छिछोरे फिल्म का एक रोमांचक दृश्य सबको याद होगा। जीत-हार को तय करने वाले क्षण में हीरो गेंद को बास्केट में डालने का प्रयास करता है, गेंद बास्केट के किनारे को छूती है, पिछले हिस्से से टकराती है, अगली रिम को छूती है और टकराकर वापिस लौट आती है। यह घटना बास्केटबॉल के खेल में तो होती ही है, गोल्फ के मैदान में भी अक्सर देखी जाती है। गोल्फ में कई बार गेंद छेद के रिम पर चक्कर लगाकर लौट आती है। यहां तक कि कई बार तो गेंद रिम के नीचे भी चली जाती है लेकिन वहां से अंदर जाने की बजाय ऊपर निकल जाती है। गोल्फ में इसे ‘लिप आउट' कहते हैं। खिलाड़ियों के साथ-साथ लिप आउट भौतिकशास्त्रियों के लिए भी एक पहेली रहा है। अब लगता है कि भौतिकविदों ने इस गुत्थी को सुलझा लिया है। रॉयल सोसायटी ओपन साइंस में ब्रिस्टल विश्वविद्यालय के जॉन होगन और सेचेनी इस्तवान विश्वविद्यालय के मेट अन्ताली द्वारा प्रकाशित एक शोध पत्र में इस पर रोशनी डाली गई है। उन्होंने देखा कि लिप आउट कई कारणों से हो सकता है। ऐसी एक करामात को बैलिस्टिक लिप आउट कहते हैं। गेंद छेद के केंद्र की ओर जाती है, लेकिन उसकी रफ्तार इतनी अधिक होती है कि वह छेद के सामने वाली सतह से टकराती है और उछलकर बाहर आ जाती है। इसी प्रकार छेद की रिम से होने वाली लिप आउट में गेंद छेद पर तिरछी दिशा में पहुंचती है, रिम का चक्कर काटती है और अंदर जाने की बजाय बाहर छिटक जाती है।
लेकिन सबसे नाटकीय स्थिति छेद से होने वाला लिप आउट होती है। इसमें होता यह है कि रिम का चक्कर काटते हुए गेंद छेद में गिरने तो लगती है लेकिन फिर गुरुत्वाकर्षण को मात देते हुए वापिस ऊपर चढ़कर बाहर निकल जाती है।
बैलिस्टिक और रिम लिप आउट तो समझ में आते हैं और ये सीधी-सादी उछाल की वजह से होते हैं लेकिन गिरते-गिरते आधे रास्ते से लौट आना समझना मुश्किल रहा है।
इस पूरे मामले को न्यूटन द्वारा प्रतिपादित यांत्रिकी के नियमों से समझने के प्रयास होते रहे हैं। लेकिन यथार्थ में इन नियमों को लागू करना गणित के लिहाज़ से काफी मुश्किल हो जाता है क्योंकि यहां गति के तीन अलग-अलग अक्षों पर ध्यान देना होता है। पहला है जिसमें मैदान क्षैतिज है और आसमान ऊपर की दिशा में। दूसरा है लुढ़कती गेंद के घूर्णन का अक्ष और तीसरा है मैदान या छेद और गेंद का संपर्क बिंदु।
विश्लेषण के लिहाज़ से ये सारी गतियां थोड़ी दिक्कत तो पैदा करती हैं लेकिन जब गेंद सपाट मैदान पर लुढ़क रही हो तो इन्हें संभाला जा सकता है। होगन के मुताबिक दिक्कतें तब उभरती हैं जब गेंद रिम से छेद की ओर बढ़ती है। उनके अनुसार इस पड़ाव पर गेंद की दो गतियां एक साथ चलती हैं - गेंद का लुढ़कना और गेंद का घूमना। इस पड़ाव पर गुरुत्व बल इन दोनों गतियों के अक्ष के लंबवत नहीं लगता है। इसकी बजाय गुरुत्व बल गेंद को उस सतह (यानी छेद की दीवार) से सटाकर खींचता है जिस पर वह लुढ़क रही है। इसलिए सपाट मैदान पर गेंद के लुढ़कने और छेद की अंदरुनी दीवार पर उसके लुढ़कने को अलग-अलग ढंग से समझने के प्रयास किए गए हैं। और इन दोनों की अंतर्क्रिया को समझना गणित के लिहाज़ से खासा मुश्किल हो जाता है।
लिहाज़ा होगन और अन्ताली ने इस समस्या पर बिलकुल अलग ढंग से विचार किया है। उन्होंने विश्लेषण के लिए दो अक्षों को ध्यान में लिया - एक वह जो गेंद के लुढ़कने की दिशा से निर्धारित होता है और दूसरा वह जो सतह से संपर्क और उसके केंद्र बिंदु को जोड़ने वाली रेखा से। होगन के मुताबिक जब गेंद छेद में जाती है तो ये अक्ष उसके साथ ही चलते हैं।
इस विश्लेषण के द्वारा रिम और छेद से लिप आउट की घटनाओं की व्याख्या एक जैसे परिवर्तियों की मदद से की जा सकी। देखें कैसे।
जब गेंद छेद में गिरती है और दीवार पर लुढ़कती है तो वह अपने केंद्र और दीवार से संपर्क बिंदु को जोड़ने वाली अक्ष पर थोड़ा घूर्णन करने लगती है। लगभग इसी समय जड़त्व का प्रभाव भी हावी हो जाता है। यदि इस समय तक गेंद छेद के पेंदे में न पहुंच गई हो, तो वह घूर्णन धीमा पड़ जाता है और गेंद दीवार पर चढ़ने लगती है।
यह कहना थोड़ा कठिन होता है कि गेंद वास्तव में छेद से बाहर निकल आएगी या नहीं। दरअसल, पूर्व शोध बताते हैं कि किसी भी शॉट का परिणाम छोटी-छोटी उथल-पुथल से निर्धारित होता है। छेद में गिरना और वापिस निकल आना, इन दोनों की संभावना बराबर होती है। और किसी छोटी सी गड़बड़ (जैसे रेत का एक कण) से गेंद इनमें से कोई भी रास्ता अपना सकती है।
सवाल यह है कि क्या इस विश्लेषण से गोल्फ या बास्केटबॉल के खिलाड़ियों को कोई मदद मिलेगी? शोधकर्ताओं का कहना है कि शायद नहीं क्योंकि अंतिम बिंदु पर बलों का संतुलन इतनी सूक्ष्मता से होता है कि शॉट मारते वक्त नियंत्रण नामुमकिन नहीं, तो बहुत मुश्किल अवश्य है। (स्रोत फीचर्स)