अंदल नारायणन, जोसेफ सेम्यूल एवं सुपूर्णा सिन्हा                                                                                 [Hindi PDF, 196 kB]

क्या आप हवा को देख सकते हैं?हमारी त्वरित प्रतिक्रिया अक्सर यही होती है कि “नहीं, हवा पारदर्शी होती है।” ऐसा लगता है कि इस झटकेदार जवाब से मामला सुलझ गया, परन्तु जैसा कि हम आगे देखेंगे, किस्सा यहीं खत्म नहीं होता। इस सवाल का जवाब देने की बजाय अगर हम इसका पीछा करें और खोज जारी रखें तो हमें कहीं ज़्यादा सीखने-समझने को मिलेगा।

हाल ही में, एक बेथनी स्कूल जो कि प्लानो, टेक्सास, यूएसए में स्थित है, के छात्र नवीन ने इस सवाल को उठाया। उसने इंटरनेट पर डॉ. सी.वी. रमन द्वारा दिए गए एक लेक्चर के बारे में पढ़ा जिसमें हवा को देखने के लिए एक प्रयोग का वर्णन किया गया था। उस व्याख्यान का एक अंश इस प्रकार है, “यह एक ऐसा प्रयोग है जो विज्ञान के हर विद्यार्थी को करना चाहिए। आप एक काँच की बोतल, एक फ्लास्क व एक कॉर्क लें और उसमें से धूल को पूरी तरह निकाल दें। फिर उसमें से प्रकाश की किरण को गुज़ारें - सूर्य प्रकाश या कोई और प्रकाश भी हो सकता है परन्तु यह सुनिश्चित करें कि प्रकाश की किरण (बोतल के अन्दर) हवा में से होकर गुज़रे। आप हवा को देख पाएँगे। हवा इतनी भी पारदर्शी, रंगहीन गैस नहीं है, यह अदृश्य नहीं है। आप इस तरह प्रकाश के बिखराव से इसे दृश्य बना सकते हैं। यह इतना आसान प्रयोग है कि विज्ञान के हर विद्यार्थी को अपने जीवन काल में एक बार तो इसे ज़रूर करके देखना चाहिए।” सी.वी. रमन का यह व्याख्यान प्रेरणास्पद है। हालाँकि इसका शीर्षक है, ‘आसमान नीला क्यों है?,’ परन्तु यह व्याख्यान दरअसल विज्ञान की भावना व प्रक्रियाओं के बारे में है। अत्यन्त मशीनी सवाल-जवाब के ढाँचों की बजाय, जो कि हमारी परीक्षा प्रणाली का अन्तरंग हिस्सा बन गए हैं, विज्ञान की असली भावना सवाल पूछने व जवाबों पर सवाल उठाने में बसी है, न कि केवल सवालों का जवाब देने में।

यह लेख नवीन द्वारा पूछे गए सवाल और उसका जवाब देने की हमारी कोशिश का परिणाम है। ‘क्या आप हवा को देख सकते हैं?’ इस सवाल का दूसरा जवाब यह हो सकता है, “हाँ, जब भी आप नीले आसमान को देखते हैं तो आप हवा को देख रहे होते हैं।” प्रकाश वायुमण्डल से टकराकर हमारी आँखों तक पहुँचता है। चूँकि नीले प्रकाश में बिखराव ज़्यादा होता है इसलिए आसमान नीला दिखाई देता है। वस्तुत: इस बात का ज़िक्र रमन ने अपने लेक्चर में किया था। चांद पर वायुमण्डल नहीं है इसी वजह से उसका आसमान काला नज़र आता है, जिसे टीवी द्वारा प्रसारित चांद पर उतरने वाले वीडियो में हम देख सकते हैं। और ऐसे में तो नवीन द्वारा किए गए सवाल का जवाब, ‘हाँ’ में उतना ही मान्य लगता है। आखिर सच क्या है? “क्या हवा पारदर्शी है या फिर हम उसे देख सकते हैं?”

हम एक थोड़ा अलग सवाल लेते हैं। “क्या हम एक ऐसे प्रयोग की कल्पना कर सकते हैं जिसमें हम सभी प्रयोगशाला में हवा को देख पाएँ?” हम तेज़ गर्मी के दिनों में टार की सड़क पर हवा को झिलमिलाते हुए देखते हैं। ऐसा ही दृश्य जलते हुए स्टोव के ऊपर भी दिखाई देता है। पर हम यहाँ जो देख रहे हैं वास्तव में, वह हवा नहीं बल्कि गर्मी के चलते अपवर्तनांक (refractive index) में हो रहे परिवर्तन हैं। पर सवाल अब भी बना हुआ है, “क्या आप ऐसे प्रयोग सोच सकते हैं जिनसे हम हवा को देख पाएँ?”

हवा के लिए संघर्ष!
हमें इस सवाल को नए सिरे से सोचना था। हमारे हवा को देखने की कोशिश का वर्णन कुछ इस प्रकार है (शायद यह कहना चाहिए ‘हवा के लिए संघर्ष!’)। ‘हवा को देखना’ इसका मतलब क्या है? हवा कई चीज़ों से मिलकर बनी है: परमाणु रूप में गैसें जैसे नाइट्रोजन और ऑक्सीजन, साथ ही धूल और पराग कण। कणों का आकार 10-6 मीटर से लेकर 10-9 मीटर तक होता है। ये सच है कि परमाणु इतने छोटे होते हैं कि उन्हें देखना मुश्किल है। पर वे प्रकाश की किरणों के साथ अन्तर्क्रिया करते हैं और इन किरणों को बिखेरते भी हैं। बड़े कण छोटे कणों की तुलना में प्रकाश को ज़्यादा अच्छी तरह से बिखेरते हैं। अगर हम प्रकाश किरणों को गैस परमाणुओंें से टकराते हुए देखना चाहते हैं तो हम इस प्रभाव को प्रकाश के धूल कणों से टकराकर बिखरने के प्रभाव से कैसे अलग करेंगे? यह बहुत ही कठिन था और अन्तत: हम हवा के परमाणविक तत्व को देखने में असफल रहे। हालाँकि, इस प्रक्रिया में हमने प्रकाश की पदार्थ के साथ अन्तर्क्रिया के बारे में बहुत कुछ सीखा। उम्मीद है कि पाठकों को हमारे इन प्रयत्नों से फायदा पहुँचेगा और वे इस विषय को आगे समझने की कोशिश करेंगे।

रमन का प्रयोग
हमारा अन्दाज़ा यह है कि रमन ने एक दर्पण से सूरज के प्रकाश को अँधेरे कमरे में प्रतिबिम्बित किया होगा। दर्पण को हेलियोस्टेट पर मढ़कर सूरज को ट्रेक किया होगा। जो किरणें अँधेरे कमरे में आ रही थीं उनको लेंस के द्वारा समानान्तर करके उन्हें एक अँधेरे चेम्बर में भेजा होगा। इस चेम्बर में किरणों के आने-जाने और वैज्ञानिक द्वारा प्रयोग को देखने के लिए स्थान रखा जाता है। थोड़ी देर बाद जब आँखों को अँधेरे की आदत पड़ जाती है तब वे एक हल्की-सी किरण देखने में भी सक्षम हो जाती हैं। हमारा अनुमान है कि प्रयोग कुछ इसी तरह से किया गया होगा। रमन ने फ्लास्क या बोतल को धूल रहित करके चेम्बर में रखा होगा। आप खुद ही अनुमान लगा सकते हैं कि इस प्रयोग में काफी धैर्य और कुशलता की ज़रूरत है।

क्या हमें हवा में लकीर दिखी?
इस प्रयोग में खोज के लिए हमने एक अँधेरे कमरे में लेज़र प्रकाश का इस्तेमाल किया। अँधेरे कमरे में जब प्रकाश के प्रवेश को एकदम रोक दिया गया और आँखें अँधेरे की अभ्यस्त हो गईं तो हमें लेज़र प्रकाश किरण के बिखराव की वजह से ट्रैक दिखाई दिया। प्रकाश के कुछ चमकीले बिन्दु भी दिखाई देते हैं जो प्रकाश किरणों के धूल के बड़े कणों की टक्कर से होने वाले बिखराव का परिणाम हैं, परन्तु प्रकाश का पथ एकदम स्पष्ट था। क्या यही वह प्रभाव है जिसके बारे में रमन ने बात की थी (रमन प्रभाव के साथ भ्रमित न हों)? जब हम एकदम खाली फ्लास्क लेंगे तो आशा करेंगे कि यह प्रभाव नहीं दिखेगा। इसका परीक्षण करने के लिए हमने RbNe  की वाष्पनली ली (यह हमारी प्रयोगशाला में उपलब्ध थी) जो 10-7 मिली बार के प्रेशर पर थी। फिर हरे लेज़र के प्रकाश को उसमें से गुज़ारा। हमें नली के अन्दर कोई ट्रैक नहीं नज़र आया परन्तु नली के बाहर ट्रैक नज़र आ रहा था। हालाँकि इस प्रयोग से इस सम्भावना को नकारा नहीं जा सकता कि RbNe  वाष्पनली के बाहर का ट्रैक धूल के अत्यन्त महीन कणों से बिखराव के कारण हो जो हवा में तो मौजूद हैं परन्तु वाष्पनली के अन्दर नहीं हैं।
किरणों की विपरीत दिशा में देखने पर ट्रैक एकदम स्पष्ट नज़र आ रहा था। परन्तु किरणों की दिशा में देखने पर वह दृश्य नहीं था। इसका यह भी अर्थ निकल सकता है कि इस प्रयोग में भी पथ हवा में मौजूद अत्यन्त महीन धूल कणों की वजह से दिख रहा है, न कि हवा में मौजूद गैसीय अणुओं के कारण। धूल के कणों की वजह से हो रहे प्रकाश के बिखराव का असर खत्म करने के लिए, हमें एक ऐसे चैम्बर में ट्रैक देखने का प्रयास करना होगा जिसमें धूल-रहित हवा हो। हमें समझ में नहीं आया कि यह कैसे किया जाए, इसलिए हमने ऐसा प्रयोग पानी के साथ करके देखा।

पानी में ट्रैक कैसेे देखा?
हमने काँच का एक बरतन लिया और उसे मिथेनोल से साफ करके उसमें दो बार आसवित पानी डाला। हमने देखा कि ट्रैक लाल लेज़र (10 mw) और हरे लेज़र (5 mw) दोनों में अच्छी तरह नज़र आ रहा है। उसमें कहीं भी चमकते हुए बिन्दु नज़र नहीं आ रहे थे जिससे एक बात साफ थी कि पानी पूरी तरह धूल-मुक्त है। इस प्रकार यह ट्रैक सम्भवतया पानी के अणुओं से होने वाले बिखराव का परिणाम है, न कि पानी में उपस्थित धूल कणों से होने वाले बिखराव का। पानी में हवा से ठीक उल्टा प्रभाव था। हवा में तो किरणों की दिशा में देखने पर ट्रैक न के जैसा ही दिखता था, परन्तु हमने पाया कि पानी में दिखने वाले प्रकाश का बिखराव कहीं ज़्यादा समदिक (isotropic) था और रैले स्केटरिंग के समीकरण के अनुरूप ही बिखराव की तीव्रता प्रदर्शित कर रहा था। किसी अकेले और छोटे di व्यास के कण से λ तरंग लम्बाई और Iο तीव्रता वाले अध्रुवित प्रकाश की किरण से बिखरने वाले प्रकाश की तीव्रता I हो तब:

I=Iο[(1+cos2θ) /2R2 ](2∏/λ)4[(n2-1)/(n2+2)]2(d/2)6

जहाँ R कण तक की दूरी है, θ बिखरने का कोण (scattering angle) है, n कण का अपवर्तनांक है। यह सूत्र केवल d/λ << 1 के लिए ही मान्य है। सारांश यह है कि इस समीकरण में आगे (θ=0) और पीछे (θ=0), दोनों दिशाओं में प्रकाश के बिखराव की तीव्रता समान है। बड़े कणों के लिए यह समीकरण मौजूँ नहीं है और आगे की ही दिशा में बिखराव कहीं ज़्यादा होता है।

सारांश यह है कि हवा में हमने देखा कि प्रकाश का अत्यधिक बिखराव आगे की ओर होता है, और इसलिए सम्भवत: यह प्रकाश के धूल-कणों से टकराकर बिखरने की वजह से है, हवा के आणविक हिस्सों के कारण नहीं। इसके विपरीत पानी में हमने पानी के अणुओं से बिखरने वाले प्रकाश का ट्रैक देखा।

सैद्धान्तिक अनुमान: सैद्धान्तिक रूप से अनुमान लगाया हुआ ‘मीन फ्री पाथ’ है L= 3∏Nλ/ 2(2∏)4(n-1)2 जहाँ N परमाणु कणों का घनत्व है, λ तरंगलम्बाई है और n वायु का अपवर्तनांक है। लाल रंग के प्रकाश के लिए नाइट्रोजन अणुओं का बिखराव या विवर्तन Nf 180 कि.मी. के करीब है। ऐसे में एक कमरे में किए गए साधारण प्रयोग के दौरान जिसमें कुछेक मीटर का ही रास्ता मिल सकता है, हवा के अणुओं द्वारा प्रकाश के बिखराव को देख पाना सम्भव नहीं लगता। इसके विपरीत पानी के अणुओं से होने वाले लाल प्रकाश के बिखराव के मीन फ्री पाथ के लिए हमारा आकलन 1 मी. लम्बाई का है। इस प्रकार पानी के भीतर लेज़र प्रकाश के बिखराव या विवर्तन से बनने वाला ट्रैक हमारे प्रयोग की दृश्य सीमा के भीतर है। और प्रयोग में दरअसल, हमने ऐसा ही पाया यानी कि पानी के अणुओं से होने वाले प्रकाश के बिखराव को हम देख पाए। हवा में बिखराव के प्रभाव को बढ़ाने का एक तरीका हो सकता है कि हवा के दबाव को बढ़ाकर या उसे तरल कर वायु के घनत्व को बढ़ाएँ। ऐसे में यह आसानी से हो सकने वाला साधारण प्रयोग नहीं हो सकता जिसे करने हम निकले थे।

यह जानते हुए कि ‘मीन फ्री पाथ’ बड़ा है, एक मीटर की दूरी में, प्रकाश किरण के लगभग कितने फोटॉन बिखरेंगे? 5 मिलीवॉट क्षमता का लेज़र जिसका बिखरने का पॉवर केवल 2.5x10-8 वॉट है, उससे एक सेकण्ड में 1011 फोटॉन बिखरेंगे। हमारी आँख प्रकाश की अत्यन्त कम तीव्रता को देखने की भी अभ्यस्त हो जाती है, और कुछेक फोटॉन भी देख पाती है। क्या इसी तरीके से रमन ने ‘हवा को देखा था’?
हम पाठकों के विचार और अनुमान आमंत्रित कर रहे हैं कि रमन ने अपना प्रयोग किस तरह किया होगा और उन्होंने असल में क्या देखा।


अंदल नारायणन: रमन शोध संस्थान, बैंगलूरु की लेज़र कूलिंग प्रयोगशाला में वैज्ञानिक।
जोसेफ सेम्यूल: रमन शोध संस्थान, बैंगलूरु में वैज्ञानिक।
सुपूर्णा सिन्हा : रमन रिसर्च इंस्टीट्यूट, बैंगलूरु में थियोरेटिकल कंडेंस्ड मैटर फिज़िसिस्ट हैं।
अँग्रेज़ी से प्राथमिक अनुवाद: मालविका उपाध्याय
मूल लेख ‘रेज़ोनेंस’ पत्रिका के अंक, जून 2007, खण्ड 12 में प्रकाशित हुआ था।