यह तो जानी-मानी बात है कि पौधे हवा की कार्बन डाईऑक्साइड और ज़मीन से सोखे गए पानी का उपयोग करके अपना भोजन स्वयं बना लेते हैं। इस क्रिया को अंजाम देने के लिए उनके पास क्लोरोफिल होता है और इस प्रक्रिया के लिए ऊर्जा वे सूर्य की रोशनी से प्राप्त करते हैं। इसलिए पेड़-पौधों को स्वपोषी (ऑटोट्रॉफ) कहते हैं। दूसरी ओर सारे जंतु अपना भोजन प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से पौधों से प्राप्त करते हैं। इन्हें हम परपोषी (हेटरोट्रॉफ) कहते हैं। इस मोटी-मोटी परिभाषा के बाद थोड़ा बारीकी पर चलें।
क्या आपने कभी परपोषी पौधों के बारे में सुना है? चौंकिए मत, बहुत थोड़े से ही सही मगर परजीवी पौधे होते हैं। अमरबेल जैसे पौधे परजीवी हैं। ये किसी अन्य पौधे पर लिपटते हैं और अपनी विशेष चूषक जड़ें (होस्टोरियम) उसमें घुसा देते हैं और उसके अंदर से भोजन व पानी प्राप्त करते रहते हैं। मेज़बान पौधा स्वपोषी होता है। अलबत्ता किसी अन्य पौधे का सहारा लेने वाले सभी पौधों को परजीवी नहीं कहा जा सकता। हो सकता है कि वे सिर्फ सहारा लेते हों, भोजन-पानी नहीं। कई सारी लताएं, पेड़ों पर उगने वाले ऑर्किड्स इस श्रेणी में आते हैं।
अब परपोषी पौधों के एक अनोखे समूह की चर्चा करते हैं। ऊपर हमने देखा कि परजीवी पौधे किसी अन्य स्वपोषी पौधे से भोजन चुराते हैं। लेकिन पौधों का एक समूह है जो फफूंद से भोजन-पानी की चोरी करते हैं। अब दिलचस्प बात यह है कि फफूंद स्वयं अपना भोजन नहीं बनातीं; उनमें क्लोरोफिल का अभाव जो होता है। फफूंद यानी कवक किसी अन्य स्वपोषी पौधे से भोजन की चोरी करती हैं (हालांकि वे बदले में कुछ देती भी हैं)। और अब हम जिन पौधों की बात करने जा रहे हैं वे फफूंद से भोजन चुरा लेते हैं – यानी चोर के घर में चोरी!
इन पौधों को कवक-परपोषी या मायकोहेटरोट्रॉफ कहते हैं। दुनिया भर में पाए जाने वाले ये पौधे अपनी जड़ों को मिट्टी में मौजूद कवक के धागों (कवक-तंतु यानी हाइफा) के साथ जोड़ते हैं।
पेड़-पौधों और कवकों का सम्बंध काफी प्राचीन और पेचीदा है। मायकोराइज़ा के रूप में ये कवक पेड़-पौधों से कार्बन प्राप्त करते हैं और बदले में पोषक तत्व भी प्रदान करते हैं। यानी कवकों को परजीवी कहने की बजाय सहजीवी कहना बेहतर है। मायकोराइज़ा दरअसल एक सम्बंध का नाम है – फफूंद-तंतुओं और पेड़-पौधों की जड़ों के बीच परस्पर लाभदायक सम्बंध। इसमें फफूंद का दूर-दूर तक फैला नेटवर्क पौधों को पानी और खनिज लवण सोखने में मदद करता है, वहीं पौधे उन्हें प्रकाश संश्लेषण से बनी शर्करा उपलब्ध कराते हैं। यह सहजीवी सम्बंध लगभग 90 प्रतिशत थलीय पेड़-पौधों में पाया जाता है।
दरअसल, फफूंद तंतुओं (हायफा) का एक जाल बनाती हैं जो मिट्टी में दूर-दूर तक फैला होता है। इसकी मदद से वे पानी के अलावा नाइट्रोजन व फॉस्फोरस जैसे अनिवार्य पोषक खनिज प्राप्त करती हैं। इनमें कुछ पानी तथा खनिज पौधे की जड़ों को मिल जाते हैं। बदले में पौधा शर्करा प्रदान कर देता है। माना जाता है कि पौधों की जड़ों का भूमिगत कवकों से सम्बंध पौधों के ज़मीन पर पहुंचने और बसने में निर्णायक रहा है।
लेकिन हम जिन कवक-परपोषियों की बात कर रहे हैं, वे प्रकाश संश्लेषण के लिए सूर्य के प्रकाश और क्लोरोफिल पर निर्भर रहने की बजाय कवक से कुछ कार्बनिक पदार्थ चुरा लेते हैं। यानी यह सम्बंध सहजीवन का नहीं बल्कि परजीविता का है।
ऐसा अनुमान है कि 33,000 से ज़्यादा पादप प्रजातियां अंकुरण और प्रारंभिक विकास के दौरान कवक-परपोषी होती हैं। इनमें कुछ क्लब मॉस, फर्न, लिवरवर्ट और सभी ऑर्किड शामिल हैं। वनस्पति शास्त्रियों ने लगभग 600 ऐसी पादप प्रजातियों की भी पहचान की है जो जीवन भर कवक-परपोषी होती हैं। इनमें से लगभग आधी तो ऑर्किड प्रजातियां हैं। 10 वनस्पति कुलों की करीब 400 प्रजातियों में क्लोरोफिल पूरी तरह समाप्त हो चुका है और ये फफूंद के ज़रिए अन्य हरे पेड़-पौधों से कार्बनिक पदार्थ प्राप्त करती हैं। इसके अलावा लगभग 20,000 प्रजातियां आंशिक रूप से कवक-परपोषी हैं, जो प्रकाश संश्लेषण भी करती हैं और कवक से भी कार्बनिक पदार्थ प्राप्त करती हैं। ये अधिकांशत: अंकुरण के कुछ समय बाद तक ही फफूंदों पर निर्भर होती हैं।
वैसे ऑर्किड्स में फफूंद मायकोराइज़ा पर निर्भरता विवाद का विषय रही है। हालांकि सारे ऑर्किड्स अपने शुरुआती विकास के दौरान कार्बनिक पदार्थ प्राप्त करने के लिए फफूंदों पर निर्भर रहते हैं लेकिन कई ऑर्किड्स वयस्क अवस्था में इस निर्भरता से मुक्त हो जाते हैं। रेडियोकार्बन ट्रेसिंग के आधार पर किए गए प्रयोगों से पता चला है कि एक हरे ऑर्किड गुडयेरा रेपेन्स (Goodyera repens) का अपने फफूंद साथी (Ceratobasidium cornigerum) से सम्बंध परपोषिता का नहीं बल्कि सहजीविता का होता है।
कवक-परपोषी पौधे: इकॉलॉजी
कवक-परपोषिता एक प्रकार का परजीवी पोषण तरीका है जहां कुछ पौधे अपना भोजन प्रकाश संश्लेषण की क्रिया की बजाय फफूंद से सीधे कार्बनिक पदार्थों के रूप में प्राप्त कर लेते हैं। यह सम्बंध कई वनस्पति समूहों में पाया गया है जो या तो केवल बीजों के अंकुरण के समय या जीवन भर के लिए होता है। क्लोरोफिल के अभाव वाले गैर प्रकाश संश्लेषी पौधों में यह पूर्णकालिक होता है और ये पीले या क्रीम रंग के होते हैं।
ये पौधे उन जगहों पर अक्सर पाए जाते हैं जहां पोषक तत्वों की उपलब्धता कम होती है या घने जंगलों की तलहटी में पाए जाते हैं जहां प्रकाश नहीं पहुंचता।
कवक-परपोषी वस्तुत: जड़ फफूंद जाल (नेटवर्क) को धोखा देते हैं और उनसे होने वाले कार्बन प्रवाह पर निर्भर रहते हैं जो सामान्यत: अन्य पौधों में परस्पर लेन-देन वाला होता है। कुल मिलाकर ये पौधे चोर हैं जो फफूंदों से सिर्फ लेते ही हैं, बदले में कुछ देते नहीं। किसी स्थान पर इनका पाया जाना प्रकाश की कमी और मिट्टी में पोषक पदार्थ के अभाव से सम्बंधित होता है। लगता है, मिट्टी में फॉस्फोरस की कमी भी कवक-परपोषिता को बढ़ावा देती है।
आखिर क्यों?
जीव वैज्ञानिकों को यह सवाल सताता रहा है कि आखिर स्वपोषी पौधों में यह कवक-परपोषिता क्योंकर विकसित हुई होगी। वैकासिक जीव विज्ञानियों ने इस बात के प्रमाण पाए हैं कि जैव विकास की प्रक्रिया में पूर्ण कवक-परपोषिता कम से कम 50 से ज़्यादा बार स्वतंत्र रूप से विकसित हुई है। हो सकता है यह घने जंगलों, जहां प्रकाश कम होता है, में जीवित रहने के लिए एक अनुकूलन हो। लेकिन वैसे अभी कोई निश्चित कारण सामने नहीं आया है।
कोबे विश्वविद्यालय के वनस्पति शास्त्री केन्जू सुएत्सुगु कहते हैं कि जवाब न मिलने का कारण शायद यह है कि कवक-परपोषी पौधों पर बहुत कम शोध किया गया है।
दरअसल, कवक-परपोषी वनस्पतियों पर सुएत्सुगु के अद्भुत वैज्ञानिक कार्य के चलते आज उन्हें इस विषय का प्रमुख विद्वान माना जाता है। पिछले वर्षों में उन्होंने इन पौधों के अध्ययन के अभाव की पूर्ति करने का भरसक प्रयास किया है।
बीजों का बिखराव और परागण
एक सवाल यह भी था कि ऐसे पौधों में परागण कैसे होता है और इनके बीज दूर-दूर तक बिखरते कैसे हैं। ऐसा माना जाता था कि कई कवक-परपोषी अपने धूल के कणों के आकार के बीजों को बिखेरने के लिए हवा पर निर्भर करते हैं। लेकिन इसके विरुद्ध तर्क यह था कि यह थोड़ा जोखिम भरा होगा क्योंकि एक तो इन पौधों का कद छोटा है और घने जंगलों में हवाएं भी कमज़ोर होती हैं।
सुएत्सुगु ने तीन प्रजातियों - योनिया अमाजिएंसिस, फेसेलैंथस ट्यूबिफ्लोरस और मोनोट्रॉपेस्ट्रम ह्यूमाइल (Yoania amagiensis, Phacellanthus tubiflorus, Montropastrum humile) - का गति-संचालित कैमरों से 190 घंटे तक अवलोकन किया। पता चला कि गुफा झींगुर और ज़मीनी गुबरैले इन पौधों के बीजों से लदे फल खा गए। प्रयोगशाला में किए गए प्रयोगों में पाया गया कि इन पौधों के सैकड़ों बीज गुफा झींगुरों के पेट से गुज़रने के बाद भी जीवनक्षम बने रहे; जबकि ज़मीनी भृंगों द्वारा निगले जाने पर एक भी बीज जीवित नहीं बचा। पता चला कि एक काष्ठ आवरण बीजों को झींगुर के पाचक रस से तो बचाता है, लेकिन भृंग के चबाने से नहीं।
सुएत्सुगु ने अन्य अप्रत्याशित परागणकर्ताओं और बीज बिखेरने वालों की पहचान की है। कैमरा ट्रैप में एक क्लबियोना मकड़ी को आर्किड नियोटिएन्थे क्यूकुलेटा (Neottianthe cucullata) का रस चूसते और अपने जबड़ों में परागकणों को चिपकाए फूलों के बीच घूमते हुए कैद किया गया। उनके समूह ने पहली बार दिखाया कि गुफा झींगुर और ऊंट झींगुर तथा चींटियां परागण और बीज बिखेरने दोनों का काम करते हैं। वुडलाउस (Porcellio scaber) एम. ह्यूमाइल के फल खाकर मल के साथ जीवनक्षम बीज उत्सर्जित कर सकते हैं। देखा जाए, तो ये वुडलाइस जीवजगत में सबसे नन्हे बीज प्रकीर्णक हैं।
वैसे कवक-परपोषी पौधों में स्व-परागण भी होता है। जैसे एक आर्किड, स्टिग्मैटोडैक्टाइलस सिकोकिएनस (Stigmatodactylus sikokianus) स्व-परागण और पर-परागण दोनों आज़माता है। इसका फूल शुरू में तो खुला होता है, जिससे परागणकर्ताओं को मौका मिलता है। लेकिन कुछ ही दिन बाद, वर्तिकाग्र, यानी मादा अंग, संकुचित हो जाता है, जिससे एक छोटा, उंगली जैसा उपांग फूल के नर अंग (परागकोश) के संपर्क में आ जाता है और परागकण अंडाशय तक पहुंच जाते हैं। (स्रोत फीचर्स)

