पारुल सोनी 

हर शिकारी जन्तु के शिकार करने के अपने-अपने तरीके होते हैं। जैसे चीते को ही लें। चीते तेज़ धावक होते हैं मगर बहुत दूर तक लगातार भाग नहीं सकते। वे इतनी तेज़ गति से अपने शिकार का पीछा करते हैं जितना कोई और जन्तु नहीं कर सकता। चूँकि इतनी तेज़ गति ये बहुत देर तक बनाए नहीं रख सकते इसलिए इनके लिए ज़रूरी होता है कि अपने शिकार का पीछा करने से पहले वे शातिर तरीके से अपने शिकार के पास पहुँच जाएँ और फिर तेज़ गति से भागकर उनका पीछा करें। इसी तरह मकड़ियाँ भी विभिन्न तरीके अपनाती हैं अपने शिकार को पकड़ने के लिए।
वैसे तो आम तौर पर मकड़ियाँ अपने भोजन को चिपचिपे जाले में फँसाने और अपने ज़हर से उन्हें पैरेलाइज़ करने के लिए जानी जाती हैं। ये ज़हर शिकार के तंत्रिका तंत्र पर ऐसा असर करता है जिससे शिकार बिलकुल हिल-डुल नहीं पाता। लेकिन यह तरीका दुनिया में लगभग ज्ञात 40,000 मकड़ी की प्रजातियों द्वारा शिकार करने के बहुत-से तरीकों में से एक है।

मकड़ियाँ हर जगह पाई जाती हैं चाहे वो वर्षा वन हों या रेगिस्तान, पहाड़ी जगह हों या मैदानी इलाके और हमारे आसपास तो होती ही हैं। मकड़ी क्या खाती हैं और अपने शिकार को कैसे पकड़ती हैं - ये जानना काफी मज़ेदार और आश्चर्यजनक है। मकड़ियाँ कीड़े, अन्य मकड़ी और तो और साँप व पक्षियों जैसे छोटे जानवरों का शिकार करती हैं और खाती हैं।
यहाँ हम कुछ चुनिन्दा मकड़ियों द्वारा शिकार करने के अजीबोगरीब तरीकों के बारे में बात करेंगे।

नेट कास्टिंग स्पाइडर
नेट कास्टिंग स्पाइडर लगभग पूरी दुनिया भर में उष्णकटिबंधीय इलाकों में पाई जाती हैं। ये मकड़ियाँ अधिकतर रात में सक्रिय होती हैं और अपने अनोखे तरीके से शिकार करने के लिए रात में निकलती हैं।
लकड़ी की तरह लम्बी ये मकड़ियाँ विचित्र तरह का जाला बुनती हैं जो उनकी आगे की टाँगों के बीच में फँसा रहता है। घुमावदार धुँधले-से जाले में उल्टा लटके हुए वे अपने शिकार का इन्तज़ार करती हैं। जैसे ही कोई कीड़ा जाल के नीचे से गुज़रता है तो ये मकड़ी अपने जाले को सामान्य आकार से दो से तीन गुना तक फैला देती हैं। फिर कीड़े के ऊपर खुद को धकेलते हुए अपना जाल फैला देती हैं और शिकार को दबोचकर खत्म कर देती हैं। इसीलिए इन्हें नेट कास्टिंग स्पाइडर कहा जाता है।

ब्लैक विडो स्पाइडर
लेट्रोडेक्टस जाति की मकड़ियाँ अंटार्कटिका के अलावा सभी महाद्वीपों पर पाई जाती हैं। मादा ब्लैक विडो मकड़ी नॉर्थ अमेरिका में सबसे ज़्यादा ज़हरीली मानी जाती हैं जिनका ज़हर नाग के ज़हर से पन्द्रह गुना ज़्यादा घातक माना जाता है।
इनके मुख्य शिकार होते हैं मक्खी, मच्छर, टिड्डे, बीटल, इल्ली, साँप और नर ब्लैक विडो मकड़ी। लेट्रोडेक्टस की कुछ प्रजातियाँ बहुत आक्रामक होती हैं। इनकी कुछ प्रजातियों में मादा ब्लैक विडो सहवास के बाद नर मकड़ी को खा जाती है, जिस वजह से इनका नाम विडो स्पाइडर पड़ा है। हालाँकि कुछ प्रजातियों में मादा का यह व्यवहार बहुत कम देखने को मिलता है। यह व्यवहार हम मुख्यत: प्रयोगशालाओं में देख सकते हैं जहाँ सहवास के बाद नर ब्लैक विडो मकड़ी पिंजरे में बन्द रहने के कारण बचकर भाग नहीं पाती। वैसे इस उग्र सहवास अवधि के अलावा मादा ब्लैक विडो पूरे साल भर एकान्तवासी होती हैं।

ब्लैक विडो स्पाइडर अपने शिकार को फँसाने के लिए बेडौल, बहुत जटिल-सा और चिपचिपा जाल बुनती हैं। अपने जाले के बीच अक्सर उलटा लटके हुए विडो स्पाइडर किसी कीड़े के जाले से टकराने और उसमें फँसने का इन्तज़ार करती हैं। इससे पहले कि जाले में फँसा हुआ कीड़ा खुद को छुड़ा पाए विडो स्पाइडर उस कीड़े पर तीव्र प्रहार करते हुए उसे काटती हैं और अपने रेशे से उसे बाँध लेती हैं। फिर अपने ज़हरीले दाँत शिकार में गड़ाती हैं और पाचक एंज़ाइम के द्वारा अन्दरूनी अंगों को गलाकर चूस लेती हैं। अगर मकड़ी को अपने शिकार से खतरा महसूस होता है तो वो तुरन्त जाले के सुरक्षित रेशों में चली जाती हैं।
वैसे ब्लैक विडो स्पाइडर की दृष्टि काफी कमज़ोर होती है इसलिए अपने फँसे हुए शिकार को ढूँढ़ने या कोई बड़े खतरे को भाँपने के लिए ये अपने जाले के ज़रिए पैदा हो रहे कम्पन को महसूस करती हैं।
इनका ज़हर कशेरुकी जानवरों के लिए भी खतरनाक साबित होता है। सिर्फ मादा ब्लैक विडो का काटना मनुष्यों के लिए समस्या पैदा कर सकता है, हालाँकि ये प्राणघातक कभी कभार ही होता है।

बोलस स्पाइडर
इस समूह की मकड़ियाँ अमेरिका, अफ्रीका और ऑस्ट्रेलिया में पाई जाती हैं। रात होते ही ये मादा मकड़ियाँ अपने शिकार को ऐसा प्रलोभन देती हैं जो उसके लिए प्राणघातक साबित होता है। वो एक किस्म का चिप-चिपा पदार्थ तैयार करती हैं (जिसे ‘बोलस’ कहा जाता है) जो उनके द्वारा बनाए गए रेशे पर लटका रहता है। इस पदार्थ में एक ऐसे रसायन की गन्ध होती है जो मादा पतंगे की गन्ध से मेल खाती है। जैसे ही कोई नर पतंगा इस गन्ध की तरफ सहवास के लिए खिंचा चला आता है तो बोलस मकड़ी उस पदार्थ भरे रेशे को लहराती हुई लाती हैं और पतंगे पर प्रहार करते हुए उसे झपट लेती हैं। एक बार अगर पतंगा फँस गया तो ये मकड़ियाँ जाले के अन्दर जाकर पतंगे को खत्म कर देती हैं और अपने भोजन को जाले में लपेटकर सुरक्षित कर लेती हैं। इस तरह पतंगा बोलस मकड़ी के प्रलोभन में आकर अपनी जान गँवा बैठता है।
ये मकड़ियाँ गोलाकार जाला बुनती हैं और अच्छी दृष्टि होने की वजह से अक्सर जाले के करीब उड़ रहे किसी भी कीड़े को पकड़ने में सफल हो जाती हैं। वैसे ऐसा भी माना जाता है कि बोलस मकड़ी कीड़े के उड़ने की ध्वनि से भी अपने शिकार को ढूँढ़ लेती हैं। नर बोलस थोड़ा अलग तरह से शिकार करते हैं। वे ‘बोलस’ पदार्थ का इस्तेमाल नहीं करते बल्कि पत्तियों के किनारों पर बैठकर अपने शिकार का इन्तज़ार करते हैं और अपनी अगली दो टाँगों की मदद से शिकार को दबोच लेते हैं।

हेकल्ड ऑर्ब वीवर स्पाइडर
दुनिया के बहुत-से हिस्सों में पाई जाने वाली इस परिवार की मकड़ियों में विष ग्रन्थियाँ नहीं होतीं। सिर्फ यही नहीं इनके तेज़/भेदक दाँत भी नहीं होते और ये मनुष्यों के लिए घातक नहीं होतीं। लेकिन हेकल्ड ऑर्ब वीवर मकड़ी खौफनाक मकड़ियों की श्रेणी में ज़रूर आती हैं क्योंकि ये अपने रेशे का इस्तेमाल करते हुए शिकार को पूरी तरह से चकना-चूर कर देती हैं जब तक वह अपने प्राण न त्याग दे।
जैसे ही बेकस कीड़ा जाल में प्रवेश करता है, मकड़ी उसे गतिहीन करने के लिए जल्दी-जल्दी अपने रेशे से कीड़े को बाँधना शु डिग्री कर देती है। हेकल्ड ऑर्ब वीवर शिकार को कसकर तब तक बाँधती रहती है जब तक कि उस कीड़े के पंख और टाँगें टूट न जाएँ। अब ये शिकार अपनी जान बचाकर भाग नहीं सकता।

लेकिन कीड़ा अभी भी ज़िन्दा है इसलिए हेकल्ड ऑर्ब वीवर रेशे लपेटने का काम जारी रखती है पर इस बार वह शिकार के सर पर रेशा बाँधना शुरू कर देती है और तब तक लपेटती रहती है जब तक उस कीड़े की आँखें सर के अन्दर धँस न जाएँ। इसके बाद उसके ऊपर एक पदार्थ उगल देती है। इसमें पाचक एंज़ाइम होते हैं जिससे मकड़ी कीड़े के अंगों को गलाकर निगल लेती है।
कुल मिलाकर हेकल्ड ऑर्ब वीवर 140 मीटर रेशे का इस्तेमाल करते हुए अपने शिकार को चूर-चूर कर देती है। इस परिवार की मकड़ियाँ जाला बुनने के लिए हलके और धुँधले-से रेशे को उत्पन्न करती हैं और शिकार पकड़ने के लिए अपने गोल एवं घुमावदार जाले में किसी चिपचिपे पदार्थ का उपयोग नहीं करतीं।

सामाजिक मकड़ियाँ
मकड़ियों की बहुत बड़ी आबादी ऐसी है जो बिलकुल भी सामाजिक नहीं होती बल्कि एकान्तवासी होती है। लेकिन कुछ दर्ज़न प्रजातियाँ ऐसी भी हैं जो बड़े समूह में हज़ारों की संख्या में रहती हैं और समूह में ही शिकार भी करती हैं। इनको ‘सोशल स्पाइडर’ कहा जाता है।
थेरिडियन नाइग्रोएन्युलेटम और एनेलोसिमस एक्ज़ीमिअस इन्हीं की प्रजातियाँ हैं और बहुत मिलनसार मानी जाती हैं। ये मकड़ियाँ न सिर्फ एक-दूसरे के अण्डों की रक्षा करती हैं बल्कि अपने जाले के लिए शिकार भी मिलकर पकड़ती हैं। ये समूह में पत्तियों के निचले हिस्से में रेशे से लटके हुए शिकार का इन्तज़ार करती हैं। जैसे ही शिकार नज़दीक आता है, समूह की मकड़ियाँ नीचे गिरते हुए चिपचिपे जाले को शिकार पर फेंकती हैं और अपने ज़हरीले दाँतों से शिकार को मार देती हैं। अपने आकार से बड़े शिकार को अपने जाल में वापस ले जाने के लिए ये मकड़ियाँ बारी-बारी से मदद भी करती हैं और पूरे समूह की मदद से मरा हुआ शिकार जाल तक पहुँच जाता है।

एनेलोसिमस एक्ज़ीमिअस की सामूहिक रूप से काम करने की क्षमता ज़्यादा होने के कारण ये अपने जाले का आकार बढ़ाती रहती हैं और कॉलोनी को बचाए रखने के लिए पर्याप्त पोषक-तत्व उपलब्ध करवा पाती हैं। इन मकड़ियों का समूह जाल में बहुत सारे शिकार नहीं फँसाता लेकिन इतना बड़ा शिकार पकड़ पाता है जो एक अकेली मकड़ी के लिए पकड़ना सम्भव नहीं होता। इस तरह, अपनी इस तकनीक से ये अपने समूह के लिए ज़्यादा पोषक-तत्व उत्पन्न कर पाती हैं।

अक्सर हम इस बात पर कम ही ध्यान देते हैं कि हमारे आसपास के छोटे जीव-जन्तु अपने भोजन का प्रबन्ध करने के लिए कितने चालाकीपूर्ण तरीके अपनाते हैं। अगर मकड़ियों की बात करें तो इस बात पर भी कम ही ध्यान देते हैं कि मकड़ी के जाले में किसी कीड़े के फँसने के बाद मकड़ी उसका क्या हाल करती है। लेकिन सच ये है कि मकड़ियाँ शिकार करने की विभिन्न रणनीतियाँ अपनाती हैं जो रोचक, जटिल और विवेकपूर्ण भी होती हैं। जब हम मकड़ियों की दुनिया की बात करते हैं तो वहाँ बहुत तरह की खतरनाक मकड़ियों से सामना होता है। बेशक प्रकृति अद्भुत है, आश्चर्यजनक भी और कई बार डरावनी भी।


पारुल सोनी: संदर्भ पत्रिका से सम्बद्ध हैं।