शराब पीए बिना नशे जैसे लक्षण दिखने लगें - लड़खड़ाना, अस्पष्ट बोलना, चक्कर आना, भ्रम, एकाग्रता में कमी, थकान, सिरदर्द, मतली, पेट फूलना, त्वचा का लाल होना, और बदमिज़ाजी - तो समझ लीजिए वह व्यक्ति एक तकलीफ से पीड़ित है जिसे तकनीकी भाषा में ऑटो-ब्रुअरी सिंड्रोम (एबीएस) कहते हैं। वैसे तो चिकित्सा साहित्य में ऐसे व्यक्तियों के उल्लेख बहुत कम मिलते हैं लेकिन कई चिकित्सकों का मानना है कि यह सिंड्रोम काफी आम है। तो बगैर एक घूंट भी हलक में उतारे यह नशा होता क्यों है?
इस समस्या पर अनुसंधान उन्नीसवीं सदी में ही शुरू हो गया था और आम मान्यता यह बनी थी कि इसकी वजह व्यक्ति के पेट में खमीर (फफूंद) की अधिकता होती है। जैसा कि सभी जानते हैं हमारी आंतों में फफूंद, बैक्टीरिया के साथ-साथ कई सूक्ष्मजीव निवास करते हैं और प्राय: मददगार होते हैं। यदा-कदा ये हमें बीमार भी करते हैं। तो एबीएस का प्रमुख कारण खमीर (एक किस्म की फफूंद) को माना गया था और यह मत बना था कि जब ये खमीर अत्यधिक मात्रा में आंतों में पलते हैं तो व्यक्ति जो भी शर्करा या अन्य कार्बोहायड्रेट खाता है, उसका किण्वन करके ये अल्कोहल (एथेनॉल) पैदा करते हैं। और अल्कोहल से नशा हो जाता है।
अलबत्ता, हाल ही में नेचर माइक्रोबायोलॉजी जर्नल में प्रकाशित शोध पत्र ने एबीएस पर नई रोशनी डाली है। एबीएस पीड़ितों के बड़े समूह का अध्ययन करके शोधकर्ताओं का निष्कर्ष है कि इस तकलीफ का कारण खमीर नहीं बल्कि आंतों में पलने वाले बैक्टीरिया का असंतुलन है। इससे पहले 2019 में बेजिंग स्थित कैपिटल इंस्टीट्यूट ऑफ पीडियाट्रिक्स के जिंग युआन ने अपने सीमित अनुसंधान के आधार पर यह संभावना व्यक्त की थी। अब इसकी पुष्टि हुई है।
ताज़ा अध्ययन कैलिफोर्निया विश्वविद्यालय (सैन डिएगो) के बर्न्ड स्क्नेबल के नेतृत्व में किया गया है। दरअसल यह गड़बड़ी आम तौर पर मान्य नहीं की जाती, यहां तक कि चिकित्सक भी व्यक्ति पर यकीन नहीं कर पाते कि उसने वास्तव में शराब नहीं पी है। अंतत: कई परीक्षण करके जब इसकी पुष्टि हो जाती है, तो इलाज पूर्व धारणा के आधार पर ही किया जाता है जिसमें फफूंद-रोधी दवाइयां दी जाती हैं। साथ में कुछ एंटीबायोटिक्स देते हैं और व्यक्ति को कम कार्बोहायड्रेट वाली खुराक लेने को कहा जाता है। कार्बोहायड्रेट अल्कोहल-उत्पादक सूक्ष्मजीवों को बढ़ावा देते हैं। लेकिन ऐसे व्यक्तियों में लक्षण बार-बार प्रकट होते रहते हैं।
2019 में किए गए अध्ययन में एबीएस के उभरने के लिए एक बैक्टीरिया क्लेबसिएला न्यूमोनिए को ज़िम्मेदार पाया गया था। अध्ययन में एबीएस की स्थिति में फैटी लीवर रोग को भी एक सहायक बताया गया था।
युआन की टीम ने गंभीर एबीएस से पीड़ित कुछ व्यक्तियों से प्राप्त क्लेबसिएला का प्रत्यारोपण चूहों में किया था। उन्होंने कुछ अन्य व्यक्तियों को भी पहचाना जिनमें क्लेबसिएला के आधिक्य ने एबीएस लक्षणों में उभार उत्पन्न किया।
2019 के अध्ययन के बाद युआन की टीम को काफी लोगों ने संपर्क करके एबीएस जांच करवाने की इच्छा जताई। इसके बाद उन्होंने एबीएस मरीज़ों का अध्ययन शुरू किया। इसके लिए उन्होंने स्क्नेबल की मदद ली।
स्क्नेबल ने ऐसे 22 मरीज़ों की रिपोर्ट प्रस्तुत की है। इनके साथ उन्होंने परिवार के सदस्यों को शामिल किया था ताकि वे इस संभावना को निरस्त कर सकें कि यह दिक्कत एक जैसे भोजन या पर्यावरणीय कारणों से हो रही है। 
अपेक्षा के अनुरूप, एबीएस मरीज़ों की विष्ठा के कल्चर में अल्कोहल बना जबकि परिवार के अन्य लोगों की विष्ठा के कल्चर में नहीं। स्क्नेबल का कहना है कि स्वस्थ लोगों की आंतों में भी थोड़ा अल्कोहल बनता है लेकिन शरीर उसे आसानी से पचा डालता है। एबीएस मरीज़ों में ऐसे एंज़ाइम्स की सांद्रता भी अधिक थी जिससे पता चलता है कि लीवर को क्षति हुई है। एक मरीज़ में तो लीवर सिरोसिस की स्थिति भी पाई गई।
अपने परिजनों की तुलना में एबीएस मरीज़ों में क्लेबसिएला कहीं अधिक मात्रा में था। उनकी आंतों में एशरीशिया कोली (ई. कोली) नामक बैक्टीरिया भी अधिक संख्या में थे, जो अल्कोहल पैदा करते हैं। हालांकि, अब तक इसे रोग का प्रमुख कारण नहीं माना गया था। यह भी देखा गया कि लक्षणों में उछाल के दौरान मरीज़ों की आंतों में ई. कोली बैक्टीरिया की संख्या अधिक थी और इनकी संख्या लगभग लक्षणों की गंभीरता को झलकाती थी।
शोधकर्ताओं को एबीएस मरीज़ों तथा अन्य लोगों के बीच खमीर या अन्य फफूंद के स्तर में कोई खास अंतर नहीं मिला। स्क्नेबल के मुताबिक इसका कारण यह हो सकता है कि कुछ मरीज़ों को पहले ही फफूंद-रोधी उपचार मिल चुका था।
एक मरीज़ का सफल उपचार विष्ठा के सूक्ष्मजीव प्रत्यारोपण (फीकल माइक्रोबायोटा ट्रांसप्लांट, FMT) द्वारा किया गया। इसके लिए उसे एक स्वस्थ दानदाता की विष्ठा कैप्सूल में भरकर खिलाई गई थी। स्क्नेबल अब इस पर आगे काम कर रहे हैं और उनकी कोशिश है कि ज़्यादा लक्षित उपचार मिल सके।
अन्य शोधकर्ताओं का मत है कि फिलहाल यह मानना जल्दबाज़ी होगी कि हमें पूरा जवाब मिल गया है। आगे खोजबीन जारी रखने की ज़रूरत है। (स्रोत फीचर्स)