सवालीराम

पिछली दफा आयुष पाराशर ने सवालीराम से सवाल पूछा था कि दिल की धड़कन कैसे चलती है?
जवाब: मामला दिल का ज़रूर है लेकिन वैज्ञानिक बिरादरी की भी इसमें काफी रुचि रही है। आज से तेइस सौ साल पहले अलेक्जेंड्रिया के इरेसिसट्रेटस ने जानवरों के दिल पर कुछ प्रयोग किए। उस समय तक आम धारणा यह थी कि दिल को धड़कने के संदेश दिमाग से मिलते हैं। इरेसिसट्रेटस ने देखा कि जानवरों का दिल शरीर से अलग कर दिया जाए तब भी वह कुछ देर तक धड़कता रहता है। उसने अपनी बात को समझाने की कोशिश भी की लेकिन अगले दो हज़ार बरसों तक किसी ने भी इरेसिसट्रेटस के अवलोकनों की ओर तवज्जो नहीं दी।
सन् 1890 में हेनरी न्यूवेल मार्टिन ने एक प्रयोग के दौरान दिखाया कि दिल का सम्पर्क, दिमाग से आने वाली तंत्रिका में पूरी तरह काट भी दिया जाए, तव भी दिल धड़कता रहता। है। आप भी सोच रहे होंगे कि जवाब के शुरुआत में इस इतिहास की क्या ज़रूरत थी! यह तो बस इसलिए कि यह स्पष्ट हो पाए कि कुल जमा सौ साल पहले ही यह बात स्थापित हो सकी कि दिल की धड़कन का तंत्र दिल के भीतर ही स्थित है। तंत्रिका तंत्र महज धड़कनों की गति को कम-ज्यादा करने जैसे काम करता है।
हम यह मानकर चल रहे हैं कि इंसानी दिल की बनावट के बारे में आप कुछ बातें जानते ही हैं। फिर भी मोटी-मोटी जानकारी यह है कि इंसानी दिल को दोहरी प्रवाह व्यवस्था (double circulation system) कहा जाता है। यानी यहां दो प्रवाह तंत्र हैं। एक - दिल से शरीर में खून का प्रवाह और शरीर से खून का दिल में वापस आना। दूसरा - दिल से खून का फेफड़ों में जाना और फेफड़ों से खून का वापस दिल में आना। इन दोनों प्रवाह तंत्रों को चलाए रखने के लिए दिल को लगातार फैलने-सिकुड़ने का काम करना पड़ता है। संक्षेप में कहें तो दिल एक पंप है जो पूरे शरीर में खून को पहुंचाता है।

खैर, सबसे पहले हम देखते हैं कि धड़कन आखिर है क्या? दरअसल हम जिसे धक-धक कहते हैं उसमें पहली आवाज़ तो दोनों निलय (ventricle) से खून के तेजी से बाहर निकलने की शुरुआत में उनके दोनों ऊपरी वाल्ब  बंद होने की होती है। और उसके तुरंत बाद दूसरी 'धक' दोनों निलय से खून बाहर निकल जाने के बाद नीचे वाले दोनों वाल्व बंद होने की है। इन दोनों धक...धक के बीच समय अंतराल कम होने की वजह से ये दोनों आवाजें एक साथ ही आती महसूस होती हैं। इनमें से पहली आवाज़ थोड़ी हल्की व दूसरी तीखी होती है। ध्यान से सुनने पर ये आवाजें धक-धक के बजाए नव-डप जैसी सुनाई देती हैं। इस पूरी प्रक्रिया में 1 सेकेण्ड के 10वें हिस्से से भी कम समय लगता है। इसके बाद आलिंद में खून भरने का सिलसिला शुरू हो जाता है।
इंसानी दिल सामान्य स्थिति में औसतन एक मिनट में 72 बार धड़कता है। जब हम कसरत वगैरह कर रहे हों, दौड़ रहे हों तो दिल की धड़कन एक मिनट में 150 बार तक पहुंच जाती है। जब शरीर बुखार से तप रहा हो, या हम आवेश में हों या डर, रहस्य-रोमांच या रोमांस जैसी भावनाओं से गुजर रहे हों तब भी दिल की धड़कन अपनी सामान्य गति में खासी तेज़ हो जाती है।
यह पढ़कर आपको लग रहा होगा कि इंसानी दिल कितनी तेजी से धड़कता है लेकिन अन्य जीवों से तुलना पर दिखेगा कि हमारी क्या औकात! चूहे का दिल सामान्य अवस्था में एक मिनट में 500 बार धड़कता है, पर दूसरी ओर हाथी का दिल एक मिनट में सिर्फ 25-30 बार धड़कता है।
सवाल यह है कि वह कौन-सी प्रक्रिया है जो दिल को लगातार इतनी दक्षता के साथ चलाती है। यहां इस विषय में बहुत गहराई में जा पाना तो संभव नहीं है लेकिन इतना तो स्पष्ट है कि दिल की मांसपेशियों को विद्युत आवेगों के जरिए सिकुड़ने के संदेश लगातार क्रमबद्ध तरीके से मिलते रहते हैं।

ये विद्युत संवेग कहीं बाहर से नहीं आते बल्कि दिल के अंदर ही पैदा होते हैं। विद्युतीय तरंगें उत्पन्न करना दिल का अपना विशेष गुण है। ये विद्युतीय संवेग विशेष तरह की कोशिकाओं के छोटे-छोटे गुच्छों की एक गठान जिसे 'साइनो एट्रियल नोड़ या एस. ए. नोड कहते हैं, से उत्पन्न होते हैं। नाम से ही ज़ाहिर हो जाता है कि एस. ए. नोड़ दाहिने एट्रियम यानी आलिंद में स्थित होता है। ये कोशिकाएं खास तरह के रेशेदार तंतुओं के ज़रिए तीव्रतर दर से आवेग को आलिंद के सब हिस्सों की ओर प्रसारित करती हैं। इसीलिए अक्सर इन्हें दिल का कुदरती पेसमेकर कहा जाता है।

जैसे ही एक संवेग इस नोड़ पर उत्पन्न होता है, वह तुरंत ही दिल के दोनों आलिन्दों में एक लयबद्ध तरीके से संकुचन उत्पन्न करता है। इस संकुचन की वजह से आलिंद में इकट्ठा खून

यहां हृदय की बड़ी काट दिखाई गई है। हृदय एक खोखली मांसपेशी है जिसमें चार प्रकोष्ठ होते हैं। ऊपरी दो प्रकोष्ठों को आलिन्द (Auricles) कहते हैं। आलिंदों की दीवार पतली होती है अतः ये आसानी से खून से भर जाते हैं, किन्तु ये उच्च दबाव पर पंपिंग नहीं कर मकते। निचले दो प्रकोष्ठ निलय (Ventricles) कहलाते हैं। इनकी दीवार मोटी होती है और इस लिए इन प्रकोष्ठों में खून भरने के लिए दबाव लगाना पड़ता है। किन्तु ये चुन को काफी दबाव में आगे बढ़ा सकते हैं। दाएं आलिन्द में पूरे शरीर में खून आता है जबकि बाएं आलिन्द्र में मात्र फेफड़ों से। ये दोनों आलिन्द एक साथ संकुचित होते हैं और इनका मून निलयों में प्रवेश करता है। दायां निलय खून को फेफड़ों में भेजता है तथा बायां निलय पूरे शरीर में। निलय या आलिंद में संकुचन के लिए दिल का अपना एक अलग ही तंत्र है जिसे कुदरती पेसमेकर भी कहा जा सकता है।

बीच में स्थित वाल्व के माध्यम से निलय में जाने लगता है। लेकिन अभी तक निलयों में यह विद्युत संवेग नहीं पहुंच पाए हैं।

निलयों में संवेग पहुंचाने के लिए एक दूसरी व्यवस्था होती है - एक खास किस्म की कोशिकाओं का समुह जिसे ए. वी. नोड़ या एट्रियो वेन्ट्रिकुलर नोड़ कहा जाता है। इस नाम से ही स्पष्ट है कि ये कोशिकाएं आलिंद व इस चित्र में दिल की खड़ी काट के जरिए यह दिखाया गया है कि विद्युत संवेग एस. ए. नोड से निर्मित होते हैं, जिनकी वजह से दोनों आलिंदों में संकुचन शुरू हो जाता है। साथ ही ये संवेग ए. बी. नोड़ को भी प्रेरित करते हैं कि वह भी ऐसे ही संदेश निलय में भेजने का काम करे। फलस्वरूप दिल के शेष हिस्से में भी संकुचन शुरू हो जाता है। चित्र में दोनों नोड तो दिखाए ही गए हैं, साथ में दिल के विभिन्न हिस्सों पर लिखे हुए अंक दर्शाते हैं कि ये संदेश (इम्पल्स) एस. ए. नोड़ से शुरू होकर कितने सेकेंड बाद उस हिस्से तक पहुंचते हैं।

निलय की संधि पर स्थित होती हैं।
जैसे ही एस. ए. नोड से चला आवेग ए. वी. नोड तक पहुंचता है। वहां मौजूद कोशिकाओं का समूह भी उत्तेजित हो उठता है। परन्तु यह तब तक आगे संवेग जारी नहीं करता जब तक आलिंद दोनों निलय को खून से भर न दे। जैसे ही निलय खून से भर जाएं ए. वी. नोड निलय के सभी हिस्सों को वैसे ही विशेष रेशेदार तंतुओं के जरिए तीव्रता से संकुचन का संदेश पहुंचा देता है। निलय में संकुचन होने पर खून क्रमश: फेफड़ों और धमनियों में जोरों से पम्प हो जाता है।
तब तक आलिंद बिना संकुचन बाली पूर्व स्थिति में पहुंचना शुरू कर देते हैं यानी कि उनमें खून भरने लगता है। इस तरह से हृदय के अंदर ही एक आवेग उत्पन्न होकर पूरे हृदय को सक्रिय करता है, और फिर खत्म हो जाता है। जब आलिंद खून से पूरी तरह भर जाएं तो पम्पिंग का एक चक्र पूरा होता है। |
इसके फौरन बाद फिर से यह चक्र शुरू हो जाता है - एस. ए. नोड़ से संकुचन के लिए संवेग उत्पन्न होता है, आलिंद को संकुचन के संकेत पहुंचते हैं, यह संकेत ए. वी. नोड़ तक पहुंचता है, इस बीच आलिंद से खून निलय में पहुंच जाता है, प्रेरित ए. वी. नोड़ से उत्पन्न संदेश निलय को संकुचित करते हैं जिससे खून धमनियों व फेफड़ों में धका दिया जाता है। साथ ही आलिंद में खून भरने लगता है। इस प्रकार दुसरा चक्र पूरा हो जाता है।
इस तरह क्रमबद्ध तरीके से आलिंदों और निलयों का सिकुड़ना-फैलना चलता रहता है। हर चक्र के खत्म होने और दूसरे चक्र के शुरू होने के बीच के समय में ही दिल थोड़ा-सा आराम भी फरमा लेता है।
अभी तक जो भी चर्चा हुई है। उसमें एक मुद्दा छूटा जा रहा है, दिल तो अपनी तयशुदा लय में धड़क सकता है लेकिन उसकी लय को शरीर की ज़रूरत के हिसाब से बदलने के संकेत कहां से मिलते हैं?
केंद्रीय तंत्रिका तंत्र में शामिल मिम्पेथेटिक तंत्रिकाएं न केवल धड़कनों की गति को बढ़ाने के संकेत देती हैं। बल्कि रक्त दबाव को बढ़ाने के संकेत भी दिल तक पहुंचा सकती हैं। इसी तरह पैरा-सिम्पेथेटिक तंत्रिकाएं रक्त दाब व धड़कनों की गति को कम करने जैसे संदेश लेकर आती हैं। शायद यही दिल के काम को प्रभावित करने वाला बाहरी हस्तक्षेप है।
दिल की धड़कन को महसूस करने के कई तरीकों में स्टेथोस्कोप से सुनना, नब्ज़ पकड़ना आदि तो हैं ही। एक और तरीका आपको भी याद आ रहा होगा जिसे ई.सी.जी. यानी इलेक्ट्रो कार्डियोग्राम कहते हैं। इस तरीके में हृदय की पेशियों की कोशिकाओं में आयनों के बहाव (विद्युत धारा) को नापा जाता है। दरअसल हृदय के अंदर

थामकर देखिए अपनी नब्ज़ 

जब आप डॉक्टर के पास जाते हैं तो वह आपकी कलाई पकड़कर या स्टेथोस्कोप को कान में लगाकर आपकी दिल की धड़कनों को सुनने और परखने की कोशिश करता है। कलाई के अलावा पैर के टखनों, कनपट्टी, माथे जैसी अन्य जगहों पर भी अंगुली रखने पर धड़कन का अहसास होता है। शरीर में इन सब जगह से धमनियां गुजर रही हैं। धमनियों में दिल के निलयों से खून दबाव के साथ आता है। हर बार दबाव की वजह से धमनी फैलती है और जैसे ही दबाव हटता है, धमनी अपनी पूर्व अवस्था में आ जाती है। जैसे ही अगली बार खून दबाव के साथ धमनी में आता है तो वो फिर में फैलकर, दबाव हटते ही पूर्व अवस्था में आ जाती है। एक मिनट में जितनी बार दिल धड़केगा, आप धमनियों में भी उतने ही फैलाव महसूस कर पाएंगे। आप भी शरीर के विभिन्न स्थानों पर नब्ज़ टटोलने की कोशिश कीजिए।

कृत्रिम पेसमेकर: जब दिल का पेसमेकर अपना काम ठीक से न कर पा रहा हो तो मरीज़ को कृत्रिम पेसमेकर लगाया जाता है। आज में 10 बरस पहले जो पेसमेकर बनाए गए थे वे आकार में तो बड़े थे ही, साथ ही वे एक तयशुदा गति से दिल को धड़काने का काम करते थे। तकनीकी विकास के चलते अब जो पेसमेकर बनाए जा रहे हैं। वे आकार में छोटे हैं और उनमें ऐसे सेंसर लगे होते हैं जो शरीर की जरूरत के हिसाब से दिल की धड़कनों को कम-ज्यादा कर पाते हैं। बताया जाता है कि ये धड़कनों की गति को 60 धड़कन/मिनट से लेकर 150 धड़कन मिनट तक घटा-बड़ा सकते हैं। कुछ पैसमेकरों को शरीर के बाहर में भी समय-समय पर निर्देश दिए जा सकते हैं। यहां ऊपर वाले फोटो में दिल के मरीज़ की छाती का वो हिस्सा दिखाया गया है जहां त्वचा के नीचे पेसमेकर लगाया गया है। नीचे के चित्र में एक आधुनिक पेसमेकर दिखाया गया है।

उत्पन्न इन विद्युत संवेगों को नापने के लिए दिल में घुसने की कोई ज़रूरत नहीं है, शरीर के बाहर सेंसर लगाकर इन्हें नापा जाता है।
इस पूरी चर्चा में कृत्रिम दिल का ज़िक्र तो होना ही चाहिए। जब इंसानी दिल कुदरती तौर पर अपना काम ठीक से न कर पा रहा हो तो क्या किया जाए, यह सवाल स्वाभाविक है। इसका एक जवाब तो यही है कि किसी
 
कृत्रिम हदय: शरीर की जरूरतों को पूरा करने के लिए समय-समय पर कृत्रिम अंगों का सहारा लिया जाता रहा है। इसी कड़ी में कृत्रिम दिल भी बनाया गया। 1969 में पहली चार किमी इंसान को कृत्रिम दिल लगाया गया था। कृत्रिम दिलों के बाजार में एक ब्रांड का नाम जार्विक-7 था। कुछ समय तक तो लोग इस दिल के अच्छे परिणामों को लेकर उtsaहित थे लेकिन कुछ और परीक्षणों के बाद यह कहा जाने लगा कि जार्विक -7 इंसानों को लंबी जिंदगी देने के बजाए उन्हें जल्दी मुक्ति का मार्ग दिखा रहा है। इसके बाद 1990 में दिल पर पाबंदी लगा दी गई। यहां ऊपर दो हथेलियों ने जार्विक-7 को थामा हुआ है।

दुसरे इंसान के स्वस्थ दिल को बीमार दिल की जगह लगाया जाए। 1967 में पहली बार ऐसी कोशिश की गई थी और मरीज़ 18 दिनों तक जिंदा भी रहा।
तब से अब तक काफी तकनीकी बदलाव हो गए हैं और कृत्रिम दिल इस्तेमाल करने की संभावनाएं भी खुल गई हैं। मानव अंगों के प्रत्यारोपण को लेकर नैतिक-अनैतिक की बहस के बीच 1969 में पहली बार एक मरीज को कृत्रिम दिल लगाया गया और वह तीन दिन तक जिंदा भी रहा। कुछ ही समय में कई कृत्रिम दिल बाज़ार में उपलब्ध हो गए। 1984 में तो एक मरीज कृत्रिम दिल के सहारे 620 दिन तक जिंदा रहा। परन्तु कुल मिलाकर अब तक कृत्रिम दिल को कम ही सफलता मिली है। फिर भी यह बात उल्लेखनीय है कि कृत्रिम दिलों ने एक तकनीक के रूप में नया मार्ग प्रशस्त किया है।