नवंबर में ग्रीनलैंड की राजधानी नूक की सड़कें दुनिया भर के वैज्ञानिकों से भरी थीं। वे ‘ग्रीनलैंड साइंस वीक’ नामक एक बड़े सम्मेलन में शामिल होने आए थे, जिसका उद्देश्य आर्कटिक क्षेत्र में हो रहे वैज्ञानिक शोध के बढ़ते महत्व को दिखाना था। सम्मेलन की थीम थी – ‘All Eyes on Greenland (सबकी नज़र ग्रीनलैंड पर)’। इसी दौरान अमेरिका के राष्ट्रपति ट्रंप ने एक बार फिर अमेरिका द्वारा ग्रीनलैंड पर पूर्ण नियंत्रण हासिल करने का विवादित बयान दिया।
हालांकि, बाद में सैन्य कार्रवाई से इन्कार से तनाव कुछ कम तो हुआ, लेकिन अनिश्चितता बनी रही। यह अभी स्पष्ट नहीं है कि इस राजनीतिक रुचि का ग्रीनलैंड में हो रहे वैज्ञानिक शोध पर क्या असर पड़ेगा। लेकिन एक बात बिलकुल स्पष्ट है, ग्रीनलैंड - जिसे स्थानीय लोग ‘कालालित नूनात’ कहते हैं - आज जलवायु परिवर्तन जैसे अहम मुद्दों पर शोध के लिए दुनिया के सबसे महत्वपूर्ण स्थानों में से एक बन चुका है - एक अनोखी प्राकृतिक प्रयोगशाला साबित हो रहा है।
विज्ञान की दृष्टि से देखा जाए तो ग्रीनलैंड की भौगोलिक बनावट, उसका इतिहास और वहां के लोग - तीनों ही खास हैं। सैकड़ों सालों से इनुइट समुदाय का पारंपरिक ज्ञान इलाके के मौसम और पर्यावरण को समझने में मदद करता रहा है। आगे चलकर युरोप के खोजकर्ताओं और अमेरिका के अभियानों ने यहां वैज्ञानिक अध्ययनों को आगे बढ़ाने में योगदान दिया।
1990 के दशक तक ग्रीनलैंड जलवायु विज्ञान का एक बड़ा केंद्र बन गया था। दुनिया भर के वैज्ञानिकों ने यहां की मोटी बर्फ की चादर में गहराई तक जाकर बर्फ के नमूने निकाले। इन नमूनों से यह समझने में मदद मिली कि हज़ारों सालों में पृथ्वी का मौसम कैसे बदलता रहा है।
आज ग्रीनलैंड की बर्फ पर वैज्ञानिक लगातार नज़र रख रहे हैं, जिसका असर पूरी दुनिया के समुद्र स्तर पर पड़ता है। अगर ग्रीनलैंड की पूरी बर्फ पिघल जाए, तो समुद्र का स्तर लगभग 7.4 मीटर तक बढ़ सकता है। अभी भी हर साल यहां बहुत बड़ी मात्रा में बर्फ पिघल रही है - सिर्फ 2024 में करीब 129 अरब टन - जो दुनिया भर में समुद्र के स्तर को बढ़ाने में बड़ा योगदान दे रही है।
ग्रीनलैंड की अहमियत केवल बर्फ तक सीमित नहीं है। वहां की ज़मीन में लीथियम जैसे महत्वपूर्ण खनिज मिलने की संभावना है, जो बैटरी और नवीकरणीय ऊर्जा तकनीकों के लिए बेहद ज़रूरी हैं। इसके अलावा, ग्रीनलैंड आनुवंशिक और जैव-चिकित्सीय शोध के लिए भी एक खास जगह है। यहां की अधिकतर आबादी इनुइट समुदाय की है, जो हज़ारों वर्षों तक बाकी दुनिया से काफी हद तक अलग-थलग रहे। इस कारण उनके जीनोम में ऐसे खास गुण पाए जाते हैं, जो मानव स्वास्थ्य और बदलते वातावरण के अनुसार शरीर के ढलने की प्रक्रिया को समझने में वैज्ञानिकों की मदद करते हैं।
ग्रीनलैंड के बढ़ते वैज्ञानिक महत्व को देखते हुए, वहां की सरकार ने 2022 में पहली बार एक राष्ट्रीय शोध नीति जारी की। इस नीति में 2030 तक की प्राथमिकताएं तय की गई हैं। इसमें कहा गया है कि शोध ग्रीनलैंड की ज़मीन और समाज से जुड़ा होना चाहिए, स्थानीय लोगों की ज़रूरतों को ध्यान में रखकर होना चाहिए और साथ ही दुनिया भर के वैज्ञानिकों के साथ सहयोग के लिए खुला रहना चाहिए। इसका मकसद यह है कि शोध के नतीजों का फायदा ग्रीनलैंड के लोगों के साथ-साथ पूरी दुनिया को मिले।
इस नीति का असर अब दिखने लगा है और ग्रीनलैंड का छोटा लेकिन बढ़ता हुआ शोध तंत्र मज़बूत हो रहा है। इसका सबसे बड़ा उदाहरण है ‘ताराजोक’ नाम का शोध पोत, जो ग्रीनलैंड सरकार द्वारा अब तक की सबसे बड़ी वैज्ञानिक परियोजना है। 2022 से संचालित यह जहाज़ वैज्ञानिकों को दूर-दराज़ के फ्योर्ड्स और समुद्री इलाकों तक पहुंचने में मदद करता है, जहां पहले अध्ययन करना मुश्किल था।
हाल के एक अभियान में इसी पोत की मदद से वैज्ञानिकों ने यह समझने की कोशिश की कि ग्लेशियर से पिघलने वाला पानी समुद्री पारिस्थितिकी से कैसे अंतर्क्रिया करता है। बर्फ से ढंके तटों के पास काम करने की इसकी क्षमता लंबे समय तक आर्कटिक क्षेत्र के अध्ययन के लिए अहम साबित होगी।
तकनीक और भविष्य
ग्रीनलैंड अब आधुनिक तकनीकों को भी तेज़ी से अपना रहा है। पिछले साल ग्रीनलैंड के प्राकृतिक संसाधन संस्थान ने देश का पहला कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI) आधारित कंप्यूटर सिस्टम लगाया। इस तकनीक की मदद से वैज्ञानिक समुद्र के भीतर की वीडियो और आवाज़ों का तेज़ी से विश्लेषण कर सकते हैं, समुद्री जीवों की पहचान कर सकते हैं और मछलियों की संख्या का अनुमान लगा सकते हैं। जो काम पहले महीनों में होता था, अब कुछ ही दिनों में पूरा हो जाता है।
जैसे-जैसे जलवायु परिवर्तन तेज़ हो रहा है और ग्रीनलैंड को लेकर दुनिया की वैज्ञानिक, आर्थिक और राजनीतिक रुचि बढ़ रही है, यह द्वीप एक अहम मोड़ पर खड़ा है। आगे का रास्ता इस बात पर निर्भर करेगा कि अंतर्राष्ट्रीय ध्यान और स्थानीय ज़रूरतों के बीच संतुलन कैसे बनाया जाता है। भावी फैसले न सिर्फ आर्कटिक विज्ञान की दिशा तय करेंगे, बल्कि पूरी पृथ्वी को समझने के हमारे नज़रिए को भी प्रभावित करेंगे। (स्रोत फीचर्स)