जल ही जीवन है, यह बात शाकीय पौधों के संदर्भ में सौ फीसदी प्रत्यक्ष लागू देखी जा सकती है। धनिया, पालक, मेथी जैसी सब्ज़ियों के पौधे पानी की ज़रा-सी कमी होने पर तुरंत मुरझा जाते हैं।
अधिकांश पादप प्रजातियां, उनके अंदर पानी की मात्रा 60 प्रतिशत से कम होने पर संकट में पड़ जाती हैं या मर जाती हैं। वहीं, कुछ मांसल पौधे उनमें पानी की मात्रा 50 या 40 प्रतिशत तक रह जाने पर भी जीवित रह पाते हैं। उनमें पानी को बचाए रखने के कुछ तरीके भी हैं। उनकी मोटी फूली-फूली पत्तियां मोम जैसी परतों से ढंकी होती हैं, जिसके चलते पानी का वाष्पन कम होता है। इन पौधों में एक और विशेषता पाई जाती है। पानी पत्तियों पर उपस्थित महीन छिद्रों (स्टोमेटा) के रास्ते वाष्पीकृत होता रहता है और उन्हीं छिद्रों के रास्ते प्रकाश संश्लेषण के लिए कार्बन डाईऑक्साइड ग्रहण की जाती है। अत: ऐसे में पानी को बचाने के लिए ये पौधे अपने स्टोमेटा रात में खोलते हैं ताकि पानी का वाष्पीकरण कम हो और उस समय कार्बन डाईऑक्साइड का भंडारण कर सकें। दिन के समय यह प्रकाश संश्लेषण में काम आती है।
परंतु कुछ पौधे ऐसे भी पाए जाते हैं जो पूरी तरह सूख जाने के बाद भी फिर से पानी मिलने पर पुनर्जीवित हो जाते हैं। इनका व्यवहार एकदम विपरीत होता है। जब इनके अंदर पानी की मात्रा कम होने लगती है तो वे अपनी शेष नमी को भी पूरी तरह से त्याग देते हैं। परिणाम यह होता है कि उनके अंदर जल स्तर घटकर मात्र 5 प्रतिशत रह जाता है और वे मुरझाकर एक भूरी टहनी भर रह जाते हैं। देखकर ऐसा लगता है कि वे मर ही गए हैं, परंतु पानी मिलते ही फिर से जी उठते हैं, हरे-भरे हो जाते हैं।
पुनर्जीवित होने वाले पौधों की बात हो तो हमारे यहां सबसे पहले संजीवनी बूटी का नाम ज़ेहन में आता है। इसे लक्ष्मण बूटी भी कहते हैं। 
पुनर्जीवन की क्षमता वाले पौधों पर सर्वाधिक शोध कार्य एक अफ्रीकी वैज्ञानिक जिल फैरेन्ट ने किया है। वे वर्तमान में दक्षिण अफ्रीका के केप टाउन विश्वविद्यालय में आणविक और कोशिका विज्ञान की प्रोफेसर हैं जिनके खास विषय हैं पुनर्जीवन पौधों की खोज और उनकी कार्य प्रणाली का अध्ययन करना।
उन्होंने 2025 में केप टाउन के एक पुराने स्मारक के पास एक रेतीले रास्ते पर झाड़ियों के पास भूरे रंग की सूखी हुई मुरझाई कुछ टहनियों को उठाया जो देखने में बिल्कुल बेजान-सी लगती थीं। यह वही पौधा था जिसे उन्होंने बरसों पहले बचपन में देखा था।
यह एनीमिया एफ्रोरम (Anemia affrorum) नाम का एक फर्न था। वे इसकी चमत्कारी शक्ति से प्रभावित थीं। उन्होंने प्रयोगशाला में इसकी कुछ सूखी टहनियों को पानी भरी तश्तरी में रख दिया। कुछ ही घंटों में टहनियों पर छोटे-छोटे हरे पत्ते खुलने लगे। अगली सुबह तक सभी शाखाएं हरी-भरी नज़र आने लगीं, बिलकुल एक नन्ही क्रिसमस ट्री के समान।
दरअसल एनीमिया एफ्रोरम पुनर्जीवित होने वाला एक फर्न है जो महीनों या वर्षों तक भीषण सूखे को सहन करके पानी मिलने पर दो-तीन दिन में ही फिर से जीवित हो जाता है; यह लंबे और इन्तहाई शुष्क मौसम वाले क्षेत्रों में उगने वाले पौधों में पाया जाने वाला एक दुर्लभ अनुकूलन है, जो जैव विकास के लंबे दौर में पैदा हुआ है। अक्सर ये पौधे पानी की कमी होने पर अपनी कोशिकाओं को ऊर्जा देने वाले क्लोरोफिल रंजक को नष्ट कर देते हैं और कोशिकाओं में लगभग हर जगह मौजूद पानी की जगह शर्करा और प्रोटीन भर लेते हैं। फैरेन्ट इसे बिना मरे सूख जाना कहती हैं यानी ‘प्लेईंग डेड’ या मरने का स्वांग।
प्रयोगशाला में फैरेन्ट ने जो किया था, वह हमारे यहां सड़कों पर कांच की बोतलों में किया जाता है। ऐसा नज़ारा अक्सर धार्मिक मेलों में देखने को मिल जाता है। सड़कों पर कुछ लोग एक वनस्पति का ढेर लिए बैठे रहते हैं और उसके कुछ पौधों को वे पानी की बोतल में भरकर रखते हैं जो बिल्कुल ताज़ा एवं हरे भरे दिखते हैं जबकि ढेर के पौधे एकदम सूखे और मुड़े-तुड़े होते हैं। इस पौधे को वे संजीवनी बूटी के नाम से बेचते हैं। यह भी एनीमिया एफ्रोरम की तरह एक फर्न है और नाम है सेलेजिनेला ड्रायोप्टेरिस। यह हमारे देश में अरावली और विंध्य पर्वत शृंखला तथा दक्षिण भारत के शुष्क और चट्टानी इलाकों में मिलता है। यह एक लिथोफाइट (शैलोद्भिद) है जो 200 से 800 मीटर की ऊंचाई पर चट्टानों की दरारों में उगता है।
एक और मशहूर पुनर्जीवन पौधा है मायरोथेम्नस फ्लेबेलीफोलिया। यह मध्य और दक्षिणी अमेरिका में पाया जाने वाला एकमात्र काष्ठीय पुनर्जीवन पौधा है। इसका उपयोग पारंपरिक अफ्रीकी चिकित्सा पद्धति में घावों के लिए मरहम बनाने तथा सांस की तकलीफों में धूम्रपान या औषधि चाय के रूप में किया जाता है।
मरने का स्वांग: पुनर्जीवन का विज्ञान
पुनर्जीवित होने वाली प्रजातियों में सूखने पर भी जीवित बने रहने के लिए कई रणनीतियां विकसित हुई हैं। प्रोफेसर फैरेन्ट ने इस जटिल सुनियोजित परिवर्तन का खुलासा किया है।
इस प्रक्रिया के दौरान होता यह है कि कोशिकाओं के अंदर का पानी सुक्रोज़ और रैफीनोस जैसी शर्कराओं और विभिन्न प्रोटीन द्वारा प्रतिस्थापित हो जाता है। इससे एक कांच जैसा पदार्थ बनता है जो कोशिका झिल्ली को सिकुड़ने से रोकता है। कोशिकाओं में कुछ विशेष प्रोटीन पाए जाते हैं जिन्हें शेपरॉन प्रोटीन कहते हैं। ये कोशिका में विभिन्न विशाल अणुओं (जैसे डीएनए और आरएनए) की संरचना को बनाए रखने में मदद करते हैं। जैसे-जैसे कोशिका का आयतन कम होता है वैसे-वैसे सैल्यूलोज़ से बनी कोशिका भित्ती अंदर की ओर मुड़ने लगती है ताकि वह कोशिका झिल्ली के संपर्क में बनी रह सके। तनाव के दौरान सक्रिय ऑक्सीजन मूलक भी बनने लगते हैं जो डीएनए, प्रोटीन व कोशिका झिल्ली को नुकसान पहुंचा सकते हैं। और इन्हें कई एंटीऑक्सीडेंट अणु तोड़ देते हैं।
प्रकाश संश्लेषण ऐसे सक्रिय ऑक्सीजन मूलकों का एक प्रमुख स्रोत होता है। इन पौधों में प्रकाश संश्लेषण की प्रक्रिया लगभग रुक जाती है। इसके अलावा, कुछ पुनर्जीवन पौधे अपनी पत्तियों को इस तरह मोड़ लेते हैं कि सूर्य की रोशनी क्लोरोफिल तक न पहुंचे। अन्य पौधे प्रकाश संश्लेषण तंत्र को पूरी तरह से नष्ट कर देते हैं और पानी मिलने पर फिर से उसका निर्माण करते हैं।
मरने-जीने की इस जटिल प्रक्रिया के अंतिम चरण में, जब पौधे में पानी 20 प्रतिशत से कम हो जाता है, तब पौधा कई आरएनए और अन्य अणु पैदा करके संग्रहित कर लेता है ताकि पुनर्जीवन के लिए ऊर्जा की व्यवस्था की जा सके। इसके बाद सब कुछ थम जाता है।
जीर्णता और पुनर्जीवन पौधे
पादप प्रजनकों ने ऐसी कई किस्में विकसित की हैं जो अधिक पानी संग्रहित कर सकती हैं, ये वाष्पीकरण के ज़रिए पानी कम उड़ाती हैं या पानी सोखने के लिए गहरा जड़ तंत्र विकसित कर लेती हैं ताकि सूखे की स्थिति में भी जीवित रह सकें। लेकिन इनमें जरावस्था आती है और इसकी परिणति को जीर्णता कहते हैं। परंतु पुनर्जीवन पौधों में यह स्थिति नहीं आती। फैरेन्ट की टीम ने दो प्रजातियों में जीर्णता रोकने वाले तंत्रों का पता लगाया है। इनमें एक मक्का है और दूसरी फसल इथियोपिया की टेफ (Eragrostis tef) है। उनका अगला कदम जेनेटिक इंजीनियरिंग के माध्यम से फसलों में जरावस्था को रोकने वाले तंत्र को शामिल करने का प्रयास है।
फैरेन्ट का कहना है कि अधिकांश फसल प्रजातियों में पहले से ही वे जीन मौजूद होते हैं जिनकी उन्हें पुनर्जीवन पौधों की नकल करने के लिए ज़रूरत होती है। ये जीन इन पौधों के बीजों में सक्रिय होते हैं जो वर्षों तक या दशकों तक जीवित रह सकते हैं और सही समय और स्थान पर अंकुरित होते हैं। ऐसा लगता है कि पुनर्जीवन पौधों का विकास इन जीन्स की अभिव्यक्ति को पौधे के अन्य भागों में विस्तार देकर हुआ है। इस तंत्र को सक्रिय करने वाले जीन्स की खोज फसलों को सूखा प्रतिरोधक क्षमता प्रदान करने की कुंजी हो सकती है।
वैज्ञानिकों की इस टीम को उम्मीद है कि जलवायु परिवर्तन के कारण वर्षा की कमी या अनियमितता के चलते खाद्य सुरक्षा की दृष्टि से ऐसे कुछ तंत्रों को आम फसलों में जोड़ा जा सकता है। हालांकि ऐसे जीन्स को आम फसलों में जोड़ना आसान नहीं होगा।
2017 में फैरेन्ट और एक बीज वैज्ञानिक हेंक हिलहोर्स्ट ने नेचर में एक पुनर्जीवन पौधे ज़ीरोफायटा विस्कोसा के जीनोम सम्बंधी एक शोध पत्र प्रकाशित किया था। इस शोध ने इस बात की पुष्टि की थी कि ये प्रजातियां उन जीन्स पर निर्भर होती हैं जो सामान्यत: उनके बीज में सक्रिय रहते हैं।
अलबत्ता, सूखा-सहिष्णु फसलों के विकास की दृष्टि से अभी दिल्ली दूर है। एक कारण तो यह कि ऐसे शोध के लिए फंडिंग का अभाव है।
वैसे, फैरेन्ट की टीम इस बात का भी अध्ययन कर रही है कि पुनर्जीवन पौधों की जड़ों में सूक्ष्मजीवों का कैसा संसार (माइक्रोबायोम) बसता है। यह माइक्रोबायोम इनकी जड़ों के विकास को बढ़ावा देता है और पोषण के अवशोषण में भी मदद करता है। फसली पौधों में ऐसा माइक्रोबायोम विकसित करके उन्हें सूखा-सहिष्णु बनाया जा सकेगा। यदि ऐसा हो सका तो खाद्य सुरक्षा के लिहाज़ से क्रांतिकारी होगा। (स्रोत फीचर्स)
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