सवाल: हम ध्वनि को देख और प्रकाश को सुन क्यों नहीं पाते हैं?

—अलायना, तेरह साल

जवाब: दिलचस्प सवाल है और इसका उत्तर दो भागों में होगा।
हमारे अन्दर बहुत-सी इन्द्रियाँ होती हैं। ये हमें आसपास के परिवेश और हमारे बारे में जानकारी देती हैं। उदाहरण के लिए यदि हमारे शरीर को कोई चीज़ छू ले तो हमें पता चल जाता है। स्पर्श का यह एहसास हमारे पूरे शरीर पर फैला हुआ है। फिर इसके अलावा हमारे अन्दर गंध, स्वाद, सुनने और प्रकाश के संवेदन होते हैं। ये संवेदनाएँ हमारे शरीर के बाहर की चीज़ों के प्रति प्रतिक्रिया करती हैं।

फिर ऐसे संवेदन भी होते हैं जो हमारे आन्तरिक कार्यों पर भी निर्भर करते हैं। जैसे भूख लगने की हमारी अनुभूति पूर्णत: आन्तरिक होती है।
कभी-कभी कोई खास संवेदन किसी एक अंग में केन्द्रित रहता है। जैसे गंध या स्वाद का संवेदन हमारी नाक, गले और मुँह में केन्द्रित रहता है। कोई मीठी चीज़ हमारे पैर की त्वचा पर लगने पर हमें स्पर्श के अलावा और कोई भी अनुभूति नहीं देगी। यदि हमारे सर के पीछे वाले हिस्से पर प्रकाश डाला जाए तो हमें प्रकाश का बोध नहीं होगा (सिवाय उसकी गर्मी के)।

इसलिए ऐसा लगता है कि विशेष संग्राहक (receptors) खास तौर पर विशेष अनुभूतियों को ग्रहण और महसूस करने के लिए बने हैं। यह पूरी तरह सही नहीं है। उदाहरण के लिए हमारी जीभ विशेष रूप से स्वाद महसूस करने के लिए है लेकिन उसमें स्पर्श की संवेदना भी है।

ऐसा प्रतीत होता है कि संवेदी अंगों (जैसा कि उनको कहा जाता है) में तंत्रिका सिरे होते हैं जो प्राप्त उद्दीपन से प्रभावित होते हैं। जैव विकास की प्रक्रिया के दौरान कुछ तंत्रिकाएँ किसी विशेष उद्दीपन के प्रति प्रतिक्रिया करने के लिए खास तौर पर डिज़ाइन हुई हैं। जब उन तंत्रिकाओं पर कोई विशेष संवेदन मिलता है तो वे सक्रिय हो जाती हैं और मस्तिष्क को संकेत भेजने लगती हैं। सभी तंत्रिकाओं से आ रहे संकेत एक समान होते हैं। हालाँकि, हर तरह की तंत्रिका मस्तिष्क में एक खास क्षेत्र से जुड़ी रहती है। मस्तिष्क का हर क्षेत्र किसी एक कार्य या संवेदन के लिए निश्चित होता है। जब एक संकेत किसी तंत्रिका से मस्तिष्क के एक खास क्षेत्र पर पहुँचता है तो मस्तिष्क उसे अर्थपूर्ण बनाने की कोशिश करता है। यदि संकेत, सुनने के लिए ज़िम्मेदार मस्तिष्क क्षेत्र में पहुँचता है तो मस्तिष्क सोचता है कि यह एक ध्वनि संकेत है, आदि।

तो यहाँ मुख्य मुद्दा यह है कि संवेदी अंगों के पास के तंत्रिका सिरे विशिष्ट रूप से कुछ निश्चित संकेत या संकेतों को प्राप्त करते हैं और उनके प्रति प्रतिक्रिया करते हैं। उद्दीपन प्राप्त होने पर तंत्रिका मस्तिष्क को संकेत भेजती है। सभी तंत्रिकाओं द्वारा भेजे गए संकेत समान प्रकृति के होते हैं। पर इसका अर्थ क्या होगा या लगाया जाएगा, मस्तिष्क के उस क्षेत्र पर निर्भर करता है जहाँ संकेत पहुँचता है।

अत: हमारे तंत्रिका तंत्र के तार कुछ ऐसे होते हैं कि एक खास संवेदी अंग का संकेत मस्तिष्क के एक निश्चित क्षेत्र में ही पहुँचता है। इसलिए हम सामान्यत: ध्वनि को देख नहीं सकते या दृश्य का स्वाद नहीं लेते। हालाँकि, ‘सामान्यत:’ शब्द महत्वपूर्ण है।

कुछ व्यक्तियों में ये तार एक-दूसरे में मिल जाते हैं। ऐसे लोग ध्वनियों को देखते हैं और दृश्यों का स्वाद लेते हैं। इसे ‘सिनस्थीसिया’ कहते हैं। इसका मतलब हुआ कि दो संवेदनाओं के बीच अदला-बदली हो गई है। आपस में मिल गई हैं। बहुत-से लोगों ने यह जानकारी दी है कि जब वे कुछ अक्षरों (जैसे ए या एन) को देखते हैं तो उन्हें अपने मुँह में चॉकलेट का स्वाद आता है या जब वे किसी संगीतमय वाद्य को सुनते हैं तो उन्हें उसके साथ कोई रंग भी दिखाई देता है।

बहुत-से शोधकर्ताओं ने इस ‘सिनस्थीसिया’ नाम की चीज़ पर काम किया है और इसे सही भी पाया है। और अब यह माना जाता है कि यह बहुत सामान्य बात है। वैज्ञानिक सिनस्थीसिया का स्पष्ट कारण तो नहीं जानते पर इसका एक कारण यह भी हो सकता है कि संकेत संवेदी अंग से मस्तिष्क के ‘गलत’ क्षेत्र में पहुँच जाता हो।
तो कुछ लोग ध्वनि को देखते हैं और रंगों का स्वाद ले सकते हैं।


यह जवाब सुशील जोशी ने तैयार किया है।
अंग्रेज़ी से हिन्दी अनुवाद: पारुल सोनी
सवालीराम का यह सवाल अल-क़मर स्कूल, चेन्नई की एक छात्रा अलायना द्वारा पूछा गया था। अल-क़मर अकादमी एक इस्लामिक स्कूल है जिसे अनीसा जमाल और हारून जमाल ने शुरू किया है। स्कूल का उद्देश्य है, बच्चों में सीखने का आनन्द बना रहे।