पुरुषों के लिए लंबी आयु की सारी कामनाओं, प्रार्थनाओं के बावजूद मैं अपने परिजनों में पाता हूं कि पुरुष पहले स्वर्ग सिधारते हैं और अक्सर महिलाएं लंबी आयु प्राप्त करती हैं। तो क्या पुरुष जन्म से ही पहले मरने के लिए नियत हैं? सभी परिस्थितियां समान मिलें तो भी मेरे साथ पैदा हुई महिला की तुलना में मैं तीन वर्ष पूर्व मरने के लिए अभिशप्त हूं।
महिला-पुरुष के जीवनकाल में अंतर बहुत पहले से ज्ञात है। यह केवल भारत में ही नहीं पूरे विश्व में पत्थर की लकीर-सा नियम है। तो पुरुषों में ऐसा क्या है कि वे महिलाओं की तुलना में अल्प आयु में मर जाते हैं। हाल ही के शोध कार्यों से हम इस तथ्य का कारण समझने के समीप पहुंचे हैं।
कुछ लोग पुरुषों के छोटे जीवनकाल का कारण व्यवहार में अंतर को मानते हैं। व्यवहार, जैसे पुरुष युद्ध लड़ते हैं, खदानों में कार्य करते हैं, श्रमयुक्त मज़दूरी करते हैं और इस प्रकार अपने शरीर पर अतिरिक्त दबाव डालकर भी मैदान में डटे रहते हैं। सामाजिक विज्ञान के कुछ वैज्ञानिकों का मानना है कि पुरुष आदतन झक्की होते हैं। वे अत्यधिक धूम्रपान करते हैं, अनियंत्रित पीते हैं और पेटू होते हैं इसलिए उनका वज़न ज़्यादा होता है। बीमार होने पर चिकित्सीय सहायता लेने में भी आना-कानी करते हैं और बीमारी का पता चल जाए तो भी अधिक संभावना इस बात की रहती है कि वे पूरा उपचार ना लें। साथ ही, वे गुस्सैल होते हैं और आपसी लड़ाई, दुर्घटना और अत्यधिक जोखिम भरे कार्य पसंद करते हैं। इस दौरान चोट अथवा बीमारी से उनका शरीर कमज़ोर हो जाता है। किंतु यदि ऐसा ही था तो पुरुषों को आरामदायक कार्य मिलने पर तो दोनों का जीवनकाल एक जैसा होना था।
तो क्या हमारे करीबी रिश्तेदार वानरों में भी ऐसा ही है? मानव को छोड़कर बाकी सभी प्रायमेट्स पर भी वैज्ञानिकों ने शोध किया। वे देखना चाहते थे कि क्या हमारे नज़दीकी रिश्तेदार वानरों में भी मादा की आयु नर से ज़्यादा होती है? वैज्ञानिकों ने 6 जंगली प्रायमेट्स (सिफाकास, मुरिक्विस, गोरिल्ला, चिम्पैंजी और बबून) के ऐसे समूह से उम्र सम्बंधी आंकड़े बटोरे जिनकी संख्या समूह में 400 से 1500 तक थी। फिर शोधकर्ताओं ने आधुनिक एवं ऐतिहासिक दोनों समय के छह मानव समूह की आबादी के आंकड़े भी देखे। वैज्ञानिकों ने पाया कि पिछली शताब्दी की तुलना में मानव आयु में बहुत वृद्धि होने के बावजूद पुरुष-महिला के जीवनकाल में अंतर कम नहीं हुआ। शोध से यह भी बात सामने आई कि मानव आबादी में यद्यपि महिलाएं ज़्यादा समय तक जीवित रहती हैं परंतु भौगोलिक वितरण के अनुसार यह अंतर अलग-अलग रहा था। उदाहरण के लिए आधुनिक रूस में पुरुष-महिला के जीवनकाल में अंतर लगभग 10 वर्ष का है जो सबसे अधिक है। 
अधिक उम्र का जैविक कारण
जीव विज्ञानी अल्पायु के लिए पुरुषों के गुणसूत्रों को दोषी ठहराते हैं। महिलाओं को निश्चित रूप से जैविक लाभ जन्म के साथ ही प्राप्त होने लगता है। बाहरी प्रभावों के अभाव में भी लड़कों की मृत्यु दर लड़कियों से 25-30 प्रतिशत अधिक देखी गई है। आंकड़े भी महिलाओं के जन्मजात आनुवंशिक लाभ दर्शाते हैं। 
मनुष्यों तथा कई अन्य जंतुओं में लिंग का निर्धारण गुणसूत्रों द्वारा होता है। मनुष्यों की कोशिकाओं में कुल 23 जोड़ी गुणसूत्र पाए जाते हैं। इनमें 22 जोड़ियों में तो गुणसूत्र परस्पर पूरक होते हैं। लेकिन 23वीं जोड़ी में दो गुणसूत्र अलग-अलग किस्म के होते हैं। शुक्राणु दो प्रकार के होते हैं (X तथा Y), जबकि सारे अंडाणु एक ही प्रकार के होते हैं (X)। यदि व्यक्ति में दोनों गुणसूत्र X हों तो मादा यानी लड़की बनती है और जब एक गुणसूत्र X तथा Y दूसरा हो तो नर यानी लड़का। 
जब इन X गुणसूत्रों के जीन्स में से एक जीन उत्परिवर्तित होता है तो महिलाओं में पाया जाने वाला दूसरा X गुणसूत्र उसके कार्य को संभाल लेता है या उसके दुष्प्रभाव को दबा देता है। जबकि पुरुषों में केवल एक X गुणसूत्र होने के कारण उसमें उत्परिवर्तन हो जाए तो गंभीर परिस्थिति उत्पन्न कर सकता है। 
इस प्रकार दोनों लिंगों के बीच जेनेटिक अंतर एक लिंग में उम्र बढ़ाता है तो दूसरे में कम कर देता है। इसके अलावा महिलाओं के हार्मोन और प्रजनन में महिलाओं की अगली पीढ़ी में निवेश की महत्वपूर्ण भूमिका को भी दीर्घायु से जोड़ा गया है। उदाहरण के लिए महिलाओं में बनने वाला हार्मोन एस्ट्रोजन खराब कोलेस्ट्रॉल को खत्म करने में कारगर है जिससे महिलाओं का शरीर हृदय सम्बंधी बीमारियों से प्राय: सुरक्षित बना रहता है। दूसरी ओर केवल पुरुषों में बनने वाला टेस्टोस्टेरॉन हार्मोन उनमें हिंसा और जोखिम लेने की उत्कंठा उत्पन्न करता है। आखिर में महिलाओं का शरीर गर्भावस्था और स्तनपान की ज़रूरतों के अनुसार भोजन का भंडारण करने के लिए बना होता है। वे भोजन की ज़्यादा मात्रा को भी उचित तरीके से संग्रहित या शरीर के बाहर निकालने के अनुरूप ढली हुई हैं। इसके अलावा भी अनेक आनुवंशिक एवं जैविक कारण ज्ञात हैं जिनका स्त्री और पुरुष दोनों के शरीर पर समग्र प्रभाव को मापना असंभव है। पिछले कुछ दशकों में असाधारण आर्थिक और सामाजिक प्रगति से मातृत्व बोझ में नाटकीय कमी भी देखी गई है। इस प्रकार सभी परिस्थितियां महिलाओं को अनुकूल बनाती हैं।
एक परिकल्पना ‘जॉगिंग हार्ट’ के अनुसार माहवारी चक्र के उत्तरार्ध में, यानी अंडोत्सर्ग के बाद, हृदय की गति बढ़ जाती है। हृदय गति बढ़ने से वैसी ही लाभकारी परिस्थिति उत्पन्न होती है जैसी हल्का व्यायाम करने पर या जॉगिंग करने पर होती है। बाद के जीवन में इसके लाभकारी असर देखे जा सकते हैं। इसलिए हृदय रोग का जोखिम भी महिलाओं को बेहद कम होता है। 
अधिक कद भी एक महत्वपूर्ण कारक है। लंबे लोगों में अधिक कोशिकाएं होती हैं। इसलिए उन्हें अधिक ऊर्जा की आवश्यकता होती है। अधिक कोशिकाओं में उत्परिवर्तन की संभावनाएं भी अधिक हो जाती है तथा ज़्यादा ऊर्जा खर्च करने से कोशिकाएं जल्दी बूढ़ी हो जाती हैं। अत: पुरुषों की अधिक ऊंचाई उन्हें अधिक दीर्घकालीन क्षति की ओर धकेलती है।
वे कारण जो महिलाओं को लंबी उम्र देते हैं कई बार अटपटे, अनिश्चित और रहस्यमयी लगते हैं। लेकिन इतना तो तय है कि सारी प्रार्थनाएं और व्रत-उपवास इस खाई को पाट नहीं सके हैं। (स्रोत फीचर्स)