। यह एक मॉड्युलेटर की तरह काम करता है जो सकारात्मक संभावनाओं को थोड़ा बढ़ा-चढ़ा देता है और नकारात्मक विचारों और ख्यालों को दूर रखता है। इस्राइली-ब्रिटिश तंत्रिका विज्ञानी ताली शारोट का अनुमान है कि लगभग 80 प्रतिशत मनुष्य आशावादी हैं, लेकिन अधिकतर लोग ‘थोड़े ही’ आशावादी होते हैं। 
यह कहा जा सकता है कि आशावाद वास्तविकता से अलग, एकतरफा सोच दिखाता है। जैव-विकास ऐसी खूबी को क्यों तरजीह देगा जो आपको पूरी तरह निष्पक्ष रखने की बजाय एकतरफा ढंग से पूर्वाग्रह से लैस करे? वैज्ञानिकों के बीच आम राय यह है कि आशावाद की बदौलत अनुकूलन काफी ज़्यादा होता है, अर्थात आशावाद किसी जीव की उत्तरजीविता को बढ़ाता है। 
कल्पना कीजिए कई हज़ार साल पहले कोई महिला जिस तरह रहती थी। मान लीजिए वह एक गुफा के अंदर रहती है और उस समय उस क्षेत्र में सूखा पड़ रहा है। अगर वह बाहर भोजन (कोई खरगोश या फल से लदी झाड़ी) मिलने की संभावना निकालकर निर्णय करे, तो शायद ही भोजन की तलाश में बाहर जाए। ऐसे में निष्क्रिय रहना उसके लिए सही चुनाव रहता, क्योंकि इससे यहां-वहां भटकने में खर्च होने वाली ऊर्जा बचती। दूसरी ओर, (कुछ-न-कुछ मिल जाने की) उम्मीद उसे भोजन की तलाश के लिए बाहर निकलने की हिम्मत दे सकती है। बाहर कुछ-न-कुछ भोजन मिल जाने की संभावना ज़्यादा मानकर, उसके पास कोशिश करने की ज़्यादा संभावना होगी। किसी एक तरफ यह थोड़ा अधिक झुकाव उसे कोशिश करने के लिए बढ़ावा देता है, जिससे उसके जीने की संभावना बढ़ जाती है।
हालांकि, इसकी भी एक सीमा है कि आप कितने आशावादी होकर इससे फायदा उठा सकते हैं। फायदे के लिए जो तरीका सबसे अच्छा काम करता है वह है एक सामान्य सकारात्मक सोच रखना, जिसे आशावादी स्वभाव कहा जाता है। असल ज़िंदगी में कुछ बुरा होने पर किसी निराशावादी व्यक्ति की प्रतिक्रिया होगी “मैं जानता था, ऐसा ही होगा”। जबकि आशावादी लोग कहेंगे “कल बेहतर होगा”। 
वर्ष 2007 में नेचर पत्रिका में प्रकाशित अध्ययन के अनुसार यह लचीलापन ‘आशावादी पूर्वाग्रह (ऑप्टिमिज़्म बायस)’ से बना रहता है, जो मस्तिष्क में सूचनाओं की प्रोसेसिंग में गैर-बराबरी का परिणाम है: मस्तिष्क द्वारा अच्छी बातों को ज़्यादा अहमियत दी जाती है और बुरी बातों को कम।
मस्तिष्क के अग्र और मध्य भाग का एक क्षेत्र है रोस्ट्रल एंटीरियर सिंगुलेट कॉर्टेक्स (rACC)। जब आशावादी लोग अच्छे और सुखद भविष्य की कल्पना करते हैं तब यह क्षेत्र बहुत सक्रिय होता है। इस हिस्से में अधिक सक्रिय न्यूरॉन अच्छी संभावनाओं की एन्कोडिंग को आसान बनाते हैं। इसके विपरीत, नकारात्मक जानकारियों पर rACC कम प्रतिक्रिया देता है, परिणामस्वरूप असफलताओं का व्यक्ति की भविष्य की उम्मीदों पर कम असर पड़ता है।
रिवाइज़्ड लाइफ ओरिएंटेशन टेस्ट एक छोटा-सा परीक्षण है जिसका इस्तेमाल यह मापने के लिए किया जाता है कि किसी व्यक्ति में आशावादिता है या नहीं। इसमें स्थिति आधारित 10 वक्तव्य होते हैं जिन्हें आपको 0 से 4 के बीच अंक देने होते हैं (‘पूरी तरह असहमत’ के लिए 0 से ‘पूरी तरह सहमत’ के लिए 4 तक)। मसलन, ऐसे वक्तव्य होते हैं: “कठिन परिस्थितियों में, अमूमन मैं अच्छे की उम्मीद रखता हूं” और “यदि कुछ बुरा होना है, तो होकर रहेगा”।
जिन लोगों में आशावादिता अधिक होती है, उनका हृदय अधिक स्वस्थ पाया गया है। बुज़ुर्गों में, आशावादी स्वभाव को न्यूरॉन्स का सुरक्षा कवच माना जाता है, जो मस्तिष्क को बुढ़ापे की मार से बचाता है। वर्ष 2024 में एजिंग एंड डिसीज़ जर्नल में प्रकाशित नतीजों के अनुसार ब्रेन-डेराइव्ड न्यूरोट्रॉफिक फैक्टर (BDNF) का उच्च स्तर बुढ़ापे में लचीलापन बढ़ाता है। बुढ़ापे के कारण भले ही कुछ न्यूरॉन्स खत्म होते जाते हैं, लेकिन BDNF बचे हुए न्यूरॉन्स को ज़्यादा असरदार तरीके से एक-दूसरे से जोड़ने में मदद करता है, जिससे व्यक्ति की इंद्रियां चाक-चौबंद रहती हैं और दिमाग समझदार बना रहता है। (स्रोत फीचर्स)