लेखक:   डेनिस ओवरबाय
अनुवाद: सत्येन्द्र त्रिपाठी [Hindi PDF, 384 kB]

महिला वैज्ञानिक                                                                                                                                                        पुस्तक अंश
क्या हमारे ब्रह्माण्ड में ग्रह, उपग्रह, तारे, तारों के झुण्ड, ब्लैकहोल, गैसीय बादल, चमकती हुई धूल, बिखरा हुआ मलबा आदि शामिल हैं या कुछ और भी है, जो दिखाई नहीं दे रहा? इस कुछ और के बारे में सिलसिलेवार तरीके से गैलेक्सी (आकाशगंगा) में तारों की गतियों और तारों के भार के बारे में अध्ययन के दौरान सोचा जाने लगा। 1932 में जॉन ऊर्ट ने हमारी आकाशगंगा के कुछ तारों की कक्षीय गति में कुछ विसंगति देखी, इन तारों की कक्षीय गति अनुमान से कुछ ज़्यादा थी। आकाशगंगा बनाने वाले पदार्थ के परिमाण की गणना में भी ऐसा एहसास बनता था कि आकाशगंगा कई गुना ज़्यादा पदार्थ से बनी है लेकिन आकाशगंगा का दृश्य हिस्सा इसकी पुष्टि नहीं करता। इसी तरह 1933 में फ्रिट्स ज़्विकी ने भी करीबी आकाशगंगा की गति में विसंगती को महसूस किया। उन्हें लग रहा था कि काफी मात्रा में कोई और पदार्थ भी है जो गति को प्रभावित कर रहा है। इस ना देखे जा रहे पदार्थ को उन्होंने ‘मिसिंग मास’ नाम दिया।

आगे चलकर ‘मिसिंग मास’ को डार्क मैटर कहा जाने लगा। डार्क मैटर यानी ऐसा पदार्थ जो न प्रकाश को अवशोषित करता है, न प्रकाश का उत्सर्जन करता है। इसे टेलीस्कोप से भी नहीं देखा जा सकता। डार्क मैटर को तो बस दिखाई देने वाले आकाशीय पिण्डों पर पड़ने वाले गुरुत्वीय प्रभाव के रूप में महसूस किया जा सकता है।
उन्नीस सौ पचास और साठ के दशक में भी डार्क मैटर पर शोधकार्य हुए हैं। वीरा रुबिन का कार्य इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि एस्ट्रोफीज़िक्स जैसे विषय में जहाँ पुरुषों का बोलबाला था वहाँ उन्होंने काफी गम्भीरता और जीवटता के साथ डार्क मैटर पर शोधकार्य करके इस परिकल्पना के सैद्धान्तिक पक्ष को पुख्ता किया। यह शायद रुबिन की ही पहल थी कि ब्रह्माण्ड सम्बन्धी हमारी सोच में तारे-आकाशगंगा के साथ-साथ डार्क मैटर भी शामिल हो सका।

जैसे-जैसे आकाशगंगा में मौजूद तारों के अध्ययन के तरीके विकसित होते गए, वैसे-वैसे आकाशगंगा की संरचना और निर्माण के गूढ़ रहस्यों पर से पर्दा भी उठने लगा। हालिया वर्षों में डार्क मैटर की परिकल्पना पर भी सवाल उठे हैं लेकिन किसी परिकल्पना का जन्म होना, परिकल्पना पर सवाल उठाना विज्ञान का ही एक हिस्सा है। शायद विज्ञान ऐसे ही आगे बढ़ता है।

इस सवाल के बाद कि आखिर कोई भी ‘चीज़’ क्यों है, विज्ञान शायद जिस सबसे बुनियादी मुद्दे का सामना करने की आशा कर सकता है - वह उस किसी भी ‘चीज़’ की पहचान का है। हो सकता है कि खगोलविद सोचते रहे हों कि इसका उत्तर वे पहले ही दे चुके थे - हबल के समय से यह स्वीकार किया जाता था कि तारे और गैलेक्सी (आकाशगंगाएँ) और धूल और गैस और चट्टानें, ऑर्किड, काई, और मनुष्य, यही सब ब्रह्माण्ड है। वह तो एक महिला थीं जिन्होंने खगोलविदों को यह विश्वास दिलाने में प्रमुख भूमिका निभाई कि वे गलत थे; उन्हें कतई खयाल नहीं था कि अधिकांश ब्रह्माण्ड किस चीज़ से बना है। अधिकांश ब्रह्माण्ड तारे और गैलेक्सी का नहीं बना। अधिकांश ब्रह्माण्ड अदृश्य है।

वीरा रुबिन हताशा से जूझ रहीं थीं जब उन्होंने डार्क मैटर (स्याह पदार्थ - जो अदृश्य है) खोज निकाला। मुसीबत और विवाद सदा से उनकी पेशेवर ज़िन्दगी का पीछा करते रहे थे। कुछ हद तक यह इसलिए था कि वे एक महिला थीं; कुछ हद तक इसलिए कि वे निपुण थीं। वे बस अपनी गैलेक्सी का चैन से अवलोकन करना चाहती थीं, पर लगता था कि जैसे उनमें बेचैन करने वाले अवलोकनों को अनायास ढूँढ़ निकालने का सहज हुनर था।

रुबिन उपद्रवी नहीं दिखतीं। छोटे कद, गोल चेहरे और पुरुषों जैसे कटे हुए छोटे सफेद बालों वाली, यह महिला अब एक दादी है और खरी-खरी सुनाती है। वॉशिंगटन डी.सी. में बड़े होने के दौरान, अपने बेडरूम की खिड़की के सामने से गुज़रने वाले तारों को निहारते-निहारते वे खगोल विद्या पर मोहित हो गईं। रुबिन पढ़ाई के लिए वेसर (अमेरिका के पकिप्सि शहर का प्रख्यात कॉलेज) गईं, और वहाँ वे 1948 में डिग्री पाने वाली कक्षा की सदस्य थीं जिसे मैरी मैकार्थी ने अपने प्रसिद्ध उपन्यास ‘द ग्रुप’ से अमर कर दिया। रुबिन वेसर के प्रति इस बात से आकर्षित हुई थीं कि वेसर की एक पुरानी स्नातक, मारिया मिशैल, धूमकेतु की खोज करने वाली पहली अमेरिकन थीं, इसलिए पकिप्सि के इस कैम्पस में खगोल विद्या की परम्परा बसी हुई थी। स्नातक की पढ़ाई के दौरान ही उन्होंने कॉर्नेल (यूनिवर्सिटी) के एक स्नातकोत्तर विद्यार्थी से विवाह कर लिया, और उनके साथ वे इथका चली गईं।

कॉर्नेल के ग्रेजुएट स्कूल में अध्ययन के दौरान ही उनका पहली बार मुसीबत से सामना हुआ। अपने स्नातकोत्तर थीसिस के लिए रुबिन ने रैडशिफ्ट्स1 तथा स्पाइरल (घुमावदार) गैलेक्सी के परिमाणों का विश्लेषण करना चुना, यह देखने के लिए कि ब्रह्माण्ड के घूर्णन के कारण, सम्भवतया, हबल के प्रसार के अतिरिक्त कोई और व्यवस्थित प्रभाव दिखाई देता है या नहीं। उस समय केवल सौ के लगभग गैलेक्सी के लिए ही ऐसे आँकड़े उपलब्ध थे जिनमें से अधिकांश हुमासन2 ने इकट्ठे किए थे। परिमाणों का दूरी के पैमाने की तरह इस्तेमाल करते हुए, रुबिन को वाकई में एक विसंगति दिखाई दी। एक-सी आभासी चमक वाली, और इसलिए अनुमानत: समान दूरी पर स्थित, स्पाइरल गैलेक्सी आकाश में अन्य दिशाओं की अपेक्षा एक दिशा में ज़्यादा तेज़ी से दूर भाग रही थीं। वे इस परिणाम को ‘रोटेशन ऑॅफ द यूनिवर्स’ (ब्रह्माण्ड का घूर्णन) शीर्षक से अमेरिकन ऐस्ट्रोनॉमिकल सोसायटी के 1950 के अधिवेशन में प्रस्तुत करने के लिए अपनी एक माह की नन्ही बेटी के साथ बर्फ से पटी सड़कों पर कार से सफर करके फिलाडेल्फिया गईं। वहाँ वे एक अनजान थीं, किसी को नहीं जानती थीं। उनके शोधपत्र का वहाँ ‘तिरस्कार’ हुआ और पैंतीस साल बाद आज भी यह कहते हुए उनके चेहरे पर वेदना की रेखा खिंच जाती है। अजनबियों - जो वास्तव में महत्वपूर्ण खगोलविद थे जिन्हें वे पहचानती नहीं थीं - ने खड़े होकर उनका अपमान किया और झिड़का। वे शहर और विषय, दोनों को छोड़ भाग आईं। विडम्बना देखिए कि उनके उस स्नातकोत्तर शोधप्रबन्ध ने द वोकूलर (एक फ्रांसीसी खगोलविद) को सुपरक्लस्टर (महाझुण्ड) की धारणा का आविष्कार करने के लिए प्रेरित किया। उन्हें एहसास हुआ कि रुबिन ने जिसे ब्रह्माण्ड कहा था, वह बस एक स्थानीय सुपरक्लस्टर था।

अपने पति का अनुसरण करते हुए वे वॉशिंगटन डी.सी. गईं, और वहाँ अपने बच्चे की परवरिश करने के साथ-साथ, जॉर्जटाउन के पीएच.डी. कार्यक्रम को घिसटते हुए पूरा करने के दौरान, रुबिन ने पुन: इसका कड़वा स्वाद चखा कि खगोल विद्या के क्षेत्र में एक महिला होने का क्या मतलब था। एक दिन महान जॉर्ज गैमो, जिनके सहकर्मी ऐल्पर का रुबिन के पति के साथ साझा दफ्तर था, ने उनको फोन किया और पूछा कि क्या वे अपने शोध के बारे में बात करने के लिए अप्लाइड फिजि़क्स की प्रयोगशाला में आएँगी। उन्हें यह निमंत्रण स्वीकार करने में बेहद खुशी हुई। पर तब गैमो ने स्पष्ट किया कि उन्हें नीचे लॉबी (प्रतीक्षा गलियारा) में बात करनी पड़ेगी, क्योंकि दफ्तरों में महिलाओं के जाने की अनुमति नहीं थी3।
ऐसे अनुभवों ने उन्हें महिलाओं के अधिकारों, विशेष रूप से विज्ञान में, का प्रखर समर्थक बना दिया। एक बार उन्होंने पोप से भेंट करने के लिए जा रहे खगोलविदों के एक प्रतिष्ठित प्रतिनिधि मण्डल में शामिल होने से इन्कार कर दिया क्योंकि उनको लगता था कि गर्भ निरोध जैसे मुद्दों पर चर्च और पोप का दृष्टिकोण महिलाओं के प्रति विद्वेषपूर्ण था।

अपनी डिग्री लेकर रुबिन ने आकर्षक नाम वाले डिपार्टमैंट ऑॅफ टैरेस्ट्रियल मैग्नेटिज़्म, जो वॉशिंगटन स्थित कार्नेगी इंस्टीट्यूशन का हिस्सा था, में काम करना शुरू किया। वहाँ वे एक तरह से महाद्वीप के दूसरे छोर पर कार्यरत सैंडेज तथा सैंटा बार्बरा मण्डली की दूर स्थित साथी जैसी थीं। 1960 के दशक में उन्होंने तथा कार्नेगी में उनके एक सहयोगी, कैंट फोर्ड, ने इलेक्ट्रॉनिक क्रान्ति में शामिल होने का फैसला किया। उन्होंने इमेज ट्यूब्स (छवि नलियों) का समावेश करने वाले सबसे शुरुआती स्पैक्ट्रोग्राफ्स में से एक निर्मित किया - उसका वज़न 300 पाउंड था - और उसे घसीट कर वे ‘किट शिखर’ पर ले गए ताकि वहाँ बनाए जा रहे नए टैलिस्कोप से क्वेज़ार्स का अध्ययन कर सकें। उन्होंने इस काम को सही मौके पर हाथ में लिया था, क्योंकि तभी रैडशिफ्ट्स पर भीषण बहसें हो रही थीं। सैंडेज तथा आर्प वैज्ञानिक पत्रिकाओं में एक-दूसरे के चिथड़े उड़ा रहे थे और माउंट विल्सन के गलियारों में उनके बीच बोलचाल बन्द थी। अपने स्नातकोत्तर कार्य पर हुए विवाद का थोड़ा-सा स्वाद चखने के बाद रुबिन में ऐसे ‘धार्मिक’ युद्ध को झेल पाने की ताकत नहीं बची थी।

रुबिन ने कहा, “मैं ऐसी समस्या चाहती थी जिसके बारे में कोई मुझे परेशान न करे।” रुबिन और फोर्ड किसी ऐसे सुरक्षित विषय की तलाश में थे जिसमें वे अपने अनूठे स्पैक्ट्रोग्राफ का समुचित उपयोग कर सकें। उन्होंने नॉर्मल स्पाइरल गैलेक्सीज़ (normal spiral galaxies) की गतिकी का अध्ययन करने का निर्णय लिया। आम तौर पर जब कोई खगोलविद किसी गैलेक्सी का वर्णक्रम चित्र खींचता है तो उसे पूरी गैलेक्सी के लिए एक ही औसत रैडशिफ्ट प्राप्त होती है। रुबिन और फोर्ड को समझ में आया कि उनके संवेदनशील स्पैक्ट्रोग्राफ को गैलेक्सी के प्रत्येक अलग-अलग भाग में, उसके केन्द्र के चक्कर लगाते हुए तारों की सापेक्षिक रैडशिफ्ट्स तथा ब्लूशिफ्ट्स के मापन में समर्थ होना चाहिए। गैलेक्सी के प्रत्येक खण्ड के घूर्णन को स्वतंत्र रूप से माप कर वे एक घूर्णन वक्र (रोटेशन कर्व), जैसा कि उसे खगोलविद कहते हैं, निर्मित कर सकते थे, और यह पता कर सकते थे कि गैलेक्सी के विभिन्न भागों में तारे कितनी तेज़ गति से भ्रमण कर रहे हैं। सैद्धान्तिक रूप से इसका मतलब यह था कि वे यह माप सकते थे कि पूरी गैलेक्सी में द्रव्यमान किस तरह बँटा हुआ था। न्यूटन के नियमों के अनुसार, केन्द्र से बाहर की ओर किसी दूरी पर तारे जितनी ज़्यादा तेज़ी से चक्कर लगाते हैं उतना ही ज़्यादा द्रव्यमान उन तारों की कक्षा के भीतरी भाग में मौजूद होना चाहिए। उनका स्पैक्ट्रोग्राफ मानो एक नश्तर जैसा था जिससे रुबिन और फोर्ड वस्तुत: किसी गैलेक्सी की चीरफाड़ कर सकते थे।
प्रकृतिवादी जॉन म्यूर का कथन उधार लेते हुए, रुबिन कहती हैं, “जब आप किसी एक चीज़ को चुनकर अलग करने की कोशिश करते हैं, तो आपको पता चलता है कि वह ब्रह्माण्ड की हर अन्य चीज़ से जुड़ी हुई है।” कुल मिला कर किसी गैलेक्सी का सबसे घना और सबसे चमकदार भाग उसका नाभिक होता है। शायद थोड़े भोलेपन में, उनको तथा फोर्ड को यह उम्मीद थी कि गैलेक्सी का द्रव्यमान भी उसके प्रकाश की तरह ही वितरित होगा, अर्थात् उसका अधिकांश भाग केन्द्र में होगा।

उस स्थिति में घूर्णन वक्र को एक विशेष/क्लासिक संरचना का अनुसरण करना चाहिए। गैलेक्सी के केन्द्र से बाहर आती हुई वह वैसे ही तीखी चढ़ाई में ऊपर उठेगी, जैसे-जैसे तारों की कक्षाएँ अधिकाधिक सघन रूप से भरे गए द्रव्यमान को अपने भीतर समेटेंगी। गैलेक्सी की क्रोड़ (कोर) के बाहर, वक्र की चढ़ाई हलकी पड़ जाएगी। गैलेक्सी की डिस्क के बाहरी उपनगरीय हिस्से में, जहाँ तारे उतने घने नहीं हैं, वक्र बहुत धीरे-धीरे चढ़ेगा या सपाट बना रहेगा। अन्त में, गैलेक्सी के किनार पर, जहाँ तारों की बढ़ी हुई विशाल कक्षाओं (orbit) में न बराबर अतिरिक्त द्रव्यमान समेटा गया होगा, तारों के वेग कम हो जाएँगे। सौर मण्डल में, जिसका अधिकांश द्रव्यमान सूर्य में निहित है, यही स्थिति थी। सबसे भीतरी ग्रह, बुध, फर्राटे से 88 दिन में अपनी कक्षा का चक्कर लगा लेता है, लेकिन सुदूर स्थित प्लूटो इतने धीमे चलता है कि वह अपने तारामण्डल में उस जगह से बस ज़रा-सा ही खिसका है जहाँ वह पचास वर्ष पहले खोजा गया था।

ऐतिहासिक चकरी जैसी ऐन्ड्रोमीडा नीहारिका, जो मिल्की-वे की बहिन गैलेक्सी है, अवलोकन की सुविधा की दृष्टि से ज़रूरत से कुछ ज़्यादा ही निकट है। इसके मोती जैसी दीप्ति वाले केन्द्र से जितनी दूर तक आप तारों के प्रकाश को देख पाते हैं, उसके मुताबिक यह आकाश के 5 डिग्री हिस्से को घेरती है। लेकिन ऐन्ड्रोमीडा, एम-31, वह जगह है जहाँ सभी अन्तरिक्षीय अभियान प्रारम्भ होते हैं, और 1970 में रुबिन और फोर्ड ने वहीं के अवलोकनों से अपने पहले घूर्णन वक्र को चित्रित करने की कोशिश की। स्पैक्ट्रोग्राफ के एक अवलोकन (ऐक्सपोज़र) में समेट पाने के लिए ऐन्ड्रोमीडा ज़रूरत से ज़्यदा बड़ी थी; और इसलिए उनको अनेक रातों तक अवलोकन करते हुए, आहिस्ता-आहिस्ता एक तारा क्षेत्र से दूसरे तारा क्षेत्र का सफर करना पड़ा।

र, जब उनका सर्वेक्षण पूरा हुआ, तो पाई एक विचित्र बात। रुबिन ने अमर होने का अपना पहला मौका गँवा दिया। इन सभी अवलोकनों को क्रमबद्ध तरीके से एक-साथ एक घुमावदार आरेख में अंकित करने के बाद, उन्होंने और फोर्ड ने गौर किया कि ऐन्ड्रोमीडा गैलेक्सी के बाहरी क्षेत्रों में तारों की गतियाँ धीमी नहीं पड़ीं। खगोलविद्या की तकनीकी भाषा में, घूर्णन वक्र चपटा था। इसका मतलब था कि हमारे पड़ोस की सबसे पास वाली, और ब्रह्माण्ड की सबसे अधिक प्रेक्षित गैलेक्सी में कुछ ऐसा घटित हो रहा था जिसे किसी ने नहीं समझा था।

पर तब उनका ‘यूरेका’ (मैंने पा लिया) क्षण नहीं आ पाया। “हम पर्याप्त समझदार नहीं थे,” रुबिन ने तनिक अफसोस के साथ अपना सिर हिलाते हुए और तब की उनकी दृष्टि की खामी को समझा सकने में असमर्थता दर्शाते हुए कहा। घूर्णन वक्रों का सम्पूर्ण अर्थ वे तब तक आत्मसात नहीं कर पाए थे। उन्हें यह नहीं सूझा कि चपटे वक्र का सम्बन्ध द्रव्यमान के वितरण से जोड़ें। तारों की गतियों को नियंत्रित करने वाले किसी प्रकार के फीडबैक प्रभाव की सम्भावना के बारे में माथापच्ची करने के बाद, उन्होंने उस विषय को त्याग दिया।

रुबिन और फोर्ड वापिस लौट कर फिर से स्पाइरल गैलेक्सी की रैडशिफ्ट्स को मापने के लिए अपने शानदार इमेज ट्यूब स्पैक्ट्रोग्राफ का उपयोग करने लगे। और निश्चित ही, वे लड़खडाते हुए फिर से ब्रह्माण्ड के उसी असमान फैलाव के दृश्य में पहुँच गए जिसे रुबिन ने स्नातकोत्तर के दौर में खोजकर दुख सहा था। पर इस बार उसे एक नाम मिला: रुबिन-फोर्ड प्रभाव। इस प्रभाव की सबसे सरल व्याख्या यह थी कि स्थानीय ब्रह्माण्ड का काफी बड़ा हिस्सा, फैलने के अलावा, किसी चीज़ के द्वारा खींचा भी जा रहा है, और मोटे तौर पर वह पेगासस की दिशा में खिसक रहा है। वरिष्ठ खगोलविदों में शायद कोई भी इस खोज को पसन्द करने वाला नहीं था। सैंडेज, जो ब्रह्माण्ड के प्रसार की समरूपता को अपने लिए सन्तोषप्रद ढंग से स्थापित कर चुके थे, को सन्देह था कि रुबिन के गैलेक्सी के चयनित नमूने पूर्वाग्रह-ग्रस्त थे।

सिर पर मण्डराते तूफानी बादल का अन्देशा लिए, रुबिन और फोर्ड, नोरबर्ट थोन्नार्ड तथा डेविड बर्सटीन के साथ वापिस अपनी स्पाइरल गैलेक्सी की गतिकी पर लौट आए, जहाँ एम-31 का पेचीदा घूर्णन वक्र एक टिक-टिक करते टाइम बम की तरह उनकी प्रतीक्षा कर रहा था। इस बार उन्होंने अन्वेषण के काम में कोई कसर न छोड़ने का फैसला किया। वे स्पाइरल गैलेक्सी के सबसे चमकदार (luminous) नमूनों से प्रारम्भ करके, उसके सभी प्रकारों की व्यवस्थित ढंग से पड़ताल करेंगे, स्पैक्ट्रोग्राफ चित्र लेंगे, और तारों की गतियों का विश्लेषण करेंगे। किसी छोटी या सुदूर गैलेक्सी के लिए, यह एक ही चरण में पूरा हो जाने वाला काम था। जब स्पैक्ट्रोग्राफ की प्रवेश दरार गैलेक्सी के लम्बे अक्ष के साथ एक रेखा में होती थी, तब चकरी के एक सिरे के हमारी ओर आते तारों के प्रकाश की ब्लूशिफ्टिंग (नीला विचलन) और दूसरे सिरे पर दूर जा रहे तारों के प्रकाश की रैडशिफ्टिंग सभी स्पैक्ट्रल रेखाओं को मरोड़ कर च्-आकार के वक्र बना देती थीं। तब गैलेक्सी का घूर्णन वक्र सिर्फ एक स्पैक्ट्रोग्राम से पढ़ा जा सकता था।

जैसे ही रुबिन और फोर्ड ने अपने फोटोग्राफी के अँधेरे कमरे में ताज़े डेवलप किए गए स्पैक्ट्रोग्रामों को ऊपर उठाए आँखें सिकोड़ कर स्पैक्ट्रल रेखाओं का निरीक्षण करना शु डिग्री किया, उसी क्षण उन्हें समझ में आ गया कि कुछ विचित्र घटित हो रहा था। घूर्णन वक्र उस तरह से अन्त नहीं हो रहे थे जैसी उनसे अपेक्षा की जाती थी; उसकी बजाय वे सपाट थे, जैसे कि बहुत साल पहले उन्होंने एम-31 में पाया था। गैलेक्सी के किनारों पर तारों की गतियाँ धीमी नहीं पड़ रही थीं, जबकि माना जाता था कि वहाँ उनको धक्का देने के लिए नाममात्र को ही अतिरिक्त द्रव्यमान था। यदि कुछ हो रहा था तो वह अपेक्षा के विपरीत ही था, तारों की गतियाँ और तेज़ हो रही थीं, यानी गैलेक्सी में कोई तारा जितना ज़्यादा बाहर की ओर था, उसे उतनी ही ज़्यादा तेज़ी से चक्कर लगाने के लिए प्रेरित करने को अधिकाधिक द्रव्यमान उपलब्ध था। लेकिन उतनी दूर वहाँ प्रकाश लगातार कम होता चला जाता था, तो फिर वह अतिरिक्त द्रव्यमान क्या था जो सुदूर तारों को धकेल रहा था? “इस बार,” रुबिन ने कहा, “हम तुरन्त समझ गए कि हमारे पास कुछ असाधारण जानकारी थी।”

ऐसे व्यवहार की केवल दो व्याख्याएँ हो सकती थीं। या तो न्यूटन के नियम गलत थे, या गैलेक्सी में कुछ और भी था - कुछ ऐसा जो चमकने वाला नहीं था, और जो गैलेक्सी के केन्द्र में ही सकेन्द्रित नहीं था (गैलेक्सी के केन्द्र में तारों की अत्याधिक सघनता पाई जाती है)। रुबिन ने गणना की कि जिन गतियों से तारे भाग रहे थे उतनी तेज़ी से उन्हें परिक्रमा में धकेलने के लिए और घूर्णन वक्रों के ऊपर चढ़ते जाने के लिए इस ‘स्याह’ द्रव्यमान की कितनी मात्रा की आवश्यकता होगी। उत्तर अचम्भित करने वाला था: दिखाई देने वाली गैलेक्सी में जितने द्रव्यमान का अस्तित्व प्रतीत होता था, उसका दो से दस गुना ज़्यादा।

रुबिन ने कहा, “महान खगोलविदों ने हमें बताया कि इसका तो कोई अर्थ ही नहीं निकलता। उन्होंने कहा कि यह प्रभाव चमकदार गैलेक्सी का अवलोकन करने के कारण था।” उनको सलाह दी गई कि वे जाकर मद्धिम गैलेक्सी को देखें।
उन्होंने वैसा ही किया। पर इस बार वे पीछे हटने वाली नहीं थीं। रुबिन को लगा कि उन्होंने जो ढूँढ़ निकाला था वह ‘मिसिंग मास’ था।
‘मिसिंग मास’ (खोया हुआ द्रव्यमान) वह नाम था जो गुस्सैल फ्रिटज़ ज़्विकी ने काफी पहले 1930 के दशक में परेशान करने वाले अवलोकन के परिणामों को दिया था, और जो तभी से विचारवान खगोलविदों के दिमागों को चिन्ता से कुरेद रहा था।

ज़्विकी ने कोमा क्लस्टर (गुच्छे) में स्थित गैलेक्सी के एक समूह की रैडशिफ्ट्स को मापा था। उन्होंने पता लगाया था कि वे एक-दूसरे के सापेक्ष कितनी तेज़ी से गति कर रही थीं, और गणना की थी कि उस क्लस्टर को तितर-बितर होकर उड़ जाने से रोकने के लिए कितना गुरुत्वाकर्षण बल आवश्यक होगा। फिर उन्होंने इस गुरुत्वाकर्षण द्रव्यमान की तुलना क्लस्टर के चमकदार द्र्व्यमान (luminous mass) से की, जो उन्होंने सारे तारों के प्रकाश को सीधे-सीधे जोड़ कर प्राप्त किया था। उन्हें यह देख कर आश्चर्य हुआ कि गुरुत्वाकर्षण द्रव्यमान, चमकदार द्रव्यमान से दस गुना अधिक था। इससे निकलने वाले निष्कर्ष से बचा नहीं जा सकता था: यदि कोमा क्लस्टर प्रकाश का एक अस्थायी छलावा भर नहीं था, तो कोमा क्लस्टर का - और, जैसा बाद में पता चला, अन्य क्लस्टर्स का भी - 90 प्रतिशत पदार्थ अदृश्य था।
ज़्विकी ने इस अदृश्य 90 प्रतिशत पदार्थ को ‘मिसिंग मास’ नाम दिया। ब्रह्माण्ड-विज्ञानी प्रतिष्ठान पर यह उसका सबसे टिकाऊ और क्षति पहुँचाने वाला कटाक्ष साबित हुआ। ज़्विकी के कार्य का अन्तिम निहितार्थ यह था कि खगोलविद नहीं जानते थे कि ब्रह्माण्ड किस चीज़ का बना था।

अधिकांश खगोलविदों की तरह, रुबिन ने भी स्नातकोत्तर संकाय में ज़्विकी की गणनाओं को फिर से करने की कसरत की थी और इस निष्कर्ष पर पहुँची थीं कि वहाँ कुछ ऐसा था जो समझे जाने के लिए फिलहाल तैयार नहीं था। ज़्विकी के समय के बाद, खगोलविदों को गैलेक्सी के समूहों के दूसरे उदाहरण भी पता चले थे जिनका वज़न उनके भीतर की अलग-अलग गैलेक्सीज़ के योग से अधिक प्रतीत होता था। मोटे तौर पर, ऐसा लगता था कि जितनी बड़ी सिस्टम या गैलेक्सी व्यवस्था का अध्ययन किया जा रहा होता था, दृश्य और अदृश्य भार के बीच अन्तर भी उतना ही बड़ा होता - अर्थात् उतना ही अधिक खोया हुआ द्रव्यमान प्रतीत होता। कुछ खगोलविद इस आशा को कस कर थामे रहे कि ब्रहमाण्ड को बन्द कर सकने के लिए4, अत्यन्त विशाल पैमानों पर पर्याप्त ‘मिसिंग मास’ मिल जाएगा।

‘मिसिंग मास’ में इस दिलचस्पी को उकसाने में पीबल्स का प्रभावशाली हाथ था। 1973 के उस दौर में जब वह कंप्यूटर पर सांख्किकीय अनुकृतियाँ (simulations) बनाने पर मोहित थे, उन्होंने और प्रिंसटन के एक सहकर्मी जेरेमाया ऑॅस्ट्रिकर ने कंप्यूटर पर एक स्पाइरल गैलेक्सी की संरचना की नकल करने का प्रयास किया था। उन्होंने बार-बार कोशिश की, पर उसमें असफल होते रहे। ऐसा प्रतीत होता था कि उनकी मॉडल गैलेक्सी की चकरी अस्थिर थी; चकरी के तारों के बीच के गुरुत्वाकर्षण बलों का खिंचाव उसे विखण्डित कर देता था। पर, फिर हकीकत में गैलेक्सी का अस्तित्व कैसे बना हुआ था? आखिरकार, पीबल्स और ऑॅस्ट्रिकर को पता चला कि यदि चकरी किसी अन्य पदार्थ के गोलाकार मण्डल से घिरी हो, वैसे ही जैसे कि किसी विशाल गोलाकार पावरोटी के दो अर्ध-भागों के बीच की हैमबर्गर की टिकिया होती है, तो वह स्थिर हो जाएगी। स्वाभाविक रूप से, ऐसे मण्डल को अदृश्य होना होगा, पर शायद उसका अत्यधिक भारी-भरकम होना गैलेक्सी को स्थिर बनाने के लिए ज़रूरी नहीं था। पीबल्स को समझ में आया कि उस अँधेरे मण्डल को मनमाने रूप से बड़ा और भारी मान कर, वे वास्तव में ब्रह्माण्ड को बन्द कर सकने के लिए गैलेक्सी में पर्याप्त अदृश्य अतिरिक्त द्रव्यमान जोड़ सकते थे, हालाँकि इसका कोई प्रमाण नहीं था कि ऐसा इतना द्रव्यमान वहाँ मौजूद था। जब उन्होंने और ऑॅस्ट्रिकर ने अपना शोधपत्र लिखा तो उन्हें संकोचवश इन मण्डलों पर अत्यधिक द्रव्यमान आरोपित करने से अपने आपको रोकना पड़ा।

एक साल बाद पीबल्स और ऑॅस्ट्रिकर ने पोस्टडॉक (उत्तर-डॉक्टरेट) कर रहे एक युवा इज़रायली कण-सिद्धान्तविज्ञानी (पार्टिकिल थ्योरिस्ट) ऐमोस याहिल की सहायता से स्याह पदार्थ, गैलेक्सी के द्रव्यमानों, और ओमेगा5 के सवाल का सीधे-सीधे सामना किया। उन्होंने गैलेक्सी के द्रव्यमानों को जितनी भी अलग-अलग विधियों से मापा गया था - तारों के दिखाई देने वाले प्रकाश से लेकर, एक-दूसरे का चक्कर लगाती हुई दोहरी गैलेक्सी और बड़े समूहों तक - उन सभी का विश्लेषण किया। उन्होंने पाया कि जैसे-जैसे खगोलविद अधिकाधिक बड़े पैमानों को देखते थे, गैलेक्सी के द्रव्यमान उतने ही बढ़ते हुए प्रतीत होते थे। वे इस निष्कर्ष पर पहुँचे कि ज़्विकी की धारणा सही थी कि गैलेक्सी सम्भवत: उससे दस गुना बड़ी और भारी थीं जितनी वे दिखती थीं। उनके अपने विभाग के बाहर, इसका अच्छा स्वागत नहीं हुआ। प्रिंसटन के सिद्धान्तविज्ञानियों की ख्याति ‘बन्द ब्रह्माण्ड’ का पक्ष लेने वालों के रूप में थी; व्हीलर का इसके प्रति झुकाव तथा गैलेक्सी के सहसम्बन्धों के आँकड़ों का सघन ब्रह्माण्ड की ओर इशारा करना, ऐसा इन दोनों कारणों से था।

जैसा बाद में साबित हुआ, स्याह पदार्थ के गोलाकार मण्डल का रुबिन के अवलोकनों से बहुत ठीक मेल बैठता था। उन्होंने अपने दल के साथ अगले कुछ वर्ष एरिज़ोना और चिली में स्थित दूरदर्शियों के चक्कर लगाते हुए और गैलेक्सी के अपने खज़ाने को भरते हुए बिताए, जिसमें थीं: मद्धिम गैलेक्सी, चमकदार गैलेक्सी, ढीली स्पाइरल क्षीण क्रोड़ वाली, और कसी हुई घुमावदार बाँहों वाली, छड़ों वाली घुमावदार, तथा तकली के आकार वाली गैलेक्सी। उन्होंने भरपूर विविधता वाले घूर्णन वक्रों का विशाल संग्रह निर्मित कर लिया। उन्होंने शेखी बघारते हुए कहा, “यदि आप मुझे एक घूर्णन वक्र और हबल के वर्गीकरण अनुसार उस गैलेक्सी का प्रकार दें, तो मैं आपको उस गैलेक्सी का द्रव्यमान, प्रकाश-तीव्रता और अर्धव्यास बता सकती हूँ।”

उन सब में एक साझी विशेषता यह थी कि उन पर जैसे खोए हुए द्रव्यमान या स्याह पदार्थ के हस्ताक्षर थे, क्योंकि तारे उससे ज़्यादा तेज़ गतियों से चक्कर लगा रहे थे जितनी गति तारों का गुरुत्वाकर्षण अकेला उन्हें दे सकता था; गोया चमकदार पदार्थ किसी अँधेरी रहस्यमयी लहर पर उतराने वाले फेन के समान था। “किसी ने कभी हमसे यह नहीं कहा कि सभी पदार्थ विकिरण करते हैं,” वे बिना लाग-लपेट के बोल पड़ीं, “बस हमीं ने यह मान लिया कि ऐसा होता है।”

रुबिन का निष्कर्ष था कि खगोलविद जिन्हें गैलेक्सी - तारों के प्रकाश और गैस के महीन छल्ले - कहते हैं, वे वास्तव में कहीं ज़्यादा बड़े, ज़्यादा अँधेरे और ज़्यादा भारी-भरकम बादलों की चमकदार क्रोड़ भर थीं। उन्होंने अपने काम के बारे में एक संक्षिप्त भाषण विकसित कर लिया जिसे उन्होंने शीर्षक दिया ‘व्हाट्स द मैटर इन स्पाइरल गैलेक्सीज़’ (स्पाइरल गैलेक्सी में मामला/पदार्थ (मैटर) क्या है?)। दिखाई देने वाली किसी गैलेक्सी को स्याह पदार्थ घेरे हुए और उसमें व्याप्त प्रतीत होता था। रुबिन का अनुमान था कि एक आम स्पाइरल गैलेक्सी की दिखाई देने वाली सीमाओं के भीतर का लगभग आधा द्रव्यमान स्याह पदार्थ था। पर इस बात के पर्याप्त संकेत मौजूद थे कि स्याह बादल गैलेक्सी की दिखाई देने वाली किनार के परे भी फैला हुआ था; उसकी अन्तिम सीमा को चिन्हित नहीं किया जा सकता था। जैसा ज़्विकी की काफी पहले की खोजों ने सुझाया था, और जैसा ऑॅस्ट्रिकर, पीबल्स तथा याहिल ने फिर दोहराया था, चमकदार पदार्थ की तुलना में स्याह पदार्थ का परिमाण 1 के मुकाबले 10 गुना, यहाँ तक कि 100 गुना भी हो सकता था।

रुबिन का मुख्य मुद्दा दार्शनिक था। 300 वर्षों से खगोलविद मानते रहे थे कि ब्रह्माण्ड वही था जो उन्हें दिखाई देता था। वे अपना समय जिस काम में लगाते रहे वह था विभिन्न प्रकार के ढेलों (lumps) को अलग-अलग करना। परमाणुओं से तारे निर्मित होते थे, तारों से गैलेक्सी निर्मित होती थीं, गैलेक्सी से क्लस्टर, और शायद कई क्लस्टर से सुपरक्लस्टर बनते थे। पर अब यह महिला कह रही थीं कि ब्रह्माण्ड वह था जो उन्हें दिखाई नहीं देता था।

“जब हम आकाश को अपनी आँखों से, दूरदर्शी से, या फोटोग्राफी की प्लेट से देखते हैं, तो हम वास्तव में यह देखते हैं कि चमक (ल्यूमिनॉसिटी) का वितरण पुंजों में होता है,” रुबिन ने ‘चमक’ शब्द पर ज़ोर देते हुए कहा, जैसे कि वह संदिग्ध हो। “क्या इस बात का कोई वैध सबूत है कि प्रकाश की चमक का वितरण पदार्थ के वितरण का भी वर्णन करता है? इस सवाल का अतिस्पष्ट उत्तर है - नहीं।”


डेनिस ओवरबाय: भौतिक विज्ञान और ब्रह्माण्ड विज्ञान पर लिखते हैं। अपने चालीस साल से भी ज़्यादा लम्बे कैरियर में सम्पादक और संवाददाता रहे हैं। यह लेख उनकी किताब ‘Lonely Hearts of the Cosmos: The Story of the Scientific Quest for the Secret of the Universe’ Eäò ‘Springtime for Neutrinos’òका सम्पादित अंश है। इस किताब में कुछ ऐसे लोगों की कहानियाँ हैं जिन्होंने ब्रह्माण्डके बारे में मुश्किल सवाल पूछनेे और उनके जवाब खोजने की हिम्मत की है। 

अँग्रेज़ी से अनुवाद: सत्येन्द्र त्रिपाठी: विज्ञान, टेक्नोलॉजी और दर्शनशास्त्र की पढ़ाई की है। कुछ समय पत्रकारिता के बाद अब गाज़ियाबाद में स्वतंत्र रूप से अनुवाद कार्य कर रहे हैं।