ब्लडवर्म की सूंडनुमा संरचना (शुण्ड) बड़ी विचित्र सी है। मुगदरनुमा संरचना की भीतरी सतह पर असंख्य नुकीले कांटों जैसे उभार होते हैं जिनमें घातक न्यूरोटॉक्सिन होते हैं। ये जीव अपनी सूंड को शिकार के शरीर पर चिपकाकर उससे सारा पोषण चूस लेते हैं। कमाल की बात यह है कि वे अपनी शुण्ड के भीतरी हिस्से को इस तरह बाहर निकाल लेते हैं और वापिस अंदर कर लेते हैं जैसे कपड़े की आस्तीन हो।
जॉर्जिया इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नॉलॉजी के मेकेनिकल इंजीनियर डेविड हू जानना चाहतेे थे कि ये ब्लडवर्म इस कारस्तानी में इतने कुशल कैसे हैं? और ऐसा करते हुए उनकी मांसपेशियों को क्षति क्यों नहीं होती?
वैसे, जीवजगत में ऐसे लचीलेपन के कई उदाहरण मिलते हैं। घोंघे अपने सिर पर रसायन-संवेदी टेंटेकल्स बाहर पलटते हैं; शिकारियों को दूर भगाने के लिए सनबीम इल्ली ननचुक सरीखे ज़हरीले उपांगों को पलटती है; और कभी-कभी, शार्क और मेंढक कुछ ज़हरीला खा लेने पर अपनी आंतें-पेट बाहर पलट देते हैं। फिर भी ब्लडवर्म जिस कदर अपनी शुण्ड को उलटता है, वह बेमिसाल है। 
शोधकर्ताओं ने जब ब्लडवर्म (Glycera dibranchiata) की इस हरकत को रिकॉर्ड करके बारीकी से अध्ययन किया तो लगा कि ऐसा सूंड पर हर ओर मौजूद अत्यधिक झुर्रियों/सिलवटों की बदौलत संभव है। बहुत ही ज़्यादा झुर्रियां/सिलवटें होने से जब शुण्ड को बाहर की ओर उलटा जाता है, तो अंदर की त्वचा सामान्य से तीन गुना ज़्यादा फैल जाती है और मांसपेशियों को कोई क्षति भी नहीं होती। यह कुछ-कुछ हाथी की सूंड पर मौजूद झुर्रियों की तरह काम करता है। 
ब्लडवर्म अपनी शुण्ड को 2 सेकंड से भी कम समय में पूरा पलटकर बाहर कर लेते हैं। वहीं इसे वापिस अंदर करने में लगभग 8 सेकंड लगते हैं और इसके लिए ज़्यादा जटिल हरकतें करनी पड़ती हैं।
ब्लडवर्म की यह बनावट ऐसे उलटने-पलटने वाले और लचीले रोबोट बनाने में सहायक हो सकती है। ऐसे लचीले रोबोट मरीज़ों की मदद कर सकते हैं; ये रोबोट बिस्तर पर पड़े मरीज़ों के नीचे जाकर फैल और फूल सकते हैं, जिससे नर्सें उन्हें धीरे से इधर-उधर खिसका कर उनकी चादरें आसानी से बदल सकेंगी। (स्रोत फीचर्स)