एक ताज़ा अध्ययन कहता है कि किसी व्यक्ति की दीर्घायु में जीन्स की भूमिका हमारी अपेक्षा से अधिक है। साइंस में प्रकाशित शोध के अनुसार इंसान यदि लंबी उम्र पाए, तो उसका लगभग 55 प्रतिशत श्रेय आनुवंशिकी को दिया जा सकता है। यह पिछले अनुमानों (10-25 प्रतिशत) से कहीं ज़्यादा है।
शोधकर्ताओं का कहना है कि जीन्स के योगदान को लेकर पिछले अनुमान कम थे क्योंकि उन अध्ययनों में बाहरी कारकों (जैसे संक्रामक रोग या दुर्घटनाओं) और अंदरूनी कारकों (जैसे समय के साथ डीएनए क्षति) से होने वाली मौतों को स्पष्ट रूप से अलग-अलग नहीं किया जा सका था।
इस्राइल के वाइज़मैन इंस्टीट्यूट ऑफ साइंस के जैव-भौतिकविद बेन शेनहार और उनकी टीम ने सोचा कि इन अध्ययनों के डैटा को फिर से देखा जाए। उन्होंने डेनमार्क और स्वीडन में हुए जुड़वां बच्चों के अध्ययनों, और यूएस में सौ साल से ज़्यादा जीने वाले सहोदरों के अध्ययन के डैटा पर गौर किया।
गौरतलब है कि जुड़वां बच्चे दो तरह के होते हैं। आइडेंटिकल जुड़वां तब पैदा होते हैं जब दोनों संतानें एक ही अंडाणु-शुक्राणु से निर्मित भ्रूण के दो भागों में बंटने से बनती हैं। फ्रेटरनल जुड़वां ऐसी दो संतानें होती हैं जो दो अलग-अलग भ्रूण से गर्भाशय में साथ-साथ विकसित होती हैं। आइडेंटिकल ट्विन्स के डीएनए शत-प्रतिशत एक समान होते हैं, जबकि फ्रेटरनल ट्विन्स और सहोदरों में लगभग 50 प्रतिशत डीएनए एक समान होता है।
शोधकर्ताओं ने आइडेंटिकल जुड़वां और फ्रेटरनल जुड़वां/सहोदरों के जीवनकाल की तुलना करके दीर्घायु में आनुवंशिकता या जीन्स की भूमिका को समझा। उपरोक्त अध्ययनों के आंकड़ों के विश्लेषण में पाया गया कि यदि बाहरी कारक मृत्यु का कारण न बनें तो जेनेटिक आधार से सम्बंधित व्यक्तियों के जीवनकाल में समानता होती है। बेहतर होती गई सार्वजनिक स्वास्थ्य सुविधा के कारण यह बात समय के साथ और भी स्पष्ट होती गई: 1800 के दशक के अंत में और 1900 के दशक की शुरुआत में, जब लोग संक्रमण के कारण कम उम्र में मर जाते थे, तो आयु के सम्बंध में जेनेटिक संकेत लगभग नदारद थे। लेकिन बीसवीं सदी में दीर्घायु से आनुवंशिकता का सम्बंध अधिक स्पष्ट दिखा।
यह भी पाया गया कि मृत्यु के सभी आंतरिक कारण समान रूप से जेनेटिक नहीं होते हैं। डिमेंशिया और कार्डियोवैस्कुलर बीमारियों में वंशानुगत हस्तांतरण ज़्यादा दिखा, लेकिन कैंसर में कम। इससे लगता है कि ऐसा ज़्यादातर रैंडम उत्परिवर्तन या पर्यावरणीय कारणों से होता है।
शोधकर्ताओं का कहना है कि दीर्घायु में शामिल जीन्स को पहचानना उम्र से सम्बंधित बीमारियों के इलाज खोजने में मददगार हो सकता है। साथ ही, शोधकर्ता यह भी ध्यान में रखने को कहते हैं कि दीर्घायु होना जीन्स के अलावा काफी हद तक जीवनशैली, खान-पान और परिस्थितियों आदि से तय होता है। हमें दीर्घायु जीन्स मिलें, यह तो हमारे हाथ में नहीं, लेकिन बेहतर जीवनशैली अपनाना कुछ हद तक मनुष्यों के हाथ में है। लंबा जीने से ज़रूरी है स्वस्थ जीना। (स्रोत फीचर्स)
-
Srote - April 2026
- सीपें: जलीय-दुनिया की गुपचुप नायिकाएं
- एआई ने सुझाए प्राचीन रोमन खेल के नियम-कायदे
- बास्केटबॉल: गेंद बास्केट से लौट क्यों आती है?
- बांस के गुणों पर फिर एक नज़र
- क्या बच्चों को सोशल मीडिया की ‘लत’ लग रही है?
- बिन पीए नशा
- व्यायाम और मस्तिष्क
- कोविड वैक्सीन और कभी-कभार खून के थक्के बनना
- लंबी उम्र विरासत में मिलती है
- नए कोशिका एटलस से प्रतिरक्षा व्यवस्था में विविधता उजागर
- सीनोरेब्डाइटिस एलेगेन्स: एक शानदार मॉडल जीव भाग 2
- सीनोरेब्डाइटिस एलेगेन्स: एक शानदार मॉडल जीव
- खुद को आस्तीन की तरह सीधा-उल्टा करता कृमि
- घोंसलों पर लहराती लटकन सजावट नहीं, चकमा है
- परजीवी चींटियों की चालाकी
- अच्छा खाएं, पृथ्वी की सीमा में खाएं
- कितना माइक्रोप्लास्टिक है वातावरण में?
- हिमालय में मिले प्राचीन समुद्री घटनाओं के प्रमाण
- विज्ञान की प्रयोगशाला बनता ग्रीनलैंड
