खाने-पीने की चीज़ें लगातार महंगी हो रही हैं। इसकी वजह सिर्फ युद्ध, आपूर्ति शृंखला की समस्याएं या जलवायु परिवर्तन नहीं है, बल्कि एक कम नुमाया वजह भी है - कृषि सम्बंधी वैज्ञानिक शोध और नवाचारों में लगातार घटता निवेश। यदि सरकारें जल्द ही कृषि शोध में निवेश को कम से कम दुगना नहीं करतीं, तो आने वाले वर्षों में भोजन और अधिक महंगा, उपलब्धता में कमी और पर्यावरण को अधिक नुकसान हो सकता है। यह बात नेचर पत्रिका में प्रकाशित एक आलेख में कही गई है, जिसे फिलिप जी. पारडे, कोनी चैन-कांग, गर्ट-जान स्टैड्स, युआन चाई, जूलियन एम. एलस्टन, जान ग्रेलिंग और हर्नान मुनोज़ ने संयुक्त रूप से तैयार किया है। यहां इसी अध्ययन का सार प्रस्तुत है।

पिछले 40 सालों में दुनिया की आबादी लगभग 80 प्रतिशत बढ़ी है, यानी करीब 3.5 अरब लोग बढ़े हैं। इसके बावजूद खाद्य उत्पादन मांग के साथ बना रहा, क्योंकि खेती में विज्ञान ने बड़ी भूमिका निभाई। बेहतर बीज, उर्वरक, मशीनें, कीट नियंत्रण, सिंचाई और भंडारण तकनीकों ने किसानों को उसी ज़मीन से ज़्यादा खाद्यान्न उगाने में मदद की। ये सुधार अपने-आप नहीं हुए, बल्कि सरकारी और निजी क्षेत्रों द्वारा लंबे समय तक किए गए कृषि अनुसंधान और विकास में निवेश का नतीजा थे।
हालांकि, उपरोक्त दल द्वारा 1980 से 2021 तक 150 देशों में किए गए एक वैश्विक अध्ययन से एक चिंताजनक बात सामने आई है। आबादी बढ़ने और लोगों की आय बढ़ने के कारण भोजन की मांग लगातार बढ़ रही है, लेकिन कृषि से जुड़े वैज्ञानिक शोध में निवेश की रफ्तार धीमी पड़ती जा रही है - और कई देशों में तो यह घट भी रहा है। यह कमी पहले ही भोजन की बढ़ती कीमतों में योगदान कर रही है, और लंबे समय में इसके असर और भी गंभीर हो सकते हैं।
कृषि शोध की ज़रूरत को समझने के लिए हमें अब तक उसकी उपलब्धियों को देखना होगा। 1980 से 2021 के बीच दुनिया में कृषि से होने वाला उत्पादन लगभग 137 प्रतिशत बढ़ा, जबकि कृषि भूमि में बहुत ज़्यादा बढ़ोतरी नहीं हुई। इसमें किसानों की मेहनत के साथ लंबे समय का वैज्ञानिक शोध महत्वपूर्ण था। रोग-रोधी गेहूं, जल्दी पकने वाला चावल, ज़्यादा दुधारू पशु और पानी की बचत करने वाली खेती - ये सभी दशकों के शोध से संभव हुए। इतिहास बताता है कि कृषि शोध में लगाया गया हर रुपया समाज को करीब दस रुपए से ज़्यादा का फायदा देता है, जिससे किसान और उपभोक्ता दोनों लाभान्वित होते हैं।
लेकिन खेती में नई तकनीक लाना आसान नहीं होता। एक नई फसल किस्म विकसित करने में 6 से 10 साल लग जाते हैं, और फिर उसे किसानों तक पहुंचने में और समय लगता है। इसलिए आज कृषि शोध में किए गए फैसले आने वाले कई दशकों तक खाद्य कीमतों, उपलब्धता और पर्यावरणीय टिकाऊपन को प्रभावित करेंगे।
वैश्विक निवेश की रफ्तार धीमी
रिपोर्ट बताती है कि 1980 से 2015 के बीच कृषि से जुड़े शोध पर दुनिया भर में खर्च हर साल औसतन 2.7 प्रतिशत बढ़ रहा था। लेकिन 2015 से 2021 के बीच यह बढ़ोतरी घटकर सिर्फ 1.9 प्रतिशत रह गई, यानी करीब एक-तिहाई की गिरावट। अध्ययन में शामिल आधे से ज़्यादा देशों में शोध पर खर्च की रफ्तार धीमी पड़ी, और लगभग एक-तिहाई देशों में तो खर्च घट ही गया।
यह सुस्ती सभी तरह के देशों में दिख रही है। जो अमीर देश कभी कृषि शोध में सबसे आगे थे, वहीं सबसे ज़्यादा गिरावट नज़र आ रही है। 2015 से पहले जहां उनका खर्च सालाना करीब दो प्रतिशत बढ़ता था, अब वह वृद्धि एक प्रतिशत तक सिमट गई है। इनमें से लगभग हर चौथा देश कृषि शोध पर सरकारी खर्च कम कर चुका है।
मध्यम आय वाले देश - जैसे चीन, भारत और ब्राज़ील - अब भी निवेश बढ़ा रहे हैं, लेकिन वहां भी गति पहले जैसी तेज़ नहीं रही। सबसे खराब हाल गरीब देशों के हैं: 2015 के बाद से इनमें से आधे से ज़्यादा देशों ने कृषि शोध पर वास्तविक खर्च घटा दिया है, जबकि इन्हीं देशों में खाद्य सुरक्षा की समस्या सबसे गंभीर है।
शोध में निवेश की कमी बहुत गलत समय पर हो रही है; जलवायु परिवर्तन खेती को और मुश्किल बना रहा है। ऊपर से मिट्टी और पानी जैसे प्राकृतिक संसाधन भी कमज़ोर हो रहे हैं। ऐसे में कृषि को बचाने के लिए कम नहीं, बल्कि ज़्यादा शोध और नवाचार की ज़रूरत है।
फंडिंग का बदलता संतुलन
यह अध्ययन बताता है कि कृषि शोध में लिए पैसा लगाने वाले बदल रहे हैं। वर्ष 1980 में दुनिया भर में खेती से जुड़े शोध पर होने वाले कुल खर्च का लगभग दो-तिहाई हिस्सा सरकारों, विश्वविद्यालयों और सरकारी शोध संस्थानों से आता था। लेकिन 2021 तक निजी कंपनियां लगभग आधा खर्च उठाने लगी हैं।
यह बदलाव व्यापक आर्थिक और सामाजिक परिवर्तनों का नतीजा है। जैसे-जैसे देश विकसित होते हैं, खेती में तकनीक की भूमिका बढ़ती है और श्रम पर निर्भरता कम होती जाती है। इसके अलावा लोगों के खान-पान की आदतें भी बदल रही हैं - प्रोसेस्ड और पैक्ड खाद्य पदार्थ ज़्यादा खाए जा रहे हैं। इससे खाद्य प्रसंस्करण, भंडारण, परिवहन और खुदरा तकनीकों में निजी निवेश बढ़ा है - खासकर अमीर देशों में।
निजी निवेश ज़रूरी और उपयोगी है, लेकिन वह सरकारी शोध की जगह नहीं ले सकता। कंपनियां आम तौर पर ऐसे शोध में पैसा लगाती हैं जिससे सीधा मुनाफा हो - जैसे बीज, रसायन, मशीनें या खाद्य उत्पाद। वहीं सरकार द्वारा वित्तपोषित शोध मिट्टी की सेहत सुधारने, पानी के टिकाऊ इस्तेमाल, पौधों की जेनेटिक्स को समझने व पर्यावरणीय असर को घटाने जैसे विषयों पर काम करता है। इनका सामाजिक लाभ बड़ा होता है लेकिन व्यापारिक मुनाफा कम।
अगर सरकारी और सार्वजनिक शोध पर खर्च घटता है, तो निजी नवाचार भी कमज़ोर पड़ता है, क्योंकि निजी क्षेत्र भी उन्हीं बुनियादी खोजों पर निर्भर करता है जो सरकारी फंडिंग से होती हैं। यानी सरकार द्वारा वित्तपोषित शोध में कटौती पूरी नवाचार प्रणाली की रफ्तार को धीमा कर देती है।
मध्यम-आय देशों का उद्भव और बढ़ती असमानता
1980 में जहां अमीर देश वैश्विक कृषि शोध खर्च पर हावी थे, वहीं 2021 तक मध्यम-आय देशों ने उन्हें पीछे छोड़ दिया। आज दुनिया के कुल कृषि शोध खर्च में लगभग आधा हिस्सा एशिया-प्रशांत क्षेत्र का है।
चीन, भारत और ब्राज़ील अब कृषि शोध में सबसे अधिक निवेश करने वाले देशों में शामिल हैं। यह उनकी बड़ी आबादी और खाद्य सुरक्षा को लेकर गंभीर चिंताओं को दर्शाता है। कभी इस क्षेत्र का निर्विवाद नेता रहा अमेरिका अब न सिर्फ चीन से पीछे है, बल्कि सरकारी कृषि शोध खर्च में भारत से भी कम निवेश करता है।
लेकिन इसके साथ-साथ एक और चिंता बढ़ रही है - खर्च का अत्यधिक केंद्रीकरण। 2021 में कुल वैश्विक कृषि शोध खर्च में से लगभग 70 प्रतिशत दुनिया के सिर्फ शीर्ष 10 देशों से आता था, जबकि सबसे नीचे के 50 देशों का साझा हिस्सा सिर्फ 0.5 प्रतिशत था। यह अंतर खास तौर पर उप-सहारा अफ्रीका जैसे गरीब क्षेत्रों के लिए चिंताजनक है, जहां 2050 तक 80 करोड़ से अधिक लोग जुड़ने की उम्मीद है, लेकिन जो अभी वैश्विक कृषि शोध खर्च का केवल 3 प्रतिशत योगदान देता है।
पहले, गरीब देशों को अमीर देशों में हुए शोध से अंतर्राष्ट्रीय सहयोग और तकनीक हस्तांतरण के ज़रिए फायदा मिलता था (CGIAR जैसे कार्यक्रम)। लेकिन अब जब मध्यम-आय देश शोध खर्च पर हावी हो गए हैं, तो वे दुनिया के सबसे गरीब क्षेत्रों के लिए अंतर्राष्ट्रीय नवाचार में पर्याप्त निवेश नहीं कर रहे। उदाहरण के लिए, एशिया की खेती के लिए बनी तकनीकें अक्सर अफ्रीका की जलवायु, मिट्टी, कीट-रक्षा, और बाज़ारों में सीधे काम नहीं आतीं।
भोजन की बढ़ती कीमतें
इस विश्लेषण का एक अहम निष्कर्ष यह है कि कृषि उत्पादन बढ़ने की रफ्तार स्वाभाविक रूप से धीमी पड़ रही है। पहले उत्पादन बढ़ाना अपेक्षाकृत आसान था, लेकिन अब जैविक और भौतिक सीमाएं आड़े आ रही हैं, जिससे फसलों की पैदावार बहुत धीरे-धीरे बढ़ती है। उदाहरण के लिए, 1960 के दशक में गेहूं की वैश्विक पैदावार को 50 प्रतिशत बढ़ाने में लगभग 12 साल लगे थे, जबकि हाल के दशकों में इतना ही इज़ाफा करने में 30 साल से भी अधिक समय लग रहा है।
ऊपर से जलवायु परिवर्तन और पर्यावरणीय क्षरण खेती को और मुश्किल बना रहे हैं। मौजूदा उत्पादन स्तर को बनाए रखने के लिए ही अब पहले से अधिक निवेश की ज़रूरत पड़ रही है। यदि यह निवेश नहीं हुआ, तो पैदावार थम सकती है या घट सकती है, जिससे भोजन महंगा होगा और ज़मीन, पानी व प्राकृतिक तंत्रों पर दबाव बढ़ेगा।
चूंकि कृषि शोध की प्रभाविता दिखने में अक्सर दशकों लगते हैं, इसलिए आज निवेश घटने से तत्काल संकट तो नहीं आएगा। लेकिन यह आने वाले वर्षों के लिए ज़मीन तैयार कर देगा। नतीजतन भूख, कुपोषण, गरीबी, पर्यावरण क्षति और सामाजिक अशांति जैसी समस्याएं गंभीर रूप ले सकती हैं।
क्या किया जाए?
शोधकर्ताओं का कहना है कि कृषि शोध में घटते निवेश को तुरंत पलटना ज़रूरी है। अगले पांच साल में कृषि-खाद्य शोध पर वैश्विक खर्च दुगना किया जाना चाहिए और इसके बाद हर साल लगभग 3 प्रतिशत की बढ़ोतरी होती रहनी चाहिए।
साथ ही, सरकारी और निजी शोध को बेहतर तालमेल के साथ आगे बढ़ना चाहिए। सरकारें ऐसे शोध में निवेश करें जिनमें जोखिम ज़्यादा हो लेकिन समाज को बड़ा लाभ मिले, जबकि कंपनियां वैज्ञानिक खोजों को उपयोगी उत्पादों और सेवाओं में बदलने पर ध्यान दें।
राजनीतिक बदलावों से कम प्रभावित नए वित्तीय मॉडल लंबे समय के शोध को टिकाऊ समर्थन दे सकते हैं। साथ ही, सरकारों को नियामक प्रणालियों को आधुनिक बनाना होगा ताकि जीन-एडिटिंग जैसी नई तकनीकों का सुरक्षित और ज़िम्मेदार इस्तेमाल किया जा सके।
नई तकनीकें मदद को मौजूद हैं, लेकिन लगातार निवेश और मज़बूत राजनीतिक इच्छाशक्ति के बिना इन्हें किसानों और उपभोक्ताओं तक पहुंचाना मुश्किल होगा।
यदि सरकारें पिछले सफल अनुभवों पर भरोसा करके कृषि में निवेश कम करती रहीं, तो नतीजा होगा महंगा भोजन, बढ़ती असमानता जिसका सर्वाधिक असर सबसे गरीब लोगों पर पड़ेगा। शोधकर्ताओं का संदेश साफ है: भविष्य में सस्ता और टिकाऊ भोजन इस बात पर निर्भर है कि हम आज निवेश के कैसे फैसले लेते हैं। (स्रोत फीचर्स)