मध्य प्रदेश के वरिष्ठ अर्थशास्त्री, सामाजिक चिंतक, जनपक्षधर लेखक और जल, जंगल, ज़मीन के सवालों पर गहरी समझ रखने वाले

                डॉ. रामप्रताप गुप्ता
                      (1933-2026)

डॉ. रामप्रताप गुप्ता का 2 मई 2026 के दिन 93 वर्ष की आयु में निधन हो गया।

डॉ. गुप्ता उन दुर्लभ बुद्धिजीवियों में से थे जिन्होंने अर्थशास्त्र को विश्वविद्यालयों की सीमाओं से निकालकर गांवों, आंदोलनों, विस्थापित समुदायों और आम लोगों के जीवन से जोड़कर देखा था। 
डॉ. गुप्ता का जन्म वर्ष 1933 में राजस्थान के चित्तौड़ ज़िले के मातासरा गांव में हुआ था। कोटा से प्रारंभिक उच्च शिक्षा प्राप्त करने के बाद उन्होंने राजगढ़ ज़िले के सारंगपुर में हाईस्कूल में अध्यापन किया। 
आगे चलकर उन्होंने पुणे के प्रतिष्ठित गोखले इंस्टीट्यूट ऑफ पॉलिटिक्स एंड इकॉनॉमिक्स से अर्थशास्त्र में पीएचडी की।
1990 में लागू हुई नई आर्थिक नीति (उदारीकरण, निजीकरण और वैश्वीकरण) के दूरगामी सामाजिक और आर्थिक खतरों को डॉ. गुप्ता ने गांव-कस्बों, अध्ययन शिविरों और सामाजिक आंदोलनों के मंचों पर सरल भाषा में लोगों को समझाया और उनके प्रति चेताया। 
वे विभिन्न मुद्दों पर सर्वोदय प्रेस सर्विस, इकॉनॉमिक एंड पॉलिटिकल वीकली और स्रोत फीचर्स में लिखते रहे। पानी के मुद्दे डॉ. गुप्ता के अध्ययन व लेखन का प्रमुख विषय रहे। 
डॉ. गुप्ता लंबे समय तक नीमच ज़िले में रामपुरा के सरकारी कॉलेज में अर्थशास्त्र के प्राध्यापक रहे। 
अलबत्ता, उनका योगदान केवल शिक्षण तक सीमित नहीं रहा। उन्होंने तालाबों के जीर्णोद्धार, टीबी मरीज़ों को निःशुल्क दवाइयां उपलब्ध कराने, मोतियाबिंद के मरीज़ों के लिए नेत्र शिविर आयोजित कराने और गरीब विद्यार्थियों के लिए महात्मा गांधी छात्र सहायता समिति जैसी पहलें शुरू कीं, जो लंबे समय तक आर्थिक रूप से कमज़ोर विद्यार्थियों को मदद देती रही।
उन्होंने अपनी चिंतन प्रक्रिया और लेखन से बड़ी संख्या में लोगों को प्रेरित किया है और सदैव करते रहेंगे। (स्रोत फीचर्स)