हम मन ही मन कई बातें सोचते हैं लेकिन वे किसी को सुनाई नहीं पड़ती। क्या हो यदि मन की इन बातों को बाहर सुना जा सके? और हाल ही में सेल पत्रिका में प्रकाशित एक शोध पत्र में इसी करिश्मे का उल्लेख किया गया है। इसमें शोधकर्ताओं ने मस्तिष्क में लगाए गए इम्प्लांट्स और डैटा विश्लेषण की मदद से चार लोगों की मन की बातों से सम्बंधित तंत्रिका संकेतों को अलग करने की जुगाड़ जमाई है। ये चारों व्यक्ति गति सम्बंधी दिक्कतों से पीड़ित थे जो उनकी बोलने की क्षमता को बाधित कर रही थी। शोधकर्ताओं ने मस्तिष्क-कंप्यूटर इंटरफेस स्थापित किया जो उनके मन की बातों को वाणी दे सकता है। आप देख ही सकते हैं कि इसकी अपनी समस्याएं हैं - यह तकनीक किसी व्यक्ति के ऐसे विचारों को भी मुखर कर सकती है जो वह मन में ही रखना चाहे।
दरअसल शोध पत्र में इस बात को समझने की कोशिश हुई है कि आंतरिक वाणी कैसे निर्मित होती है। पिछले कुछ दशकों में इंजीनियर्स ऐसे लोगों के लिए कंप्यूटर सिस्टम्स बनाने में सफल हुए हैं जो लकवाग्रस्त होने की वजह से बोल नहीं पाते। इन सिस्टम्स में यह क्षमता है कि वे मस्तिष्क में चल रही गतिविधियों से शब्द निर्मित कर सकते हैं। उदाहरण के लिए, कुछ महीने पहले कैलिफोर्निया विश्वविद्यालय के शोधकर्ताओं ने एक यंत्र प्रस्तुत किया था जो एमायोट्रॉफिक लेटरल स्क्लेरोसिस (ALS) से पीड़ित एक व्यक्ति के दिमाग के मोटर कॉर्टेक्स में लगे इलेक्ट्रोड्स के संकेतों से शब्दों का सटीक व त्वरित पुनर्निर्माण कर सकता था।
इस मशीन को गति देने के लिए उस व्यक्ति को अपने मुंह से उन शब्दों को बोलने की भरसक कोशिश करनी होती थी - यानी उसे बोलने का प्रयास होता है। इस गतिविधि के संकेतों को यंत्र पकड़ सकता है। लेकिन सहभागियों का कहना था कि बोलने की कोशिश करना काफी थकाने वाला होता है।
हालांकि, अंदरूनी वाणी उत्पन्न करना कम थकाने वाले होता है लेकिन उसके संकेतों से शोधकर्ता बहुत थोड़े से शब्द पकड़ पाए थे। शोधकर्ताओं ने कोशिश जारी रखी। स्टैनफर्ड विश्वविद्यालय के एरिन कुंज़ ने सबसे पहले तो गति-बाधित लोगों के मस्तिष्क में लगे इलेक्ट्रोड्स का विश्लेषण किया। ये इलेक्ट्रोड मोटर कॉर्टेक्स के उस हिस्से में लगे थे जिसका सम्बंध बोलने के प्रयास से है। शोधकर्ताओं ने दो स्थितियों के रिकॉर्डिंग की तुलना की - एक तब जब सहभागी शब्दों को ज़ोर से बोलने का प्रयास कर रहे थे और दूसरी तब जब वे मन ही मन वे शब्द सोच रहे थे। शोधकर्ताओं ने पाया कि इन दोनों स्थितियों (बोलने का प्रयास और मन में सोचना यानी अंदरूनी वाणी) में इसी क्षेत्र की तंत्रिकाएं सक्रिय हुईं।
अंदरूनी वार्तालाप पर ध्यान केंद्रित करके कुंज़ व साथियों ने एक एल्गोरिद्म विकसित किया जो इन संकेतों को ध्वनि में बदल सकता था। अब बारी आई इस मॉडल को प्रशिक्षित करने की। टीम ने सहभागियों से कहा कि वे सवा लाख शब्दों की एक सूची के शब्दों को मन ही मन बोलें और उनकी तंत्रिका गतिविधि को रिकॉर्ड कर लिया। फिर सहभागियों से कहा गया कि वे उन शब्दों का इस्तेमाल करते हुए कुछ पूरे-पूरे वाक्य बोलने की कल्पना करें।
परिणाम यह रहा कि उनका मॉडल अंदरूनी वार्तालाप को तत्काल वाक्यों में बदल सका। इसमें गलती होने की दर 26 से 54 प्रतिशत रही जो आज तक के प्रयासों में सबसे बेहतर है।
हालांकि गलती की दर काफी अधिक है, लेकिन यह अध्ययन मनोगत वार्तालाप की अच्छी छानबीन है। वैसे इस तरह के अध्ययनों के साथ एक समस्या निजता सम्बंधी भी है। कहीं ऐसा न हो कि वाणी-बाधित लोगों के सारे विचार खुलकर उजागर होने लगें। एक विचार तो यह है कि सारे मनोगत विचारों को नहीं बल्कि सिर्फ उन विचारों को एल्गोरिद्म तक पहुंचने दिया जाए, जिन्हें बोलने की कोशिश वह व्यक्ति कर रहा हो। दूसरा विचार है कि कोई ऐसा पासवर्ड हो जो वह व्यक्ति सोचे तभी विचारों को ध्वनि में तबदील किया जाए। एक व्यक्ति के मामले में यह पासवर्ड वाली व्यवस्था 99 प्रतिशत बार कारगर रही।
मस्तिष्क-कंप्यूटर इंटरफेस के विकास के साथ ऐसी व्यवस्थाएं निजता को सुरक्षित रखने के लिए अधिकाधिक ज़रूरी होती जा रही हैं। (स्रोत फीचर्स)
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Srote - November 2025
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