इन दिनों अमेरिका की अदालत में एक ऐसा वैज्ञानिक सवाल सामने आया है, जिसका जवाब अभी तक स्पष्ट नहीं है। सवाल यह है कि क्या सोशल मीडिया बच्चों और किशोरों के लिए ‘लत’ बन सकता है, और अगर उससे उन्हें मानसिक नुकसान होता है तो उसकी ज़िम्मेदारी किसकी होगी। कैलिफोर्निया में शुरू हुए इस ऐतिहासिक मुकदमे में एक युवती का कहना है कि बचपन में सोशल मीडिया का बहुत ज़्यादा इस्तेमाल करने की वजह से उसे लंबे समय तक चिंता, अवसाद और अपने शरीर को लेकर हीन भावना जैसी समस्याएं झेलनी पड़ रही हैं।
इंटरनेट कानून के विशेषज्ञ एरिक गोल्डमैन के अनुसार, जूरी को दो बेहद मुश्किल सवालों पर फैसला करना होगा। पहला, क्या सोशल मीडिया की ‘लत’ एक वास्तविकता है? और दूसरा, क्या टेक-कंपनियों को अपने प्लेटफॉर्म से होने वाले मानसिक नुकसान के लिए कानूनी रूप से ज़िम्मेदार ठहराया जा सकता है? उनके मुताबिक, इन सवालों के जवाब आसान नहीं होंगे, क्योंकि इन्हें लेकर वैज्ञानिकों के बीच ज़ोरदार बहस होने वाली है। 
यह बात अभी वैज्ञानिक रूप से पूरी तरह स्पष्ट नहीं है। नशे या जुए की ‘लत’ की तरह सोशल मीडिया की ‘लत’ को मानसिक रोगों की मानक पुस्तकों में आधिकारिक रूप से बीमारी नहीं माना गया है। इसी वजह से शोधकर्ता इस विषय पर बहुत सावधानी से बात करते हैं। कुछ वैज्ञानिक सोशल मीडिया के लिए ‘लत’ शब्द इस्तेमाल करने में सहज हैं, लेकिन कई दूसरे वैज्ञानिक इससे असहमत हैं और कहते हैं कि इसके पक्ष में ठोस सबूत अभी पर्याप्त नहीं हैं।आम तौर पर लत का मतलब होता है किसी चीज़ को निरंतर करते रहना, उसे छोड़ने पर बेचैनी महसूस होना और साफ नुकसान दिखने के बावजूद उसका इस्तेमाल जारी रखना। कई किशोरों में सोशल मीडिया का इस्तेमाल इसी तरह आदत बन चुका है, लेकिन विशेषज्ञों का कहना है कि यह तय करना अभी मुश्किल है कि इसे एक मानसिक रोग कहा जाए या सिर्फ एक संगीन खराब आदत। इसी कारण ज़्यादातर वैज्ञानिक इसे ‘समस्यामूलक सोशल मीडिया उपयोग’ कहना ज़्यादा उचित मानते हैं।
एक और बड़ी मुश्किल यह समझना है कि सोशल मीडिया और मानसिक समस्याओं के बीच सम्बंध कार्य-कारण का है या सिर्फ साथ-साथ होने वाली (correlation) बात का। जिस समय सोशल मीडिया का इस्तेमाल बढ़ा है, उसी दौरान युवाओं में चिंता और अवसाद के मामले भी बढ़े हैं। लेकिन ज़्यादातर शोध यह पक्के तौर पर साबित नहीं कर पाए हैं कि इन मानसिक समस्याओं की सीधी वजह सोशल मीडिया ही है। संभव है कि कुछ किशोर पहले से ही मानसिक रूप से संवेदनशील हों और इसी कारण वे सोशल मीडिया का ज़्यादा सहारा लेने लगते हों।
सोशल मीडिया के असर को मापने का तरीका भी बहुत अहम है। कई अध्ययनों में केवल स्क्रीन टाइम देखा जाता है, लेकिन इससे पूरी सच्चाई सामने नहीं आती। बिना सोचे-समझे लगातार स्क्रॉल करना, शारीरिक चीज़ों पर ज़ोर देने वाली सामग्री देखना या ऑनलाइन परेशान किया जाना नुकसानदेह हो सकता है, जबकि दोस्तों से जुड़ना और रचनात्मक काम करना कभी-कभी फायदेमंद भी साबित हो सकता है।
2024 में विज्ञान और चिकित्सा से जुड़ी यूएस की एक राष्ट्रीय समिति (National Academies of Sciences, Engineering, and Medicine) के अनुसार अब तक हुए शोध यह साबित नहीं करते कि सोशल मीडिया से सभी किशोरों के मानसिक स्वास्थ्य को बड़े स्तर पर नुकसान हो रहा है। फिर भी कुछ विशेषज्ञों का मानना है कि कुछ बच्चों और किशोरों पर इसका असर साफ तौर पर दिखाई देता है, खासकर तब जब सोशल मीडिया का इस्तेमाल बहुत ज़्यादा किया जाता है।
अब जब अदालतें इस अधूरी और अनिश्चित वैज्ञानिक जानकारी के आधार पर ज़िम्मेदारी तय करने की कोशिश कर रही हैं, तो इस मामले का फैसला यह तय कर सकता है कि समाज आगे चलकर किशोरों की डिजिटल ज़िंदगी को कैसे समझे और उस पर कैसे नियम बनाए। फिर भी इस मुद्दे पर विभिन्न वैज्ञानिकों के विचार और वाद-विवाद काफी महत्वपूर्ण होंगे। (स्रोत फीचर्स)
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Srote - April 2026
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