लंबे समय से वैज्ञानिक यह जानने की जद्दोजहद में लगे हैं कि जीवन की उत्पत्ति कहां और कैसे हुई? हालांकि शुरुआती जीवन समुद्र में उत्पन्न होने के प्रमाण तो मिले हैं, लेकिन यह अस्पष्ट था कि कैसे। लिहाज़ा, डसेलडॉर्फ विश्वविद्यालय के भूवैज्ञानिक विलियम मार्टिन और उनकी टीम की नई खोज महत्वपूर्ण है। 
जीवन की उत्पत्ति सम्बंधी शोध में सबसे बड़ी समस्या फॉस्फेट (PO43-) नाम का एक यौगिक रहा है, जो फॉस्फोरस और ऑक्सीजन के संयोग से बनता है। फॉस्फेट किसी जीव के लिए उतना ही ज़रूरी है जितना कि हमारे लिए सांस लेना। यह डीएनए या आरएनए की इकाइयों को आपस में जोड़ता है और शरीर को ऊर्जा देने वाले घटकों (ATP और ADP) का मुख्य आधार है। लेकिन फॉस्फेट की सबसे बड़ी दिक्कत है कि न तो ये पानी में आसानी से घुलता है और न ही आसानी से अभिक्रिया करता है। 
तो शोधकर्ताओं के सामने सबसे बड़ी पहेली यही थी कि फॉस्फेट जीवन की ज़रूरी क्रियाओं में कैसे शामिल हो गया, यहां तक कि डीएनए का आधार बन गया?  
गौरतलब है कि इस पहेली को सुलझाने का सुराग किसी भूविज्ञान प्रयोगशाला की बजाय सूक्ष्मजीव प्रयोगशालाओं में साल 2000 में मिला। वेनिस के समुद्र में एक अजीबोगरीब बैक्टीरिया - डीसल्फोटिग्नम फॉस्फिटोऑक्सिडेंस (Desulfotignum phosphitoxidans) - मिला। यह बैक्टीरिया फॉस्फाइट का ऑक्सीकरण करके फॉस्फेट में बदल देता था। और इस क्रिया के दौरान वह एडिनोसिन मोनोफॉस्फेट (AMP) नामक अणु में एक फॉस्फेट समूह को जोड़कर एडिनोसिन डाईफॉस्फेट (ADP) का निर्माण करता है जो उसके लिए ऊर्जा का स्रोत है।  
जीवन की उत्पत्ति के संदर्भ में यह खोज काफी महत्वपूर्ण है। आम तौर पर सभी जीव पहले से ऑक्सीकृत फॉस्फेट को एडिनोसिन ट्राय फॉस्फेट (ATP) नामक ऊर्जा प्रचुर अणु बनाने के लिए इस्तेमाल करते हैं, लेकिन यह बैक्टीरिया खुद ही फॉस्फाइट का ऑक्सीकरण करके फॉस्फेट में बदलता है। 
फिर 2023 में, वैज्ञानिकों ने इस बैक्टीरिया से इस अभिक्रिया के एंज़ाइम को अलग किया जो फॉस्फाइट से फॉस्फेट बनाने वाली प्रक्रिया की गति बढ़ाने में सहायक था।
इसी एंज़ाइम की खोज से विलियम मार्टिन को एक अनोखा विचार आया। उन्होंने सोचा कि सालों पहले जब पृथ्वी पर कोई जीन या एंज़ाइम नहीं थे तब उत्प्रेरक की भूमिका किसने निभाई होगी? इसी क्रम में मार्टिन और उनकी टीम ने अंदाज़ा लगाया कि युगों पहले समुद्री तल में मौजूद चट्टानों और खनिजों ने उत्प्रेरक की भूमिका निभाई होगी। 
समुद्र तल में हाइड्रोथर्मल वेंट्स (गर्म पानी के झरने) होते हैं। ये दरअसल समुद्र के पेंदे में दरारें होती हैं जहां से धरती में भूतापीय प्रक्रियाओं द्वारा गर्म खौलता पानी बाहर निकलता है और साथ में कुछ गैसों और खनिज पदार्थों को ऊपर ले आता है। 
एक और शोध में भूवैज्ञानिक केटी इवांस और उनकी टीम ने बताया कि इन संरचनाओं और आस-पास की चट्टानों में निकल और पैलेडियम जैसी धातुओं के महीन कण पाए जाते हैं, जो किसी रासायनिक अभिक्रिया का उत्प्रेरण कर सकते हैं। भूवैज्ञानिक मैट पासेक और उनकी टीम ने दर्शाया कि समुद्र तल की चट्टानों में फॉस्फाइट प्राकृतिक तौर पर पाया जाता है।
इन्हीं कड़ियों को जोड़ते हुए विलियम मार्टिन ने लैब में प्रयोग किए। नतीजे चौंकाने वाले थे। उन्होंने पाया कि पैलेडियम धातु ने ठीक वैसे ही उत्प्रेरण का काम किया जैसा वेनिस के बैक्टीरिया में दिखा था। उन्होंने देखा कि पैलेडियम की उपस्थिति में फॉस्फाइट बहुत आसानी से फॉस्फेट में बदल गया। इस फॉस्फेट ने डीएनए में पाई जाने वाली शर्करा (राइबोस और ग्लूकोस) को आपस में जोड़ दिया। प्रयोग कोशिकाओं में सामान्यत: पाई जाने वाली परिस्थितियों में किया गया था।  
हालांकि, भूवैज्ञानिक पासेक का मानना है कि फॉस्फाइट का ऑक्सीकरण तो ज़रूरी है लेकिन उनके अनुसार इस प्रक्रिया में कुछ अन्य अणुओं की भी भूमिका थी। दूसरी ओर, मार्टिन का तर्क है कि युगों पहले की बेजान और ऑक्सीजन-रहित पृथ्वी पर ऐसे अणुओं का होना संभव ही नहीं था। अलबत्ता, दोनों वैज्ञानिक इससे सहमत हैं कि समुद्र के पेंदे में पैलेडियम धातु ने ही जीवन की उत्पत्ति वाली क्रियाओं में उत्प्रेरक का काम किया होगा। 
आगे भी वैज्ञानिक जीवन की उत्पत्ति सम्बंधी प्रयोग करते रहेंगे, उनके आधार पर तर्क-वितर्क भी चलते रहेंगे। फिलहाल, जीवन की उत्पत्ति का कोई सटीक प्रमाण या क्रियाविधि तो सामने नहीं है। खोजबीन चलती रहेगी लेकिन इस नई खोज ने शुरुआती जीवन और समुद्री गहराइयों का नाता और भी मज़बूत कर दिया है। (स्रोत फीचर्स)