दिन-रात मेहनत करने वाली चींटियां एकता और परस्पर तालमेल बनाकर अपने समूह के साथ वफादारी से काम करती हैं। उन्हें दूसरे समूह की दखलंदाज़ी बिल्कुल नहीं भाती — लगभग हर समय वे दूसरे समूह के प्रति आक्रामक बर्ताव ही करती हैं। हालांकि चींटियां माहू (पौधों का रस चूसने वाले कीट, जिसे तेला या चेपा भी कहते हैं) के साथ साझेदारी का सम्बंध रखती हैं, क्योंकि माहू चींटियों को शहद जैसा चिपचिपा अपशिष्ट पदार्थ ‘हनीड्यू’ भोजन के रूप में मिलता है, वहीं बदले में चींटियां गुबरैला जैसे शिकारियों से उनकी रक्षा करती हैं और अन्य भोजन के स्थानों तक पहुंचाती हैं; कभी तो सर्दियों में आवास भी देती हैं| 
लेकिन 2006 में एक कीट वैज्ञानिक ने एरिज़ोना के रेगिस्तान में चींटियों का एकदम विपरीत बर्ताव देखा। कीट वैज्ञानिक मार्क मोफेट ने इसी अनुभव को इकॉलॉजी एण्ड इवोल्यूशन शोध पत्रिका में प्रकाशित कर यह सुझाया है कि शायद चींटियों में यह साफ-सफाई से जुड़ी साझेदारी का पहला उदाहरण होगा| उन्होंने अनुभव साझा किया कि दो अलग-अलग प्रजातियों की चींटियां एक-दूसरे के साथ शांति से पेश आ रहीं थीं। इनमें से एक थी लाल चींटी या रेड हार्वेस्टर चींटी (Pogonomyrmex barbatus), जो गहरे भूरे-लाल रंग की और 5-7 मि.मी. तक लंबी होती है। और दूसरी थी कोन या पिरामिड चींटियां (जीनस - Dorymyrmex), जो पीले-भूरे रंग की होती हैं और इनकी लंबाई 3-3.5 मि.मी. होती है (हार्वेस्टर चींटियों की एक-तिहाई)। मोफेट ने देखा कि छोटी चींटियां बड़ी चींटियों का शरीर साफ कर रही थीं, यहां तक कि बड़ी चींटियां अपने धारदार जबड़े खोलकर छोटी चींटियों से सफाई करवा रहीं थीं, मानो उन्हें मज़ा आ रहा हो| पांच दिन तक लगातार निरीक्षण के आधार पर कीट वैज्ञानिक का अनुमान है कि छोटी चींटियों को सफाई के दौरान भोजन मिलता होगा; जैसे वे कुछ परजीवियों को खा रही होंगी या हटा रही होंगी या फिर वे फायदेमंद सूक्ष्मजीवों का आदान-प्रदान कर रही होंगी|
चींटियों के अब तक ज्ञात व्यवहार के चलते यह बात अचंभा लग सकती है। लेकिन जीव जगत में ऐसे बहुत से सम्बंध और साझेदारियां देखने को मिलती हैं जिसमें दो भिन्न प्रजातियों के प्राणी परस्पर लाभांवित होते हैं। इन सम्बंधों को जीवविज्ञान में परस्परता (mutualism) कहा जाता है। ऐसे सम्बंध में दोनों जीवों को फायदा मिलता है। प्रकृति में इसके असंख्य उदाहरणों में से कुछ की बात करते हैं:
पक्षी एवं शाकाहारी जंतु - पक्षियों (जैसे ऑक्सपेकर या बगुला) को जंतुओं के शरीर से किलनी वगैरह भोजन के रूप में मिलती हैं और बदले में जंतुओं (जैसे भैंस, गेंडे) को कीटों और परजीवियों से निजात मिलती है।
परागणकर्ता और फूल - मधुमक्खियों जैसे कीटों को फूलों से मकरंद मिलता है और बदले में कीट उनके परागण में मदद करते हैं।
मगरमच्छ एवं प्लोवर पक्षी - जबड़ा खोलकर मगरमच्छ आराम से प्लोवर पक्षी से दांतों की सफाई करवाता है, और प्लोवर पक्षी के भोजन का इंतज़ाम हो जाता है। इस पक्षी को डेंटिस्ट भी कहते हैं। 
जड़ एवं नाइट्रोजन स्थिरीकरण बैक्टीरिया - बैक्टीरिया पौधों को नाइट्रोजन उपलब्ध कराते हैं और बदले में पौधे आवास व भोजन देते हैं।
अर्थात सहजीविता का रिश्ता भोजन, सुरक्षा और प्रजनन में सहयोग की दृष्टि से पारिस्थितिक संतुलन के लिए ज़रूरी है।
ये तो हुआ फायदे का सम्बंध। कुछ सम्बंध ऐसे भी होते हैं जहां एक जीव को लाभ होता है, लेकिन दूसरे जीव को न तो लाभ होता है न हानि। इसे ‘सहभोजी सम्बंध’ कहते हैं। जैसे, पेड़ों पर उगने वाले ऑर्किड सूर्य की रोशनी के लिए ऊंची शाखाओं पर केवल आश्रय लेते हैं, इससे पेड़ों को कोई नुकसान नहीं होता। वहीं, एक ऐसा भी सम्बंध है जहां एक जीव को लाभ होता है लेकिन दूसरे जीव को हानि होती है। इसे ‘परजीवी सम्बंध’ कहते हैं। जूं, जोंक, कृमि जैसे परजीवी पोषण और जीवनचक्र के लिए जंतुओं और मनुष्यों के शरीर को नुकसान पहुंचाते हैं। वनस्पतियों में, अमरबेल (Cuscuta reflexa), स्ट्राइगा (Striga प्रजातियां) जैसे परजीवी पौधे अन्य पेड़-पौधों पर पोषण, आश्रय और प्रजनन के लिए निर्भर रहते हैं|
अंत में, इतना ही कहा जा सकता है कि प्रकृति में ऐसी कई व्यवस्थाएं और सम्बंध हैं जो अभी तक मनुष्यों की नज़र और समझ से ओझल हैं। ज़रूरत है सिर्फ थोड़ा ध्यानपूर्वक अवलोकन और निरीक्षण करने की। हमारे आस-पास ही दुर्लभ प्राकृतिक अजूबे मौजूद हैं, उनके बारे में हमें पता चल सकता है, ज़रूरत है तो बस थोड़े धैर्य और एकाग्रता की। (स्रोत फीचर्स)
-
Srote - July 2026
- नर्मदा की लड़ाई के वरिष्ठ साथी रमेश बिल्लौरे नहीं रहे
- गैलीलियो की हस्तलिखित टिप्पणियों से एक विचार प्रक्रिया पर रोशनी
- विकास के विरोधाभसों के अर्थशास्त्री डॉ. रामप्रताप गुप्ता नहीं रहे
- संश्लेषण जीव विज्ञान के पुरौधा जे. क्रैग वेंटर नहीं रहे
- मालवा के भूजल भंडारों का पुनर्भरण और गांधीसागर
- जलवायु परिवर्तन से गायब हो सकता है कोहरा
- जलवायु सम्बंधी निर्णयों में वैज्ञानिकों की भूमिका
- जलवायु संकट से निपटने में पेड़ व तकनीक दोनों ज़रूरी
- वन्यजीव व्यापार से बढ़ता संक्रमण का खतरा
- सेप्सिस का अदृश्य खतरा और हमारी स्वास्थ्य रणनीति
- हू-ब-हू एक जैसे जुड़वां के बीच पहचान का संकट
- क्या खून के थक्के कृत्रिम तरीके से जम सकते हैं?
- चींटियों का एक अनूठा सम्बंध
- भारत के मेडिकल कॉलेजों में कमज़ोर होती समग्र देखभाल
- कॉफी का दिमाग और मूड पर सकारात्मक प्रभाव
- जंक फूड से परेशान बंदरों का अजीब व्यवहार
- घोड़े की हिनहिनाहट असाधारण है
- पानी की जांच से जैव विविधता के सुराग
- प्रोटीन, फाइबर और सेहत से भरपूर मटर
- धान वगैरह को हर साल रोपने से मुक्ति का रास्ता
- नैनोप्लास्टिक हटाने में मदद करेंगे नैनोरोबोट
- चमकते मशरूम से रोशनी देने वाले पौधे बनाने का सफर
- तूफान में दमकते पेड़ों के शिखर
