एक हालिया अध्ययन के अनुसार, पृथ्वी की कार्बन डाईऑक्साइड को सुरक्षित रूप से भूमिगत भंडारण की करने क्षमता पूर्व अनुमानों से कहीं कम है और यह साल 2200 तक खत्म भी हो सकती है। इसका मतलब है कि जलवायु परिवर्तन से निपटने के लिए कार्बन कैप्चर और स्टोरेज जैसी तकनीकों को लंबी अवधि का हल मानना मुश्किल है।
पेरिस समझौते के तहत धरती के तापमान को औद्योगिक-पूर्व स्तर से डेढ़ से दो डिग्री सेल्सियस तक सीमित रखने के लिए वातावरण से काफी मात्रा में कार्बन डाईऑक्साइड को हटाना होगा। इसका एक तरीका है उद्योगों से निकलने वाली गैस को कैद करके गहराई में चट्टानों के बीच संग्रहित करना। पहले माना गया था कि धरती 10 से 40 हज़ार गीगाटन कार्बन डाईऑक्साइड संभाल सकती है, लेकिन ऑस्ट्रिया के वैज्ञानिकों का नया अध्ययन बताता है कि सुरक्षित क्षमता सिर्फ 1460 गीगाटन है।
इस अनुमान में भूकंप से होने वाले रिसाव, तकनीकी दिक्कतों और ज़मीन के उपयोग पर राजनीतिक पाबंदियों जैसे कारकों को भी शामिल किया गया है। अध्ययन में स्थिर तलछटी चट्टानों पर ही गौर किया गया है, जहां फिलहाल अधिकांश कार्बन भंडारण योजनाएं बनाई जा रही हैं।
फिलहाल, कार्बन कैप्चर और स्टोरेज तकनीक हर साल लगभग 4.9 करोड़ टन कार्बन डाईऑक्साइड हटाती है। योजना है कि इसे बढ़ाकर 41.6 करोड़ टन सालाना किया जाए। लेकिन पेरिस समझौते का लक्ष्य हासिल करने के लिए 2050 तक प्रति वर्ष 8.7 गीगाटन कार्बन डाईऑक्साइड हटाना होगा - यानी अगले 30 सालों में 175 गुना बढ़ोतरी।
वैज्ञानिकों का अनुमान है कि अगर धरती की सारी सुरक्षित क्षमता भी उपयोग कर ली जाए, तो भी तापमान केवल 0.7 डिग्री सेल्सियस ही घटेगा। जबकि इस सदी में तापमान 3 डिग्री सेल्सियस तक बढ़ने का अंदेशा है। इसलिए सिर्फ कार्बन कैप्चर के भरोसे नहीं रहा जा सकता। ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन को तेज़ी से घटाना होगा, नवीकरणीय ऊर्जा को बढ़ाना होगा और टिकाऊ तरीकों को अपनाना होगा।
अध्ययन यह भी बताता है कि ज़मीन में दफन कार्बन डाईऑक्साइड का रिसाव ज़मीन के पानी में घुलकर कार्बोनिक एसिड बना सकता है। इस तरह बढ़ी हुई अम्लीयता से खनिज घुल सकते हैं और ज़हरीली धातुएं निकल सकती हैं, जो पर्यावरण और मानव स्वास्थ्य दोनों के लिए खतरनाक है। (स्रोत फीचर्स)