Sandarbh - Issue 163 (March-April 2026)
- Why Doesn’t the Rainbow Fall to The Ground? by Madhav Kelkar [Hindi, PDF, 337 kB]
इन्द्रधनुष ज़मीन पर गिर क्यों नहीं जाता? - माधव केलकर
इन्द्रधनुष कैसा लगता है आपको? क्या आप उसे छूने के लिए कभी उसकी ओर दौड़े हैं? हमारी कई पाठ्यपुस्तकों में इन्द्रधनुष जैसी हैरतअंगेज़ परिघटनाओं को अक्सर अति-सरलीकृत ढंग से, और कभी-कभी गलत तरह से, समझा दिया जाता है, जिसे बच्चों को ऐसे ही रट लेना पड़ता है। मगर, माधव मानते हैं कि ऊलजलूल जिज्ञासाओं का अपना महत्व होता है। और इस लेख में, वे इन्द्रधनुष के विज्ञान और उससे जुड़ी ऊलजलूल रंगतों को पेश करते हैं। - Caenorhabditis elegans - A Remarkable Model Organism by Kishore Panwar and Sushil Joshi [Hindi, PDF, 246 kB]
सीनोरेब्डाइटिस एलेगेन्स: एक शानदार मॉडल जीव - किशोर पंवार व सुशील जोशी
सी. एलेगेन्स – महज़ एक मिली लम्बाई का यह गोलकृमि जीव आधुनिक विज्ञान कार्य में एक मील का पत्थर है। कारण बहुत सरल-सा है – इसके शरीर की पारदर्शिता। इसी पारदर्शिता के सदके, इसके अंगों और एक-एक कोशिका पर गहन शोध किए जा सकते हैं। और किए भी जाते हैं, इस कदर कि अब तक चार नोबेल पुरस्कार इस बैडऐस कृमि पर हुए शोध कार्य के लिए दिए जा चुके हैं! इस पारदर्शिता में भला कैसे परदे पड़े हैं, यह जानने के लिए पढ़िए किशोर पंवार और सुशील जोशी का यह लेख। - Dark Energy, Black Holes, and Super Radiant Bombs by Vinay RR. Translation from Marathi to Hindi by Madhav Kelkar [Hindi, PDF, 284 kB]
डार्क एनर्जी, ब्लैक होल और सुपर रेडिएंट बम - विनय आर.आर.
ब्लैक होल, डार्क एनर्जी, और अनगिनत आयाम – ब्रह्माण्ड के रहस्यों की उलझी हुई कड़ियाँ हैं। मगर इन कड़ियों को सुलझाने की दिशा में नायाब योगदान दिया है भारत के मशहूर वैज्ञानिक नरेश दधीच ने। उनके इन्हीं योगदानों और ब्रह्माण्ड के रहस्यमयी सत्यों की झलक पाने के लिए पढ़िए, विनय आर.आर. का यह लेख। - A Salute to That Genius by Aamod Karkhanis. Translation from Marathi to Hindi by Madhav Kelkar [Hindi, PDF, 360 kB]
उस प्रतिभाशाली को सलाम - आमोद कारखानीस
‘कुछ नहीं’ की जगह कैसे भरी जाती है? गणित की ऐतिहासिक तरक्की के सफर में, इस बार हमारी नौका पहुँची है पाँचवी शताब्दी में पाटलीपुत्र के किनारे। यहाँ दूसरी नौका में बैठा एक व्यक्ति जटिल गणनाओं में उलझा हुआ है। शायद ही वह यह जानता हो कि उसकी उलझन इतने वर्ष पार करके आपकी सब्ज़ी-भाजी के हिसाब सुलझाएगी, और इन्सान को चाँद पर पहुँचाएगी। यह कैसा सफर है? कैसी उलझन है? जानिए आमोद कारखानीस के इस लेख में। - Learning Opportunities: Part 6 by Amit and Jayshree [Hindi, PDF, 994 kB]
सीखने के अवसर - अमित और जयश्री
सीखने के अवसर क्या बस पाठ्यपुस्तकों में ही होते हैं? अपने आसपास, नदी, खेत, और लोगों में नहीं? इन अवसरों में सचेत अवलोकन की क्या भूमिका होती है? आधारशिला में शिक्षा ‘शिक्षण’ से ज़्यादा ‘सीखने’ में रूप लेती थी। और ये रूप भी कितने सारे – ‘अकाल’ का अर्थ समझने के लिए गाँव के इतिहास पर किताब लिख देना, ज्ञान के सत्ताधारी स्रोतों को चुनौती देना, स्कूल में झोपड़ियों का गाँव बना देना, छोटे-से सवाल से अव्वल दर्जे का शोधकार्य कर देना! क्या शिक्षा का असली मकसद इन अवसरों में समाता है? इन सवालों पर मंथन करने के लिए पढ़िए अमित और जयश्री की आधारशिला लेख शृंखला की इस कड़ी को। - Five Days, Four Nights — Shahpur Visit: Part 6 by Anil Singh [Hindi, PDF, 427 kB]
पाँच दिन, चार रातें: शाहपुर विज़िट - अनिल सिंह
किस्सा है यह शाहपुर में अनूप के खेत का, जहाँ आनंद निकेतन और मुस्कान संस्था के बच्चे-बड़े पाँच दिन और चार रातें बिताने पहुँचे थे। इस बीच क्या-कुछ नहीं घटा – टिफी नाम की कुतिया से दोस्ती, करंज के पेड़ के नीचे बैठकें, नदी-पहाड़ की सैर, मिलकर खाना पकाना, भूत का सताना, महुआ का सड़ना, चूज़ों की चीं-चीं, और ढेर सारे खेल व गीत। अनिल सिंह की लेख शृंखला की इस कड़ी में आनन्द और मुस्कान की कोई कमी नहीं है, सचमुच! - A Series of Social Reforms: Part 8 by Prakash Kant [Hindi, PDF, 422 kB]
सामाजिक सुधारों का सिलसिला - प्रकाश कान्त
मनुष्य का सामाजिक विकास बहुत लम्बा रहा है, मगर उसके बावजूद समाज पूरी तरह न्यायपूर्ण और खुशहाल नहीं है। ज़ाहिर है, सामाजिक विज्ञान के शिक्षण में, खास तौर पर इतिहास शिक्षण में, यह जानना ज़रूरी बन जाता है कि विकास के इस सफर में समाज की खामियों और बदमिज़ाजी को दुरुस्त करने के लिए क्या-कुछ किया गया है। ऐसा करने पर क्या होता है? एक शिक्षक बतौर अपने ऐसे ही अनुभवों को प्रकाश कान्त इस लेख में पेश करते हैं। - Aaloo Ki Aankh: Part 2 by Rajesh Joshi [Hindi, PDF, 381 kB]
आलू की आँख: भाग 2 - राजेश जोशी
“आलू की इस धरती से पैदा होगा कल का महापुरुष,” ऐसा मास्टरजी एक पल को सोचते हैं। मगर ये आलू की धरती आदर्श नहीं, फायदा माँगती है। क्या मास्टरजी स्कूल की सत्ता और उसकी उलझन से सुलझ पाते हैं? क्या कल के महापुरुष आज के आम पुरुष में अपनी जड़ें जमा पाते हैं? इस आशाहीन शिक्षा तंत्र में उनका क्या किरदार है, कौन-सा गुट है? जानने के लिए पढ़िए, राजेश जोशी की कहानी का यह दूसरा और अन्तिम भाग। - Ishwar Ki Kahaniyan: Second Story by Vishnu Nagar [Hindi, PDF, 109 kB]
ईश्वर की कहानियाँ: दूसरी कहानी - विष्णु नागर
ईश्वर भी अजीब हैं भला! अब सोने के सिक्के तौहफे में देने हैं तो बताकर दीजिए ना। खामखाह मज़दूर पिट गया उनके चक्कर में। विष्णु नागर की यह छोटी-सी कथा पढ़िए, और ईश्वर को कटघरे में लाइए। - Why are Lemons and Chilies Hung in Front of Shops? from Sawaliram [Hindi, PDF, 119 kB]
दुकानों के सामने नींबू-मिर्च क्यों लटकाया जाता है?: - सवालीराम
बुरी नज़र, नज़रबट्टू, लक्ष्मी-अलक्ष्मी, विश्वास-अन्धविश्वास – इस तरह के कई पहलू जुड़े हैं इस सवाल से। पढ़कर देखिए, सवालीराम इसका क्या जवाब देते हैं।

