डायनासौर के जितने जीवाश्म मिलें, कम हैं। जितनी अधिक संख्या में ये मिलेंगे, जैव विकास के कुछ अनसुलझे रहस्य उतनी आसानी से सुलझेंगे। लेकिन दिक्कत यह है कि हर किसी को इनकी पहचान नहीं होती, इनकी पहचान के लिए नज़रों को पैना और पारखी होना पड़ता है। यदि नज़रें तेज़ हों तो भी पत्थरों और झाड़-झंखाड़ वाले विशाल भूभाग में बिखरे इन जीवाश्मों को खोजना मुश्किल होता है।
लेकिन करंट बायोलॉजी में प्रकाशित हालिया अध्ययन से ऐसा लगता है कि अब यह मुश्किल दूर होने वाली है। जीवाश्मों को खोज निकालने में वैज्ञानिकों का साथ देने वाले हैं चटख रंग के लाइकेन (फफूंद और शैवाल के संगम से बने जीव)। 
हाल ही में, कनाडा के डायनासौर प्रोविन्शियल पार्क में शोधकर्ताओं ने चटख नारंगी रंग की ऐसी लाइकेन की पहचान की है जो डायनासौर की हड्डियों पर फलती-फूलती हैं, जबकि उसके आसपास के पत्थरों और चट्टानों को अपेक्षाकृत अछूता छोड़ देती हैं। इससे जीवाश्म को पहचानना आसान हो सकता है। 
ऐसा शायद इसलिए होता है क्योंकि खासकर क्रेटेशियस काल की अश्मीभूत हड्डियों की क्षारीय, कैल्शियम युक्त और छिद्रमय संरचना कनाडाई बैडलैंड्स जैसे अर्ध-शुष्क वातावरण में लाइकेन को पनपने के लिए माकूल परिस्थिति देती है। 
वैसे तो लाइकेन कई तरह के जीवाश्मों पर फल-फूल कर उन्हें चटख रंगों से रंग सकती हैं, लेकिन यह शाकाहारी ऑर्निथिशियन डायनासौर की बड़ी हड्डियों को सबसे अधिक उजागर करती हैं। और इन डायनासौर के जीवाश्म इस पार्क में बहुतायत में पाए जाते हैं। उम्मीद है, अब लाइकेन से ढंके जीवाश्मों को विशेष सेंसर से लैस ड्रोन की मदद से पहचाना जा सकेगा। (स्रोत फीचर्स)