लेखक :  कविता कृष्णा   [Hindi PDF, 210 kB]
अनुवाद: भरत त्रिपाठी     

आकलन

आप किसी व्यक्ति को तब तक ठीक से नहीं समझ सकते जब तक आप उससे जुड़ी बातों के बारे में उसके नज़रिए से नहीं सोचते... जब तक आप उसके मन में उतरकर उसका जीवन नहीं जीते।

हार्पर ली, टू किल अ मॉकिंगबर्ड

जब पहली बार मैंने, 15 साल की उम्र में, टू किल अ मॉकिंगबर्ड पढ़ी थी, तो इन शब्दों ने मुझ पर गहरी छाप छोड़ी थी। मैं अक्सर सोचती थी कि किसी दूसरे व्यक्ति की आँखों से दुनिया कैसी दिखाई देती होगी। सड़क के नुक्कड़ पर बैठा मोची, बस स्टॉप पर खड़ा मूँगफली बेचने वाला व्यक्ति, मंच पर खड़े प्राचार्य: इन लोगों को दुनिया कैसी दिखाई देती होगी? दोपहर की अपनी उबाऊ कक्षा में बैठे हुए मैं यही सोचती थी कि क्या मेरी शिक्षिका ने कभी अपने विद्यार्थियों की जगह पर खुद को रखकर सोचा था। अगर वह मेरी आँखों से कक्षा को देख सकती, तो क्या कुछ बदल पाता? क्या पढ़ाई के साथ-साथ थोड़ा हँसी-मज़ाक करके वे कक्षा को जीवन्त कर पातीं? क्या वे हमें कम होमवर्क देने लगतीं? क्या वे खुद बोलना कम करके हमें ज़्यादा बोलने देतीं? जब पढ़ाना शुरू किया, तो मैंने पाया कि चीज़ों को, स्थितियों को विद्यार्थियों के नज़रिए से देखने पर पढ़ाना ज़्यादा दिलचस्प और ज़्यादा मज़ेदार हो जाता है। मुझे यह भी लगता है कि इस समझ ने मुझे बेहतर शिक्षिका बनाया। अपने विद्यार्थियों के नज़रियों को हम अलग-अलग तरीकों से समझ सकते हैं। इस लेख में मैं इस बात की पड़ताल कर रही हूँ कि सीखने और सिखाने के तरीकों को बेहतर बनाने के लिए विद्यार्थियों के नज़रियों को इकट्ठा करने में लिखित फीडबैक की प्रश्नावली किस प्रकार उपयोगी हो सकती है। इस लेख में मैंने ऐसे कुछ तरीकों का वर्णन किया है जिनके द्वारा हम विद्यार्थियों से फीडबैक एकत्र कर सकते हैं, उनका अर्थ लगा सकते हैं और उन पर अपनी प्रतिक्रिया दे सकते हैं। फीडबैक है क्या? शब्दकोश के अनुसार फीडबैक ‘ऐसी प्रक्रिया जिसके द्वारा किसी व्यवस्था के उत्पाद, परिणाम, या प्रतिक्रिया के द्वारा स्वयं उस व्यवस्था में संशोधन किया जा सकता है, उसे नियंत्रित किया जा सकता है, या उसे बदला जा सकता है’।

फीडबैक से सीखना
शिक्षकों के रूप में हम निरन्तर अपने विद्यार्थियों को फीडबैक देते रहते हैं। उनकी कॉपियों में सुधार करना, कक्षाओं में उन्हें सुझाव देना या स्कूल के गलियारे में उन्हें कुछ याद दिलाना - ये सभी फीडबैक के प्रकार ही हैं। शिक्षकों के रूप में हम यह मानते हैं (और कभी-कभी तो आशा करते हैं!) कि हमारे फीडबैक का हमारे विद्यार्थियों के सीखने पर सकारात्मक प्रभाव पड़ रहा होगा। फीडबैक वह तरीका है जिसके द्वारा हम अपने दृष्टिकोण और चिन्ताओं को विद्यार्थियों तक पहुँचा सकते हैं। शिक्षकों के रूप में हमें खुद भी निरन्तर फीडबैक मिलता रहता है। विद्यार्थियों से मिलने वाले फीडबैक से हमें अपने सिखाने के तरीकों में संशोधन करने या उन्हें बदलने में मदद मिलती है। विद्यार्थियों के चेहरों पर उभरने वाले भाव, उनके द्वारा पूछे जाने वाले सवाल और उनका लिखित कार्य - ये सभी विद्यार्थियों से मिलने वाले फीडबैक के ही प्रकार हैं। इस प्रकार का फीडबैक बेहद उपयोगी होता है, भले ही कभी-कभी उसे एकदम सही-सही समझ पाना मुश्किल होता हो। विद्यार्थियों द्वारा ली जा रही जम्हाइयाँ क्या यह दर्शाती हैं कि पाठ उबाऊ है, अथवा यह, कि विद्यार्थी रात को देर तक जाग रहे थे? विद्यार्थियों के नज़रियों व उनकी चिन्ताओं को समझने का एक सीधा तरीका है उन्हीं से पूछना। लिखित प्रश्नावली विद्यार्थियों से फीडबैक हासिल करने का एक व्यवस्थित तरीका है। फीडबैक की प्रश्नावली में हम यह तय कर सकते हैं कि हमें किस बात पर ध्यान केन्द्रित करना है। विद्यार्थी जो कुछ सीख रहे हैं उसके बारे में हम उनके दृष्टिकोण को जान सकते हैं। हमें अपने सिखाने के तरीकों के बारे में भी फीडबैक मिल सकता है।

लिखित फीडबैक कब, कैसे?
लिखित फीडबैक किसी सत्र के बीच में लिया जा सकता है, क्योंकि तब हमारे पास मौके रहते हैं कि हम जो पढ़ा रहे हैं, और जिस तरह पढ़ा रहे हैं, उसमें बदलाव कर सकें। विद्यार्थियों की प्रतिक्रियाओं से हमें यह जानने में मदद मिल सकती है कि हमारे पढ़ाने के तरीके में उन्हें कौन-सी बात मददगार लगती है और कौन-सी मुश्किल लगती है। इससे हमें उन विद्यार्थियों की चिन्ताओं को समझने में भी मदद मिल सकती है जो अन्यथा खुल कर अपनी बात कहने में कतराते हैं। लिखित फीडबैक पाठ्यक्रम के अन्त में भी लिया जा सकता है, और तब हमें इससे भविष्य की योजनाएँ बनाने के लिए बहुत-से सुझाव मिल सकते हैं। यह प्राथमिक स्कूल के छोटे विद्यार्थियों तथा हाई स्कूल के बड़े विद्यार्थियों, दोनों के लिए लाभकारी होता है। ज़ाहिर है कि प्रश्नावलियों को उम्र के मुताबिक तैयार करना होगा। लिखित फीडबैक को कक्षा के समय में ही 10 से 15 मिनटों में प्राप्त किया जा सकता है। विद्यार्थियों को इस बात का पूरा भरोसा दिलाया जाना चाहिए कि उनकी पहचान उजागर नहीं होगी ताकि वे अपनी राय खुलकर व्यक्त कर सकें। विद्यार्थियों को फीडबैक का उद्देश्य बताना भी उपयोगी होता है। मैं अपनी प्रश्नावलियों की शुरुआत में अक्सर यह वाक्य जोड़ दिया करती हूँ - ‘इस प्रश्नावली पर आपकी प्रतिक्रियाओं से मुझे अपने, और साथ-साथ आपके काम की समीक्षा करने में मदद मिलेगी’। हम प्रश्नावली में कई तरह के सवाल पूछ सकते हैं, पर यह इस बात पर निर्भर करेगा कि हम सीखने-सिखाने के किन पहलुओं पर ध्यान केन्द्रित करना चाहते हैं। प्रश्नों की दो मुख्य श्रेणियाँ हैं जिन्हें मैं बहुत उपयोगी मानती हूँ। पहली श्रेणी में शिक्षण या सिखाने के तरीकों से जुड़े सवाल होते हैं। दूसरी श्रेणी में ऐसे सवाल होते हैं जो विद्यार्थियों को उनके सीखने पर सोचने-विचारने के लिए प्रेरित करते हैं।

शिक्षण के तरीकों पर सवाल
इस श्रेणी में ब्लैक-बोर्ड के उपयोग, कक्षा में हमारे द्वारा इस्तेमाल की जाने वाली भाषा, और विद्यार्थियों द्वारा पूछे जाने वाले प्रश्नों पर हमारे रवैये से जुड़े सवाल हो सकते हैं। इन सवालों से मिली विद्यार्थियों की प्रतिक्रियाओं से मैं यह जान पाती हूँ कि मेरे सिखाने के ढंग में क्या बात कारगर साबित हो रही है। मुझे यह भी पता चलता है कि किन क्षेत्रों में मुझे सुधार की ज़रूरत है। इन सवालों को बच्चों के सामने रखना ही मुझे इस बारे में अधिक जागरूक बना देता है कि मैं कक्षा में क्या सम्प्रेषित कर पा रही हूँ और कैसे कर पा रही हूँ। इस पहलू के बारे में मैं विद्यार्थियों से जो फीडबैक माँगती हूँ उसका एक उदाहरण इस प्रकार है: इस वर्ष विज्ञान की कक्षाओं में हुए शिक्षण से जुड़े इन वक्तव्यों के बारे में कृपया अपनी प्रतिक्रिया दें। आपकी राय से मिलते-जुलते बॉक्स में सही का निशान लगाएँ। यदि आप कुछ कहना चाहते हों या कोई सुझाव देना चाहते हों तो उन्हें अन्तिम खण्ड में लिखें (देखिए तालिका)।

 कथन     पूरी तरह से सहमत  सहमत  असहमत  पूरी तरह से असहमत  अन्य टिप्पणी या सुझाव
 कक्षा में पढ़ाया गया टॉपिक प्रासंगिक और रुचिकर था।          
 शिक्षक द्वारा इस्तेमाल की गई भाषा स्पष्ट और समझने में आसान थी।          
 शिक्षक ने ब्लैक-बोर्ड का इस्तेमाल अच्छी तरह से किया।          
 शिक्षक द्वारा दी गई व्याख्याएँ स्पष्ट और समझ में आईं।          
 गतिविधियाँ  अच्छे  से संचालित की गईं और निर्देश स्पष्टता से दिए गए।          
 असाइनमेंट्स और टेस्ट में समय पर सुधार कार्य किया गया।          
 शिक्षक ने आपके काम पर साफ-साफ और उपयोगी  फीडबैक दिया।          


विद्यार्थियों की प्रतिक्रियाओं ने अक्सर ऐसे पहलुओं को उजागर किया है जिनमें मैं अपनी कार्यकुशलता को और बेहतर कर सकती हूँ। यहाँ मैं विद्यार्थियों से मिली टिप्पणियों और सुझावों के कुछ उदाहरण दे रही हूँ जिन्होंने मुझे ऐसे तरीकों को तलाशने के लिए प्रेरित किया जिनसे मैं अपने शिक्षण को बेहतर बना सकती थी।

‘अक्का मेरे खयाल से आपको चित्रकला का प्रशिक्षण लेना चाहिए। कई बार ब्लैक-बोर्ड पर आप जो चित्र बनाती हैं वे हमें समझ में नहीं आते।’ इसके बाद मैं ब्लैक-बोर्ड पर चित्रों और आरेखों को ज़्यादा सरल और स्पष्ट ढंग से बनाने पर ध्यान देने लगी हूँ। इसके अलावा किसी भी नए आरेख या चित्र को ब्लैक-बोर्ड पर बनाने से पहले मैं उसका अभ्यास कर लेती हूँ।
‘आप प्रयोगशाला के कार्य के लिए निर्देश ज़्यादा ही विस्तार से देती हैं और उसमें बहुत समय गँवाती हैं। यह बहुत उबाऊ हो जाता है’। अब मैं इस बारे में ध्यान से सोचती हूँ कि प्रयोगशाला के कार्य से पहले मुझे विद्यार्थियों से क्या कहना है। मैंने विस्तृत निर्देशों की बजाय रंग-बिरंगे पोस्टरों का प्रयोग करना शु डिग्री कर दिया है जिनके द्वारा मैं विद्यार्थियों को प्रयोगशाला के नियम याद दिलाती हूँ। मैं विद्यार्थियों को इस बात के लिए भी प्रोत्साहित करती हूँ कि वे स्वतंत्र रूप से भी लिखित निर्देशों को पढ़ें और उनका अनुसरण करें।
‘मुझे दोपहर बाद की कक्षाओं में नींद आती है। दोपहर के समय हम कक्षा से बाहर की और ज़्यादा गतिविधियाँ कर सकते थे।’
इसलिए तत्पश्चात् जब भी सम्भव होता है तो नींद आने वाले उस समय में अध्ययन यात्राएँ, कक्षा के भीतर प्रश्नोत्तर एवं परियोजना कार्य कराए जाते हैं।

‘मेरी कॉपी में आपने जो फीडबैक दिया उससे मुझे बहुत मदद मिली है।’
इन प्रतिक्रियाओं से मुझे विद्यार्थियों की कॉपियों में काफी विस्तृत रूप से लिखित फीडबैक देते रहने का प्रोत्साहन मिलता है, भले ही इसके लिए मुझे ज़्यादा समय देना पड़े।
विद्यार्थियों के सीखने के बारे में सवाल
दूसरी श्रेणी के सवाल, विद्यार्थी क्या सीख रहे हैं, इसके बारे में उन्हीं के दृष्टिकोण को उजागर करते हैं। कक्षाओं में विद्यार्थियों को क्या मुश्किलें आईं, उन्हें क्या बात मूल्यवान लगी, इससे जुड़े प्रश्न इस श्रेणी में होते हैं। यहाँ मैं उदाहरण स्वरूप कुछ प्रश्न दे रही हूँ जिनसे मुझे विद्यार्थियों की चिन्ताओं को समझने में मदद मिली:
* इस वर्ष आपने विज्ञान की कक्षा में जो सबसे महत्वपूर्ण बातें सीखीं वे कौन-सी हैं?
* आप क्या सोचते हैं कि आप कौन-सी चीज़ बेहतर ढंग से कर सकते थे?
* इस वाक्य को पूरा करें और बताएँ कि आप विज्ञान के बारे में क्या महसूस करते हैं। ‘विज्ञान ......... है’।
* गणित की कक्षाओं में आपको सबसे अधिक क्या पसन्द आया?
* गणित की कक्षाओं में आपको कौन-सी बात सबसे कम पसन्द आई?
इस तरह के सवाल मुझे दो तरीकों से बहुत उपयोगी लगे। पहला तो यह कि विद्यार्थियों के उत्तरों से यह पता चल जाता है कि सिखाने का मेरा कौन-सा तरीका काम कर रहा है और कौन-सा नहीं। विद्यार्थी जो कठिनाइयाँ महसूस कर रहे हैं, मुझे उनका आभास हो जाता है। कौन-सी बातों से उनमें उत्साह का संचार होता है, इसका भी आभास मुझे उनके उत्तरों से हो जाता है।
इस पूरी गतिविधि का दूसरा लाभ विद्यार्थियों को भी है। विद्यार्थियों को मौका मिलता है कि वे अपने सीखने को लेकर खुद सोचें-विचारें। विद्यार्थी क्या सीखते हैं और किस तरह सीखते हैं, इसके बारे में आगे की चर्चाओं के लिए उनकी ये प्रतिक्रियाएँ एक शुरुआती बिन्दु का काम कर सकती हैं। यहाँ मैं उदाहरण स्वरूप माध्यमिक स्कूल के विद्यार्थियों की कुछ प्रतिक्रियाएँ साझा कर रही हूँ:
* जब तक मुझे उत्तर मिलते जाते हैं तब तक मुझे गणित के सवाल करना अच्छा लगता है।
* मुझे लगता है कि मैं अपने समूह के सदस्यों के साथ बेहतर तालमेल कर सकता था।
* मुझे कक्षा में और विस्तार से नोट्स बनाना चाहिए थे।
* मैंने हाथ ऊँचा करना, और फिर अपनी बारी का इन्तज़ार करना सीखा।
* मुझे समूह में काम करना बिलकुल भी अच्छा नहीं लगता। मेरे खयाल से हमें अकेले-अकेले काम करने देना चाहिए।
* मैंने जो दो सबसे महत्वपूर्ण बातें सीखीं वे थीं, सवाल पूछना और समूह में काम करना।
* मैंने पौधों के बारे में बहुत कुछ सीखा।

फीडबैक पर प्रतिक्रिया देना
जब विद्यार्थी सकारात्मक फीडबैक दें, तो अच्छा लगता है। लेकिन विद्यार्थी अगर ईमानदारी बरतें, तो वे हमेशा वही नहीं कहेंगे जो हम सुनना चाहते हों। हो सकता है कि विद्यार्थी ऐसा फीडबैक दें जिससे हम सहमत न हों। हो सकता है कि उनकी प्रतिक्रियाओं से हमें कष्ट पहुँचे, गुस्सा आए या पछतावा हो। यह बहुत ज़रूरी है कि हम इन भावनाओं को स्वीकार करें, और फिर आगे बढ़ जाएँ। विद्यार्थियों के फीडबैक के प्रति खुला रवैया रखना बहुत ज़रूरी है, चाहे उनका फीडबैक सकारात्मक लगे अथवा नकारात्मक। फीडबैक पर अपनी प्रतिक्रिया देते समय निष्पक्षता व तटस्थता का भाव रखने से मदद मिलती है। मुझे खुद से यह सवाल करना मददगार लगता है: इस दृष्टिकोण से मैं क्या सीख सकती हूँ? फीडबैक, प्रशंसा या आलोचना से भिन्न है; इसका उद्देश्य होता है सीखने व सिखाने में सुधार करने में हमारी मदद करना।

विद्यार्थियों के फीडबैक पर प्रतिक्रिया देने की तरफ सबसे पहला कदम है उनके फीडबैक को तत्काल स्वीकार करना। सकारात्मक व नकारात्मक, दोनों तरह के फीडबैक को स्वीकार करने से विद्यार्थियों को यह सन्देश मिलता है कि हम उनकी बातों को गम्भीरता से लेते हैं, और उनके विचारों के प्रति खुला रवैया रखते हैं। फिर उनके फीडबैक पर काम करना अगला चरण है, पर प्रतिक्रिया देने का अर्थ यह नहीं है कि हमें उनके सारे-के-सारे सुझावों को अपनाना होगा। हो सकता है कि फीडबैक के कुछ ऐसे पहलू हों जिन पर हम कुछ भी न करने का निर्णय लें।

हो सकता है कि विद्यार्थियों के कुछ सुझाव अनुपयुक्त हों या उन्हें लागू करना बहुत कठिन हो। विद्यार्थियों तक अपनी यह बात पहुँचाना बहुत ज़रूरी है कि क्यों हम ऐसे फीडबैक को अंगीकार नहीं कर रहे हैं। विद्यार्थियों की प्रतिक्रिया के बाबत हम जो बदलाव करने का निर्णय लेते हैं उसके बारे में भी हमें छात्रों को बताना चाहिए। उनके फीडबैक को लेकर हमारी प्रतिक्रिया हमारे लिए एक मौका हो सकती है, कि हम पूरी कक्षा को लेकर अपनी अपेक्षाओं को ज़ाहिर कर सकें। इससे ऐसी गुंजाइश पैदा हो सकती है जहाँ हम विद्यार्थियों से उनकी अपेक्षाओं व सीखने के बारे में चर्चा कर सकें।

अगर हम चाहते हैं कि हमारे विद्यार्थी एक-दूसरे से सीखें और हमारे सुझावों के प्रति खुला रवैया अपनाएँ, तो हमें ही उन्हें यह करके दिखाना होगा। जब हम खुले ढंग से फीडबैक माँगते हैं, और खुले ढंग से उस पर प्रतिक्रिया देते हैं, तो हम विद्यार्थियों के लिए एक प्रतिमान सामने रखते हैं कि एक-दूसरे के नज़रियों और एक-दूसरे के विचारों से किस प्रकार सीखा जाए। हम यह बात उन तक सम्प्रेषित करते हैं कि सीखना, विद्यार्थियों और शिक्षकों के बीच होने वाली एक साझी प्रक्रिया है। विद्यार्थियों को सुनने से हमें सीखने के बहुत मौके मिलते हैं: अपने बारे में, अपने विद्यार्थियों के बारे में और दुनिया के बारे में। वह शिक्षक जो अपने विद्यार्थियों के साथ सौहार्द स्थापित कर लेता है, उनके साथ एका बना लेता है, वह उनसे सीखता ज़्यादा है, उन्हें सिखाता कम है।

जब भी मैं किसी से बात करता हूँ, मैं उससे कुछ सीखता हूँ। जितना मैं उसे देता हूँ, उससे ज़्यादा पाता हूँ। इस तरह, एक सच्चा शिक्षक खुद को अपने विद्यार्थियों का विद्यार्थी मानता है। यदि आप अपने शिष्यों को इस दृष्टिकोण के साथ सिखाएँगे, तो आप उनसे बहुत कुछ सीखेंगे।

- मोहनदास करमचन्द गाँधी, खादी विद्यालय, सेवाग्राम में विद्यार्थियों से बतियाते हुए।

(हरिजन सेवा में 15-2-1942 को प्रकाशित)।


कविता कृष्णा: इंजीनियरिंग में पढ़ाई के बाद लगभग 15 साल कृष्णमूर्ति फाउण्डेशन के ऋषिवेली स्कूल, मदनापल्ली में विज्ञान पढ़ाया है।
अँग्रेज़ी से अनुवाद: भरत त्रिपाठी: पत्रकारिता की पढ़ाई। स्वतंत्र लेखन और द्विभाषिक अनुवाद करते हैं। होशंगाबाद में निवास।
यह लेख जर्नल ऑफ द कृष्णमूर्ति स्कूल, अंक 17 वर्ष 2013 से साभार।