यह कल्पना करना थोड़ा मुश्किल है कि हमारे पास अनाज की ऐसी फसलें होंगी जिन्हें हर साल नए सिरे से बोने की ज़रूरत नहीं होगी; एक बार बो दिया और साल-दर-साल दाने लेते रहिए। फिलहाल तो धान, गेहूं, तुअर जैसी फसलों को हर साल बोना ही पड़ता है। क्या ऊपर की कल्पना साकार हो सकती है?
इस सिलसिले में चीन के वैज्ञानिकों ने 2018 में धान की एक ऐसी किस्म (PR23) प्रस्तुत की थी जिससे कई सालों तक उपज ली जा सकती थी। अलबत्ता, इसे बनाने में कई दशकों तक पारंपरिक ब्रीडिंग का सहारा लेना पड़ा था। इसके लिए शोधकर्ताओं ने धान की एक फसली किस्म का संकरण एक वन्य किस्म से किया था।
अब शोधकर्ताओं ने दर्शाया है कि यही काम द्रुत गति से किया जा सकता है यदि किसी उपयुक्त वन्य किस्म से जीन्स चोरी कर लिए जाएं। फिर तो अलग-अलग इलाकों के लिए बहुवर्षी धान तैयार किए जा सकेंगे।
इस संदर्भ में हाल ही में साइन्स में प्रकाशित एक शोध पत्र में वैज्ञानिकों की एक टीम ने बताया है कि जंगली धान (ओराइज़ा रुफिपोगोन - Oryza rufipogon) साल-दर-साल फूलता-फलता है और उन्होंने इसके लिए ज़िम्मेदार जीन्स भी खोज निकाले हैं। उन्होंने आम तौर पर फसल के रूप में उगाए जाने वाले धान (ओराइज़ा सटाइवा - Oryza sativa) में ये जीन्स जोड़ने में भी सफलता प्राप्त कर ली है। इन जीन्स ने ओराइज़ा सटाइवा को बहुवर्षी गुण प्रदान कर दिए; यानी यह एक बार पुष्पन के बाद मरता नहीं बल्कि पुष्पन को रोककर फिर से सामान्य वृद्धि (वर्धी विकास) शुरू कर देता है। यह प्रगति तो ज़बरदस्त है लेकिन एक दिक्कत बाकी है। जो नई वृद्धि शुरू होती है उसमें लगने वाले फूलों में दाने पैदा नहीं होते।
दरअसल, अनाजों को बहुवर्षी पौधों में तबदील करना सहस्राब्दियों में चुन-चुनकर किए गए प्रजनन को वापिस पलटने जैसा होगा। एकवर्षी पौधे ज़मीन के ऊपर तेज़ी से वृद्धि करते हैं और बहुवर्षी पौधों की तुलना में कहीं अधिक दाने पैदा करते हैं क्योंकि बहुवर्षी पौधे अपने काफी सारे संसाधन जड़ों के विकास में निवेश करते हैं। जब इन पौधों को पालतू बनाया गया था, तब पुराने ज़माने के लोगों ने एकवर्षी पौधों को शायद उनकी अधिक दाना उत्पादन क्षमता के कारण ही चुना था।
नए अध्ययन में चाइनीज़ एकेडमी ऑफ साइन्स के सेंटर फॉर एक्सेलेंस इन मॉलीक्यूलर प्लांट साइन्सेस के बिन हान और जिया-वाई वांग ने उन जीन्स की तलाश की जो धान में बहुवर्षिता का नियमन करते हैं। इस तलाश में सबसे पहले तो वे ओ. रुफिपोगोन पर गए। उन्होंने अनुसंधान के दौरान विकसित एक किस्म का प्रजनन एक आम तौर पर अध्ययन की जाने वाली किस्म से करवाया ताकि ऐसी ढेर सारी संतानें पैदा कर सकें जिनमें से प्रत्येक में वन्य किस्म के डीएनए का अलग-अलग छोटा-छोटा खंड हो। बड़े होने के बाद उन्होंने एक पौधा चुना जिसमें यह गुण था कि वह पुष्पन को रोककर वर्धी विकास जारी रख सके। इसे उन्होंने नाम दिया G43। 
सारे धान के पौधों, चाहे वे कृष्य वार्षिक किस्म के हों, में एक मुख्तसर द्वितीय जीवन होता है। वार्षिक धान के पौधे से जब दानों की उपज प्राप्त कर ली जाती है, उसके बाद वे एक दूसरा शाखित तना पनपाते हैं, जिन्हें टिलर कहते हैं। इनसे भी एक कमतर उपज पैदा होती है जिसे रैटून राइस कहते हैं। इस प्रक्रिया को रैटूनिंग कहते हैं।
बहरहाल, हान और वांग ने जो G43 धान विकसित किया था वह ऐसे टिलर्स पैदा करने में काफी उदार था - जहां एकवर्षी धान में 10-12 टिलर बनते हैं, वहीं G43 में 70 ऐसे द्वितीयक टिलर्स बने।
अब शोधकर्ताओं ने इसके लिए ज़िम्मेदार जीन्स का स्थान निश्चित किया - ये गुणसूत्र 1 पर पाए गए और शोधकर्ताओं ने इन्हें नाम दिया ‘एंडलेस ब्रांचेज़ एंड टिलर्स’ (EBT1)। इसके बाद उन्होंने दो विशिष्ट जीन्स की पहचान की - MIR156B और MIR156C। ये दोनों ही माइक्रो-आरएनए का निर्माण करते हैं और ये माइक्रो-आरएनए विशिष्ट संदेशवाहक आरएनए (mRNA) से जुड़ जाते हैं। जुड़ने के बाद ये कुछ अन्य जीन्स की गतिविधि को ठप्प कर देते हैं जो युवा पौधे को परिपक्वता की ओर ले जाएंगे।
इसी प्रकार के MIR156 जीन्स घास की अन्य प्रजातियों में भी पाए जाते हैं। गौरतलब है कि गेहूं, धान आदि भी घास कुल में ही आते हैं। आम तौर पर इनकी अभिव्यक्ति फूल आने के बाद थम जाती है जिसके चलते वृद्धि रुक जाती है। लेकिन G43 में इनका व्यवहार अलग रहा। इनकी भी अभिव्यक्ति फूल आने के बाद कम हुई लेकिन फिर से बढ़ गई और टिलर्स का वर्धी विकास फिर चल निकला। शोधकर्ताओं का ख्याल है कि यदि अन्य बहुवर्षी अनाजों में ऐसी ही क्रियाविधि हुई तो अचरज नहीं होना चाहिए। उदाहरण के लिए 1920 के दशक में मक्का की एक उत्परिवर्तित किस्म खोजी गई थी जो लगातार एक झाड़ीनुमा ढंग से बढ़ती है। Corngrass1 नामक इस उत्परिवर्ती में MIR156 जीन पाया जाता है और शायद इसका व्यवहार बहुवर्षी धान के समान ही होगा।
G43 किसी भी वार्षिक पौधे की तरह ही बढ़ता है - एकदम सीधा खड़ा। यह ज़मीन पर फैलकर नहीं बढ़ता, जिस गुण की वजह से ओ. रुफिपोगोन के द्वितीयक टिलर्स जड़ें उगाकर नए पौधे बन जाते हैं। पौधे की बनावट को बदलने के लिए हान और वांग की टीम ने ओ. रुफिपोगोन के दो जीन्स (PROG1 और TIG1) G43 में जोड़ दिए थे। इस तरह जो पौधा विकसित हुआ वह ज़मीन पर आड़ा विकसित हुआ। यह एक आशाजनक संकेत है।
लेकिन अभी एक बड़ी बाधा सामने है। हालांकि ये द्वितीयक टिलर्स काफी अच्छे से बढ़े लेकिन उनसे बने पौधों पर वंध्या फूल आए और दाने नहीं बने। यह समस्या तब भी आई जब ओ. रुफिपोगोन का समूचा EBT1 खंड एक वार्षिक किस्म में रोपा गया। 
ज़ाहिर है, इस काम को अंजाम देने के लिए अन्य जीन्स की ज़रूरत है। हान और वांग इन जीन्स की तलाश में हैं ताकि द्वितीयक टिलर्स भी उपजाऊ फूल पैदा कर सकें। (स्रोत फीचर्स)