एलर्जी कई तरह की चीज़ों से हो सकती है। जैसे धूल से, कुछ फूलों के पराग से, दवाइयों से, या किसी खाद्य पदार्थ से। एलर्जी यानी हमारे प्रतिरक्षा तंत्र का उन चीज़ों के प्रति अतिसक्रिय सुरक्षात्मक व्यवहार जिन्हें हमारा शरीर खतरे की तरह भांपता है; हो सकता है कि वे चीज़ें वास्तव में हानिकारक न हों। ऐसी ही एक चीज़ है मूंगफली। पश्चिमी देशों में मूंगफली से एलर्जी के सर्वाधिक मामले सामने आते हैं जबकि भारत जैसे देशों में इसका प्रकोप काफी कम है।
मूंगफली से एलर्जी बच्चों में, खासकर शिशुओं में, अधिक होती है। यूं तो जैसे-जैसे हम बड़े होते हैं और हमारा पाचन तंत्र परिपक्व होने लगता है, वैसे-वैसे यह एलर्जी खत्म हो जाती है। लेकिन इससे ग्रसित 80 प्रतिशत लोगों में यह वयस्क अवस्था में बनी रहती है और एक बार जाने के बाद दोबारा भी उभर सकती है।
पिछले कुछ दशकों में देखा गया था कि मूंगफली से एलर्जी के मामले बढ़ रहे थे। लेकिन वैज्ञानिक पूरी तरह से समझ नहीं पाए हैं कि खाद्य एलर्जी का कारण क्या है। कुछ का मानना है कि सी-सेक्शन प्रसूतियों की बढ़ती दर, बचपन में एंटीबायोटिक दवाइयों का सेवन और बढ़ता हुआ स्वच्छ वातावरण शायद इसके लिए ज़िम्मेदार है। 
मूंगफली से एलर्जी में शरीर पर लाल चकत्ते, छींकें, मुंह और गले के आसपास खुजली और सूजन, उल्टी-दस्त के अलावा रक्तचाप गिरना, दमा के दौरे, बेहोशी, कार्डिएक अरेस्ट जैसी समस्याएं हो सकती हैं और जान भी जा सकती है। फिर, एलर्जी ऐसी बला है कि इससे निजात भी नहीं पाई जा सकती, क्योंकि अब तक इसका इलाज उपलब्ध नहीं है। हालांकि इसके लक्षणों से निपटने और जान बचाने के लिए कुछ दवाएं ज़रूर मौजूद हैं।
इसलिए जैसे-जैसे खाद्य एलर्जी के मामले बढ़ने लगे, विशेषज्ञों ने सलाह दी कि शिशुओं को मूंगफली जैसी आम एलर्जिक चीज़ों से दूर ही रखें। लेकिन फिर, 2015 में हुए एक परीक्षण में पाया गया था कि शिशुओं को मूंगफली खिलाने से उनमें एलर्जी विकसित होने की संभावना लगभग 80 प्रतिशत घट जाती है। तब 2017 में, अमेरिका के राष्ट्रीय एलर्जी और संक्रामक रोग संस्थान ने औपचारिक रूप से शिशुओं को शुरुआती सालों में मूंगफली खिलाने की सिफारिश कर दी।
हाल ही में पीडियाट्रिक्स में प्रकाशित अध्ययन में शोधकर्ताओं ने इन दिशानिर्देशों की प्रभाविता जांची। उन्होंने पाया कि 2012-15 की अवधि में 3 साल से कम उम्र के बच्चों में खाद्य एलर्जी की दर 1.43 प्रतिशत थी जो 2017-2020 की अवधि में घटकर 0.93 प्रतिशत रह गई यानी (36 प्रतिशत की कमी हुई)। इस गिरावट का प्रमुख कारण मूंगफली जनित एलर्जी में 43 प्रतिशत की कमी लगता है। इसके अलावा यह भी देखा गया कि पहले छोटे बच्चों में मूंगफली की एलर्जी सबसे ऊपर थी लेकिन अब अंडे से होने वाली एलर्जी पहले पायदान पर पहुंच गई है।
अलबत्ता, अध्ययन में इस बात पर नज़र नहीं रखी गई थी कि शिशुओं ने क्या खाया था, इसलिए कहना मुश्किल है कि कमी दिशानिर्देशों के कारण ही आई है। फिर भी, आंकड़े आशाजनक हैं। (स्रोत फीचर्स)