ऊंचाई पर स्थित तिब्बती पठार पर भूवैज्ञानिकों को लावा के अवशेष मुड़ी-तुड़ी, ऐंठी हुई खपच्चियों के रूप में मिले हैं। ये खपच्चियां ऐसे ज्वालामुखी के बड़े विस्फोटों के अवशेष हैं जो समुद्र के पेंदे में करीब 20 करोड़ साल से भी पहले फूटे थे।
यह तो पता है कि ज्वालामुखियों के ऐसे महाविस्फोटों (जिनसे लाखों सालों तक लाखों घन किलोमीटर लावा निकलता रहता है) के कारण बड़े पैमाने पर सामूहिक जैव विलुप्तियां हुई हैं। ज़ाहिर है बड़े पैमाने पर निकले और दूर-दूर तक फैले लावा ने जीवों के आसपास के पर्यावरण को बदला होगा, कई जीव इसका सामना नहीं कर पाए होंगे और खत्म हो गए होंगे।
महाविस्फोट से निकले और दूर तक बिछे लावा से बने क्षेत्र को विशाल आग्नेय प्रांत कहा जाता है। इन्हें भूमि पर पहचानना आसान होता है क्योंकि इनसे निकले लावा के पठार सदियों तक टिके रहते हैं। लेकिन समुद्र में हुए महाविस्फोट से बने आग्नेय प्रांत पहचानना मुश्किल होता है क्योंकि समुद्र में भूपर्पटी अपेक्षाकृत तेज़ी से मेंटल में तब्दील होती जाती है। नतीजतन अधिकतर समुद्री महाविस्फोटों के प्रमाण मिट जाते हैं। हालिया अध्ययन में वैज्ञानिकों ने ज़मीन के बीच स्थित भूमि में लगभग मिट चुके दो समुद्री महाविस्फोटों के सबूतों की पहचान की है। 
जियोलॉजी में प्रकाशित यह अध्ययन बताता है कि समुद्र में हुए इन महाविस्फोटों ने जीवन के इतिहास को एक से ज़्यादा बार आकार दिया है।
हाल ही में पहचाने गए इन महाविस्फोटों की कहानी लगभग 25 करोड़ साल पहले शुरू होती है, जब पैंजिया सुपर-महाद्वीप लगभग बन चुका था। चीज़ें एक-दूसरे से टकरा रही थीं। हालांकि टेथिस महासागर के पेंदे की ज़्यादातर भूपर्पटी मेंटल में समा गई, लेकिन पेंदे के कुछ अवशेष उन चट्टानों में बचे/फंसे रह गए, जो आगे चलकर हिमालय बनीं।
वैसे, हिमालय में टेथिस महासागर के कई स्रोतों के अवशेष हो सकते हैं, जैसे प्राचीन समुद्री पहाड़ों के या द्वीपों के, या बड़े आग्नेय प्रांत के। इन अवशेषों को पहचानने के लिए जिलिन युनिवर्सिटी के भूवैज्ञानिक जियान-जुन फैन और कर्टिन युनिवर्सिटी के भूविज्ञानी साइमन वाइल्ड की टीम ने मध्य तिब्बत में चट्टानों के बाहर झांकते आउटक्रॉप्स का विश्लेषण किया जो टेथिस महासागर के अवशेष होने की संभावना रखते थे। इन चट्टानों में समुद्री तलछट भी थी जो ठंडे लावा से बनी आग्नेय बेसाल्ट चट्टानों के ऊपर जमा हो गई थी।
कुछ चट्टानों में मिले संकेतों से पता चला कि वे ऐसे महाविस्फोट के अवशेष हैं जिनके बारे में पहले पता नहीं था। रेडियोमेट्रिक काल-निर्धारण से पता चला कि वे लगभग एक ही समय में बने थे, जिससे पता चलता है कि वे एक ही घटना से बने थे। समस्थानिक विश्लेषण से पता चलता है कि बेसाल्ट चट्टानों को बनाने वाला मैग्मा गर्म मेंटल प्रवाह से निकला था।
शोधकर्ताओं का कहना है कि ये चट्टानें दो ज्वालामुखी विस्फोटों के बारे में बताती हैं, जिनके बारे में पहले पता नहीं था। एक विस्फोट लगभग 23.2 करोड़ साल पहले हुआ था, दूसरा विस्फोट लगभग 21 करोड़ साल पहले। अन्य क्षेत्रों के भूवैज्ञानिक अध्ययनों के आधार पर शोधकर्ताओं को लगता है कि लगभग 24.9 करोड़ साल पहले प्राक्-प्रशांत महासागर में तीसरा बड़ा विस्फोट हुआ था।
इन विस्फोटों ने समुद्र के भीतर के जीवन पर कहर बरपाया होगा। पिघली हुई चट्टान के आने से पोषक तत्वों की अधिकता ने शैवाल और अन्य सूक्ष्मजीव जीवन को बढ़ावा दिया होगा, पानी में ऑक्सीजन कम हो गई होगी और बड़े पैमाने पर मौतें हुई होंगी। इन विस्फोटों ने कार्बन डाईऑक्साइड को वायुमंडल में भी छोड़ा होगा, जिससे अनियंत्रित जलवायु परिवर्तन हुआ होगा।
अन्य भूवैज्ञानिक और जीवाश्म रिकॉर्ड खंगालने पर शोधकर्ताओं ने प्रत्येक विस्फोट को महासागरों में ऑक्सीजन की कमी और समुद्री जीवन की विलुप्ति से जुड़ा पाया। समयावधि का अनुमान लगाएं, तो लगता है कि पिछले 50 करोड़ सालों में महाविस्फोटों से विलुप्ति की 160 घटनाएं हुई होंगी। हालांकि यह मात्र अनुमान है। विस्फोटों ने वास्तव में कितना लावा उगला होगा, इसका सटीक अनुमान लगाने के लिए और अधिक काम करने की ज़रूरत है, तभी वास्तविक पैमाने का पता चल सकेगा। (स्रोत फीचर्स)
