जेनेरिक यानी मूल नाम (Generic Name) से बेची जाने वाली दवाइयां। ये दवाइयां ब्रांडेड दवाओं की तुलना में जनौषधी दुकानों में लगभग एक-चौथाई कीमत पर उपलब्ध होती हैं और उनकी गुणवत्ता भी ब्रांडेड दवाओं से कम नहीं होती — यह बात अब अधिकाधिक लोगों को समझ में आने लगी है। लेकिन अब जेनेरिक दवाओं के उत्पादन के सम्बंध में मात्र एक बड़ा प्रश्न खड़ा हो गया है। इसके पहले कुछ बुनियादी चीजें समझ लेते हैं।  
जेनेरिक दवाइयां और गुणवत्ता
जेनेरिक दवा शब्द के दो अर्थ हैं। पहला अर्थ यह है कि ‘जेनेरिक दवा’ यानी किसी दवा के आविष्कार के बाद शोधकर्ता कंपनी को पेटेंट कानून के तहत उस दवा के लिए जो पेटेंट प्राप्त होता है, उस पेटेंट की अवधि समाप्त हो चुकी हो। ऐसी दवा अब जेनेरिक कहलाती है और अन्य कंपनियां शोधकर्ता कंपनी से अनुमति लिए बिना उसका उत्पादन कर सकती हैं। भारतीय बाज़ार में उपलब्ध 90 प्रतिशत से अधिक दवाइयां ऐसी ही जेनेरिक दवाएं हैं, अर्थात उनकी पेटेंट अवधि समाप्त हो चुकी है। “मैं जेनेरिक दवाइयां नहीं लिखता” ऐसा कहने वाले अधिकांश डॉक्टर भी जेनेरिक (पेटेंट-मुक्त) दवाइयां ही लिखते हैं।
जेनेरिक दवा का दूसरा अर्थ है कि दवा के पैकेट पर उसका मूल यानी जेनेरिक नाम लिखा हो। सभी चिकित्सा पुस्तकों और वैज्ञानिक साहित्य में दवाइयों के जेनेरिक नामों का ही उपयोग किया जाता है। लेकिन शोधकर्ता कंपनियां जब कोई नई दवा बनाती हैं तो उसे अपना एक व्यावसायिक नाम (ब्रांड-नेम) दे देती हैं। उदाहरण के लिए, पार्क-डेविस कंपनी ने 1985 में रक्त में बढ़े हुए कोलेस्ट्रॉल को कम करने वाली एटरवेस्टैटिन (Atorvastatin) नामक दवा की खोज की थी, जिसके लिए उसे 1986 से 2011 तक पेटेंट प्राप्त था। लेकिन इस अवधि में कंपनी ने इसे एटरवेस्टैटिन नाम से नहीं, बल्कि ‘लिपिटॉर’ (Lipitor) ब्रांड नाम से महंगे दामों पर बेचकर भारी मुनाफा कमाया। 2011 में पेटेंट समाप्त होने के बाद एटरवेस्टैटिन जेनेरिक बन गई और अन्य कंपनियों ने उसका उत्पादन शुरू कर दिया। लेकिन उन्होंने भी उसे जेनेरिक नाम से बेचने के बजाय अलग-अलग ब्रांड नामों से बेचा। इन्हें ‘ब्रांडेड-जेनेरिक’ कहा जाता है।
इस प्रकार, लगभग 900 जेनेरिक दवाइयों से बनी लगभग 60,000 ब्रांडेड-जेनेरिक दवाइयां भारत के बाज़ार में उपलब्ध हैं। अपना-अपना ब्रांड नाम डॉक्टरों के मन में बैठाने के लिए दवा कंपनियां भारी पैसा खर्च करती हैं और कई बार अनैतिक तरीके भी अपनाती हैं, ताकि डॉक्टर उनके ब्रांड की दवाएं लिखें। यह खर्च कंपनियों द्वारा दवाइयों की अधिक कीमत रखकर वसूला जाता है। इसके विपरीत, डॉक्टरों की शिक्षा जेनेरिक नामों के माध्यम से ही हुई होती है, इसलिए जेनेरिक नामों को डॉक्टरों के मन में बैठाने, याद रखवाने के लिए कंपनियों को अतिरिक्त पैसा खर्च नहीं करना पड़ता। यही कारण है कि जेनेरिक दवाएं अपेक्षाकृत काफी सस्ती होती हैं।
दवाइयां कैसे बनती हैं?
सभी दवाएं पहले पावडर के रूप में बनाई जाती हैं। बाद में उनसे गोलियां, कैप्सूल, इंजेक्शन, मलहम आदि विभिन्न ‘फॉर्म्युलेशन’ तैयार किए जाते हैं।
दवा कंपनियां कुछ दवा-पावडर स्वयं बनाती हैं, जबकि कुछ दवा-पावडर रासायनिक उद्योगों से खरीदे जाते हैं। लगभग 30 प्रतिशत दवा-पावडर चीन आदि देशों से आयात किए जाते हैं। अधिकांश छोटी और कई मंझोली दवा कंपनियां स्वयं पावडर नहीं बनातीं, बल्कि खुले बाज़ार से खरीदकर उनसे विभिन्न फॉर्म्युलेशन तैयार करती हैं। इसलिए भारत का अधिकांश दवा उद्योग ‘फॉर्म्युलेशन उद्योग’ है।
इन फॉर्म्युलेशन का निर्माण भी गुणवत्तापूर्ण तरीके से होना चाहिए। प्रत्येक दवा के गुणधर्म इंडियन फार्माकोपिया में निर्धारित मानकों के अनुरूप होने चाहिए। दवा की प्रत्येक खेप को निर्धारित परीक्षणों की कसौटी पर खरा उतरना होता है और निर्माता को अपने कारखाने की प्रयोगशाला में इसकी जांच करनी होती है।
उदाहरण के लिए, इंडियन फार्माकोपिया में यह निर्धारित है कि किसी गोली को पेट में टूटने और घुलने में कितना समय लगता है। उत्पादन कंपनी की कानूनी ज़िम्मेदारी होती है कि दवा इन मानकों पर खरी उतरे। यदि उत्पादन औषधि विज्ञान के अनुसार किया जाए तो छोटे कारखानों में भी यह सुनिश्चित करना संभव है। भारत के अधिकांश छोटे दवा उद्योग ऐसा करते हैं, वैसे इस क्षेत्र में भी कुछ अप्रामाणिक उद्योग मौजूद हैं।
राज्य सरकारों के खाद्य एवं औषधि प्रशासन (FDA) के निरीक्षकों का दायित्व है कि वे कारखानों का निरीक्षण करें और बाज़ार से नमूने लेकर उनकी जांच कराएं। यद्यपि यह व्यवस्था संसाधनों की कमी और भ्रष्टाचार से प्रभावित है, फिर भी 2024-25 में केंद्र सरकार द्वारा करवाई गई जांच में 1,16,323 नमूनों में से केवल 3104 (2.7 प्रतिशत) नमूने निम्न गुणवत्ता के पाए गए थे। आदर्श स्थिति में यह संख्या शून्य होनी चाहिए।
कुछ महीने पहले, एक सामाजिक संस्था द्वारा 22 आम दवाओं के 131 नमूनों की जांच प्रतिष्ठित प्रयोगशाला में कराई गई। जांच में पाया गया कि प्रसिद्ध ब्रांड नाम, कम प्रसिद्ध ब्रांड नाम और मात्र जेनेरिक नाम वाली दवाओं की गुणवत्ता में कोई अंतर नहीं था। (विस्तार से यहां देखें - https://meshindia.org/citizens-generic-vs-branded-drugs-project/).
अतिरिक्त मानदंड - जैविक तुल्यता
सरकार 384 ‘आवश्यक दवाइयों’ में से 140 दवाओं के लिए जेनेरिक कंपनियों की गोलियों पर जैविक तुल्यता यानी बायो-इक्विवेलेंस (Bio-equivalence) परीक्षण अनिवार्य करने की तैयारी कर रही है। किसी दवा की जैव-तुल्यता जांचने के लिए उसकी गोली स्वस्थ व्यक्ति को दी जाती है और निश्चित समयांतराल (जैसे 15 मिनट, आधा घंटा, एक घंटा आदि) के बाद उसके रक्त में दवा की मात्रा मापी जाती है। यदि शोधकर्ता कंपनी की गोली और जेनेरिक गोली की समान समयांतरालों पर रक्त में समान मात्रा पाई जाती है, तो जेनेरिक गोली को ‘जैविक-तुल्य’ माना जाता है। यह प्रश्न केवल गोलियों और कैप्सूलों पर लागू होता है; सिरप, इंजेक्शन, मलहम, ड्रॉप्स आदि पर नहीं। बड़ी शोधकर्ता कंपनियों का मत है कि केवल जैविक-तुल्य जेनेरिक गोलियां ही मूल दवा जितनी प्रभावी मानी जा सकती हैं। विकसित देशों ने इस सिद्धांत को स्वीकार किया है और वहां जैविक-तुल्यता परीक्षण पास करने के बाद ही जेनेरिक गोलियों को बिक्री की अनुमति मिलती है। भारत में भी लगभग 140 दवाओं के लिए इसे अनिवार्य बनाने की तैयारी चल रही है। लेकिन इसके सम्बंध में कई प्रश्न हैं।
1) क्या यह सभी दवाइयों के लिए आवश्यक है?: चंद ‘संवेदनशील’ दवाइयों के मामले में यकीनन रक्त में दवा की मात्रा का थोड़ा भी अंतर स्वीकार्य नहीं होता। ऐसी खास दवाइयों के लिए जैविक-तुल्यता परीक्षण आवश्यक होना चाहिए। लेकिन अन्य जेनेरिक दवाइयों के लिए ऐसा कोई ठोस वैज्ञानिक प्रमाण उपलब्ध नहीं है कि यदि वे जैविक-तुल्य न हों तो वे अप्रभावी हो जाती हैं। भारत में करोड़ों मरीज़ दशकों से ऐसी जेनेरिक गोलियां उपयोग कर रहे हैं जिनका जैविक-तुल्यता परीक्षण नहीं हुआ है, फिर भी ऐसे कोई प्रमाण नहीं मिले हैं कि वे असरहीन हैं।
2) अवैज्ञानिक मिश्रित दवाइयों का प्रश्न: भारतीय बाज़ार की लगभग 40 प्रतिशत ब्रांडेड-जेनेरिक दवाओं में दो या अधिक औषधियों का मिश्रण होता है। इनमें से अधिकांश मिश्रण वैज्ञानिक दृष्टि से उचित नहीं हैं। इनके लिए कोई मूलभूत मानक ही उपलब्ध नहीं हैं, इसलिए इनके लिए जैव-तुल्यता का प्रश्न ही नहीं उठता। सरकार को पहले ऐसी अवैज्ञानिक मिश्रित दवाइयों पर प्रतिबंध लगाना चाहिए।
3) तकनीकी और आर्थिक बोझ: यदि जैविक-तुल्यता को अनिवार्य किया गया तो प्रत्येक कंपनी को प्रत्येक जेनेरिक दवा के लिए स्वयं वह तकनीक विकसित करनी होगी जिससे उसकी गोली जैविक-तुल्य बन सके। ये तकनीकी विवरण व्यावसायिक गोपनीयता का हिस्सा होते हैं। यदि 140 दवाओं का औसतन 10-10 कंपनियां उत्पादन करती हैं, तो लगभग 1400 कारखानों को यह तकनीक अलग-अलग विकसित करनी होगी। इससे अत्यधिक खर्च होगा।
4) छोटे उद्योगों पर मंडराता संकट: प्रत्येक निर्माता को अपनी गोली के जैविक-तुल्य होने का प्रमाणपत्र प्राप्त करना होगा, जिस पर लगभग 20-60 लाख रुपये का खर्च आएगा। भारत में करीब 10,000 दवा उत्पादकों में से 2-3 हज़ार छोटी कंपनियां हैं। इनमें से कई इस खर्च को वहन नहीं कर पाएंगी और उत्पादन बंद करने को मजबूर हो जाएंगी। नतीजतन, सस्ती जेनेरिक दवाओं की उपलब्धता घटेगी और हज़ारों मज़दूर बेरोज़गार हो सकते हैं। विकसित देश यह खर्च वहन कर सकते हैं, लेकिन क्या भारत कर पाएगा?
5) मानव “गिनी पिग” का नैतिक प्रश्न: जैविक-तुल्यता परीक्षण के लिए स्वस्थ मनुष्यों का उपयोग किया जाता है। सामान्यतः आर्थिक रूप से कमज़ोर लोग पैसे लेकर इसमें भाग लेते हैं। यदि प्रत्येक कंपनी को अलग-अलग परीक्षण करना पड़े, तो बड़ी संख्या में मानव वालंटीयर्स का उपयोग करना होगा। 140 दवाओं और औसतन 10 कंपनियों के हिसाब से लगभग 1400 अलग-अलग मानव समूहों पर परीक्षण करने पड़ेंगे। यह गरीब लोगों का अतिरिक्त और नैतिक रूप से अनुचित उपयोग होगा।
विकल्प
अलबत्ता, यदि वास्तव में जैविक-तुल्यता का परीक्षण ज़रूरी हो, तो भी भारी खर्च और इतने बड़े पैमाने पर मानव परीक्षणों से बचा जा सकता है। इसके लिए सार्वजनिक क्षेत्र की किसी प्रयोगशाला में इन 140 दवाइयों को मूल दवाइयों के समकक्ष बनाने की तकनीक विकसित करके जैविक-तुल्यता परीक्षण संभव है। केवल एक मानव समूह पर्याप्त होगा, यानी कुल लगभग 140 समूह। इसके बाद सरकार यह तकनीक उचित मूल्य पर जेनेरिक कंपनियों को उपलब्ध करा सकती है। दवा नियामक तंत्र यह सुनिश्चित करे कि कंपनियां सरकार द्वारा दिए गए मानकों के अनुसार ही उत्पादन करें। यदि ऐसा किया जाए तो जनता को सस्ती जेनेरिक दवाएं मिलती रहेंगी और छोटी जेनेरिक कंपनियां भी टिक सकेंगी। अन्यथा बड़ी दवा कंपनियों का प्रभुत्व और मज़बूत हो जाएगा। (स्रोत फीचर्स)