लेखक :  डेविड ग्रिबल
अनुवाद: श्रीकान्त आप्टे

पुस्तकांश
गलतियाँ करने से बचना सम्भव नहीं, परन्तु जहाँ बच्चों का असफल होना तय है उन स्थितियों में बच्चों को ढकेलने से बचना सम्भव है। और जब वे असफल हो जाएँ तो उससे जुड़ी शर्मिन्दगी को कम करना या खत्म करना सम्भव है। जब ‘लिब एड’ पत्रिका ने स्कूल में होने वाले अनुभवों के बारे में समरहिल के बच्चों से बात की तब उनमें से एक ने ज़ोर देकर कहा कि समरहिल में गलतियों को बुरा नहीं माना जाता।
स्कूलों को प्रयास करना चाहिए कि बच्चे खुद पता लगाएँ कि वे कौन-सा काम अच्छे से कर सकते हैं और वे उन्हें करने का आनन्द उठाएँ, परन्तु प्रयास ये भी होना चाहिए कि बच्चे खुद पता करें कि वे कौन-से काम हैं जिन्हें करते हुए वे मज़ा तो कर पाते हैं लेकिन वे उस काम में दक्ष नहीं हैं।
मेरी कक्षा के अधिकांश बच्चे खासा समय कहानियाँ लिखने में बिताया करते थे। किस पर लिखना है इसका पता अक्सर उन्हें होता था, मैंने पाया कि कोई अगर कोई उन्हे विचार बताए तो वह मात्र विचार नहीं होकर विचारों का एक पुलन्दा होता था जो खारिज कर दिया जाता था। मैं अगर सुझाऊँ कि ‘पिंजरे में कैद खरगोश की अनुभूतियाँ’ या ‘बहुत सवेरे जागने’ या ‘किसी से उधार ली हुई वस्तु के गुम जाने’ या ‘भूत की कहानी’ लिखो तो बच्चा अचानक बोल पड़ता कि मैं ऐसे आदमी की कहानी लिखूँगा जिसका खाना बनते समय एकदम बिगड़ जाए।

बच्चों को यह मालूम होना चाहिए
शुरुआती दिनों में, कुछ भी पढ़ाने (या अन्य लोग मुझसे जो पढ़ाए जाने की उम्मीद करते थे) से पहले यह जान लेना कि बच्चा पहले से क्या-क्या जानता है, इस बात का महत्व मुझे पता ही नहीं था। यह मुझे तब समझ में आया जब मैंने मेरे समूह के बच्चों को सोलहवीं सदी में यूरोप के लोगों द्वारा दुनिया की खोज की बातें सुनाते हुए कुछ समय बिताया। हम ब्रिक्सहम गए और वहाँ ड्रेक के जहाज़ की प्रतिकृति देखी, मैंने उन्हें पुस्तकों के अंश पढ़कर सुनाए और हमने कोलम्बस और अटलांटिक महासागर की हैरतअँगेज़ यात्राओं के बारे में बातें कीं। और तब मैंने पाया कि समूह में 10 साल उम्र के बहुत-से बच्चों को पता ही नहीं था कि अटलांटिक महासागर कहाँ है। हम सब वयस्क मानकर चलते हैं कि बहुत-सी जानकारी ऐसी है जो सबको मालूम होती ही है, होनी ही चाहिए। हम यह भूल जाते हैं कि बहुत-सी बातें ऐसी हैं जिनसे अब तक बच्चों का आमना-सामना ही नहीं हुआ - इसलिए पहली बार कुछ आज़माने की वजह से होने वाली गलतियाँ स्वाभाविक हैं। इसे हम आसानी से समझ सकते हैं जब सार्वजनिक शौचालय में अपने आपको गलती से तालाबन्द कर लेने वाले या नापसन्द खाने की वस्तु की माँग करने वाले बच्चों या प्लेट जमाने में मदद करने की कोशिश में जब बच्चों से प्लेट गिरकर टूट जाएँ तब नाराज़ माँ-बाप बच्चों को मूर्ख या नालायक कह देते हैं। बच्चे जब समझदार और बोलने-समझने लायक हो जाते हैं तो इसे मानना या स्वीकारना और भी कठिन हो जाता है।

मेरी नासमझियाँ
सीखना चाहे किसी दूर की वस्तु के बारे में हो पर इसकी शुरुआत वहीं से होती है जहाँ आप होते हैं। यदि आप कार्डिफ में हैं तो इस बात को जानने का कोई खास मतलब नहीं कि लन्दन से कोलचेस्टर कैसे जाया जाता है।
दूसरी भूल जो मैं अक्सर किया करता था कि बच्चे अगर कोई भी समझदारी भरा काम करना चाहते तो मैं उन्हें रोक देता। इसे पहली बार मैंने तब जाना जब एक बच्ची ने मुझसे चित्र बनाने के लिए बाहर जाकर फूल लाने की इजाज़त माँगी। “नहीं,” मैंने कहा। हालाँकि अब मैं समझ नहीं पाता कि आखिर मैंने ‘नहीं’ क्यों कहा। अगले सप्ताह मैंने देखा कि मैंने ही पूरी कक्षा को चित्र बनाने के लिए बाहर जाकर फूल ढूँढ कर लाने को कहा।

मुझे याद नहीं कि मैंने किसे कक्षा के बाहर जाने से रोका था परन्तु मुझे याद है कि पीटर निकल्सन, जो आजकल डॉक्यूमेंट्री फिल्में बनाता है, की छोटी-सी खोज में मैंने दखल अन्दाज़ी की थी। मैं कक्षा में कई डिब्बे और नलियाँ ले गया था ताकि हर छात्र एक डिब्बे से दूसरे डिब्बे में ‘साइफन’ के ज़रिए पानी पहुँचाने की क्रिया को जान सके, और फिर काफी दिनों तक अलग-अलग समस्याएँ सुलझाने में वे मज़े से व्यस्त रहे। फिर पीटर को छोड़कर सभी की रुचि इसमें खत्म हो गई, बस पीटर बार-बार वही प्रयोग करना चाहता था। मैंने सम्भवत: उसे वह खेल खेलने से मना किया और सभी उपकरण कक्षा से हटा दिए।
आज मैं चकित हो जाता हूँ कि उसकी रुचि का प्रयोग करने से उसे मैंने क्यों रोका। मैं उसकी रुचि के काम में उसके साथ शामिल क्यों न हो सका? स्पष्टत:, मैंने सोचा होगा कि वह समय बर्बाद कर रहा है, परन्तु मैंने उसके दिमाग में क्या चल रहा है यह जानने की चिन्ता ही नहीं की। यह एक अवसर था जो खो गया।

और मुझे दो लड़कियों की याद है जो हमेशा ही साथ मिलकर नाटक करना चाहती थीं। वे एक अन्य कमरे में चली जातीं और थोड़ी देर बार उन्होंने जो रिहर्सल की होती उसे देखने मुझे बुलाती थीं। जो होता वह अक्सर बाज़ार जाने, प्रेस करने, पिकनिक पर जाने या बच्चे को सुलाने जैसा कोई घरेलू सीन होता, बिना किसी ‘प्लॉट’ का, मैंने सोचा कि वे यदि नाटक करते हुए ही समय बिताना चाहती हैं तो वह कुछ अधिक रुचिकर होना चाहिए - निश्चित रूप से, उनके लिए अधिक रुचिकर नहीं क्योंकि वे पहले से ही रुचिपूर्ण काम में मग्न थीं परन्तु ऐसा जो मेरे लिए अधिक रुचिकर हो। मुझे लगा कि वे काम के समय खेल रही हैं और मैंने उन्हें भी रोक दिया।

आज जब मैं पीछे मुड़कर देखता हूँ तो उन्हें अपना काम जारी रखने की इजाज़त देने के कम-से-कम दो कारण मुझे नज़र आते हैं: पहला तो यही कि जब वे बहुत छोटे थे तब शायद उन्हें सही ढंग का नाटक खेलने का अवसर न मिला हो, और दूसरा कारण कि उन्हें कोई काम ऐसा मिल गया था जिसे वे पूरी एकाग्रता से कुछ समय तक कर सकते थे, जो कक्षा में कभी-कभार ही हो सकता था।
विज्ञान के एक प्रयोग को भी मैंने रोका था, परन्तु इस मामले में मेरे पास तर्कसंगत कारण थे। मैंने बच्चों को बैटरियाँ और बल्ब को अलग-अलग तरीकों से जोड़ने को कहा, यह देखने के लिए कि इसका परिणाम क्या होता है। कुछ बच्चों ने देखा कि पर्याप्त बैटरियों को समान्तर क्रम में जोड़ने पर बल्ब उड़ाए यानी फ्यूज़ किए जा सकते हैं। यह मनोरंजक लेकिन महँगा प्रयोग था। मुझे अच्छा लगता यदि बच्चे यह प्रयोग जारी रख पाते परन्तु बल्ब कम पड़ गए।

बच्चों के साथ ‘हम’ हुआ मै
विज्ञान पढ़ाते हुए सबसे अच्छा समय वह था जब मैं पढ़ा रहा था और पीछे की लाइन के बच्चों को पेंसिल हिलाकर भ्रम उत्पन्न करने में मेरी पढ़ाई से ज़्यादा मज़ा आ रहा था। वे पेंसिल को एक सिरे पर ढीला पकड़ते और उसे हल्के से ऊपर-नीचे नचाते जिससे पेंसिल मुड़ी हुई नज़र आती।

मैंने पढ़ाना रोककर हरेक को मुड़ती पेंसिल देखने को कहा। हरेक को उसमें मज़ा आ रहा था और हम सब एक सचमुच के वैज्ञानिक अनुभव से रू-ब- डिग्री थे। हम में से कोई नहीं जानता था कि आखिर पेंसिल मुड़ती हुई क्यों नज़र आती है, इसलिए हमने कई सम्भावित परिकल्पनाओं पर विचार किया। (मैं उन शिक्षकों को सख्त नापसन्द करता हूँ जो ‘हम’ कहते हैं मगर वास्तविकता में उनका तात्पर्य स्वयं उनसे होता है, परन्तु इस प्रयोग में सच में हम सब साथ-साथ थे)। एक सम्भावित कारण था कि हाथ ऊपर-नीचे हो रहा था, दूसरा यह कि हमारी दो आँखे अलग-अलग छवियाँ देखती हैं और तीसरा सम्भावित कारण था कि शायद पेंसिल वास्तव में मुड़ जाती है।

फिर इन अवधारणाओं की जाँच के लिए उन लोगों ने कुछ प्रयोग किए और वे सभी परिकल्पनाएँ खारिज़ कर दी गईं। अन्त में किसी ने एक नई अवधारणा प्रस्तुत की जो विश्वास करने लायक थी पर इसकी जाँच के लिए हमें एक सिने-कैमरे की ज़रूरत थी जो हमारे पास नहीं था। इस आखिरी अवधारणा, जो मेरे द्वारा नहीं दी गई थी, के अनुसार हमारी आँख में पेंसिल की विभिन्न स्थितियों की छवि कुछ समय तक बनी रहती है, इसलिए आपको वैसा ही वक्र मिलता है जैसे किसी पिन बोर्ड पर धागे को अलग-अलग स्थितियों में लपेटते जाने पर मिलेगा।
यह काम, जो एक दिन से कुछ अधिक समय तक चला, का महत्वपूर्ण पहलू यह था कि समस्या का हल मुझे पता नहीं था और न ही मैं वह व्यक्ति था जिसने इसके हल को खोजा।

अबूझ पहेलियाँ और कहानियाँ
‘शीघ्र-लेखन’ जैसी गतिविधियाँ मुझे अच्छी लगती थीं जिसमें दो मिनट में किसी दिए गए विषय पर जितना ज़्यादा लिख सकते थे, लिखना होता था, और आपके चाहने पर उस लिखे हुए को पढ़ा भी जाता था जो अक्सर मनोरंजक मगर अर्थहीन होता था। जो उनके भीतर छुपे लेखक को बाहर लाता था और मेरा ख्याल है कि इसमें हरेक को मज़ा आता था। जिनका कोई उत्तर न हो ऐसी असम्भव पहेलियाँ जैसे कि ‘सूअर ब्लेकबोर्ड क्यों नहीं खाते हैं’ या ‘मंगलवार और पैराशूट के बीच का अन्तर है’ भी मुझे पसन्द थी। पन्द्रह से बीस बच्चों का समूह इनके ढेरों मज़ेदार उत्तर खोजता था।
एक खेल और था ‘एज़ मेनी एज़ पॉसिबल’ जो लगभग वैसा ही था जैसा ‘नेम्स, प्लेसेस, एनिमल्स’ होता है, फर्क बस इतना था कि इसमें ‘कॉलम्स’ के शीर्षक ‘वस्तुएँ जो माचिस में समाएँ,’ ‘दादाजी की घड़ी छुपाने के लिए जगहें,’ ‘जो आपको पागल कहे उसे सुनाने लायक बातें’ जैसे होते हैं। मेरा ख्याल है बच्चों को इन गतिविधियों में भी मज़ा आता था।

और मुझे बच्चों की लिखी कहानियाँ और कविताएँ भी पसन्द थी। एक उपलब्धि जिसे मैं सबसे महत्वपूर्ण मानता हूँ वह थी ‘दी बोरिंग बुक’। इस किताब में बच्चों के वे सारे काम शामिल थे जो उन्होंने सबसे अधिक बोरियत भरा लिखने के प्रयास में लिखा था। उन सभी रचनाओं में से ‘दी फ्रन्ट पेज ऑफ माय एक्सरसाइस बुक’ सर्वाधिक बोर रचना थी जिसे बामुश्किल मैं केवल डेढ़ पेज पढ़ पाया और उसके बाद उसे छोड़ दिया। ‘आउट फॉर ए पिकनिक’ और ‘ए पेपर हैंकी’ छोटी भी थी और बोर भी सो चल गईं।

नाटक खेलने से लेकर गढ़ने तक
नाटक और समरकैम्प दोनों सालाना महत्वपूर्ण अवसर होते थे।
नाटकों में जूनियर हाईस्कूल के सभी बच्चे, जो संख्या में लगभग चालीस-पचास के लगभग होते थे, भाग लेते थे और उन नाटकों की रूपरेखा मेरी बनाई होती थी पर जैसे-जैसे साल बीते वे नाटक अधिकाधिक बच्चों की योजनाओं पर आधारित होने लगे जिनमें संवाद लिखित न होकर तत्कालिक हुआ करते थे। गीतों में कुछ शब्द बच्चों के और कुछ मेरे होते थे, संगीत अधिकतर मेरा ही होता था ओर वे गीत इस तरह लिखे जाते थे कि कुछ खास बच्चे उन्हें गा सकें।

मैं अपने समूह के साथ ठीक-ठाक ढंग से अभ्यास कर पाता था, परन्तु छोटे बच्चे अत्यन्त उत्तेजित हो जाते और मुझे समझ में नहीं आता कि उन्हें कैसे सम्भालूँ। उनके साथ रिहर्सल करते वक्त अक्सर उनके शिक्षकों को मेरी मदद के लिए आना पड़ता था।

मैं नहीं जानता कि नाटकों का इतना महत्व क्यों है और बच्चे नाटकों को इतना क्यों चाहते हैं, इसके बावजूद मैंने खुद नाटकों और अभिनय को सदैव पसन्द किया। मैं जानता हँू कि छोटे बच्चों का सर्वश्रेष्ठ काम जो मैंने देखा है वह तभी होता है जब वे तात्क्षणिक रूप में बिना किसी तैयारी के अभिनय करते हैं। किशोर वय बच्चे रटे रटाए संवादों और स्क्रिप्ट के साथ अद्भुत अभिनय करने में सक्षम होते हैं, अपनी लाइनों को अक्सर बिना किसी उत्साह और बेहतर समझ के दोहराते नज़र आते हैं। नाटकों के कोर्स कई बातें सीखने का अवसर प्रदान करते हैं और इनमें अभिनय करना तो अपने आप में सम्पूर्ण अवसर है। स्कूल में होने वाले नाटक शैक्षिक अभ्यास न होकर कलात्मक रचनाएँ होती हैं। मेरे द्वारा निर्देशित किए जा रहे नाटक के लिए बच्चे जब सीनरी बना रहे थे तब मैंने बर्नी फोरेस्टर नामक पॉटर, जो उस समय अलेर पार्क में कला शिक्षक था, उससे एक बड़े काम की बात सीखी। उसने अनिवार्य कला कक्षाएँ चलाने से इन्कार कर दिया, पर जब भी वह उपलब्ध होता तब कक्षाएँ बच्चों से भरी रहती थीं। एक शाम मैं बच्चे जो सीनरी बना रहे थे, उसे देखने गया। जब मैं वहाँ था तब एक बच्चे ने बर्नी से पूछा कि क्या मैं यह छत सुनहरे रंग से रंग दूँ। मैं खुद को राय देने से शायद ही रोक पाता, परन्तु बर्नी ने कहा, “करके देखो कि कैसी दिखती है।”

उनके अपने निर्णय
पीछे रहकर बच्चों की निर्णय क्षमता में यकीन करने की योग्यता की कदर करना मैंने सीखा।
मैंने स्वयं प्रयास किया कि किसी बच्चे को अपमानित न करूँ। पर मैं हर बार इसमें सफल नहीं रहा। फ्रेंच पढ़ाते समय जब मैंने कुछ खेल खिलाए तो कम सक्षम बच्चे एकदम से पहचान में आ गए। जब मैं जूनियर स्कूल में सामान्य विषय पढ़ाता था तब मैं इस बात को छुपा नहीं पाया कि औरों की तुलना में कुछ छात्र बेहतर थे। उनमें से कुछ के लिए यह ठीक वही स्थिति रही होगी जिससे मैं फिज़िकल एज्यूकेशन कक्षा के छात्र के रूप में गुज़र चुका था।
स्कूल में पढ़ाई के दौरान मैंने खुद को तृतीय श्रेणी के नागरिक के रूप में महसूस किया था, प्रथम श्रेणी में स्कूल के शिक्षक, दूसरी श्रेणी में शेष लड़के और मैं खुद तीसरी श्रेणी का नागरिक। मुझे नहीं लगता कि डार्टिंग्टन में किसी को यह अनुभव हुआ होगा। सर्दियों की एक देर शाम मैं मेरे बेटे नाथन को सीनियर क्लास से लाने पहुँचा क्योंकि उसके एक पैर पर प्लास्टर चढ़ा हुआ था। मैं खुले में इंतज़ार कर रहा था। वहाँ बोर्डिग हाउस और कला-कक्षा के बीच एक सँकरा रास्ता था। खिड़कियों से झाँकती कुछ रोशनी भर थी। कुछ उद्दण्ड-से नज़र आने वाले किशोर रास्ते के बीच खड़े होकर बातें कर रहे थे, तभी एक युवा लड़की कला-कक्षा से निकलकर बोर्डिंग हाउस की ओर चल पड़ी। मैं आश्चर्य में खड़ा सोच रहा कि किशोरों के उस समूह के पास लड़की के पहुँचने पर क्या होगा और लड़की के साहस की मन-ही-मन सराहना भी कर रहा था। वे सारे किशोर रास्ते से हट गए ताकि वह लड़की गुज़र सके।
मैंने कभी किसी से अपेक्षा नहीं की कि वो मेरे लिए रास्ता छोड़े।

बच्चों से जो सीखा
जेनिफर स्मिथ ने लिसेस्टर के काउंटस्थोरपे कॉलेज के पहले दो साल तक एलेर पार्क में पढ़ाया। बाद में साउथम्प्टन युनिवर्सिटी से एम.फिल. करने के लिए जो लेख लिखा उसमें कुछ बातों का ज़िक्र किया जो उन्होंने हमारे साथ रहते हुए सीखीं।
मैंने जाना कि बच्चों के साथ खुले और शान्तिपूर्ण ढंग से कैसे रहा जाता हैं।
मैंने बच्चों और बड़ों के बीच सहजता को समझा।
मैंने देखा कि बेहद बुरा बर्ताव करने वाले बच्चों के साथ बड़े लोग दृढ़ता, सहानुभूति और अच्छे से पेश आते हैं जिसमें बच्चों की निन्दा नहीं बल्कि उन्हें सहारा देना शामिल होता था।
मैंने बच्चों और बड़ों को संवाद करते, आनन्द दायी गतिविधियों को साथ-साथ करते, संगीत रचते, पतंग उड़ाते, नाव चलाते, कैम्प में साथ-साथ समय गुज़ारते देखा। मैंने उन्हें गम्भीर किस्म की गतिविधियों को साथ-साथ करते, पिन होल कैमरे से फोटो उतारते, मधुमख्खियों को पालते देखा जिसमें वे एक-दूसरे से सीखते थे।
और मुझे भी ये सब करने का अवसर मिला
और मैंने बड़ों को पीछे रहकर बच्चों को उनके पसन्द के कामों को बिना रोकटोक के करने देते हुए देखा।
तमाम जटिलताओं के बावजूद बच्चे, बच्चों जैसे ही थे।
डार्टिंगटन में बच्चे मुझसे मेरी धारणाओं पर सीधे सवाल करते थे और मैं उनकी आलोचना को स्वीकारते हुए उनके सवालों के सही ढ़ंग से उत्तर देती थी।

मेरी पढ़ाने की शैली डार्टिंगटन में विकसित हुई, परन्तु सैण्डस में मैंने कुछ ही नई बातें सीखीं। वहाँ पढ़ाने के तरीके स्कूल के दर्शन के केन्द्र में नहीं थे। मैंने वहाँ जो सीखा उसका सम्बन्ध आपसी विश्वास और व्यक्तिगत सम्बन्धों से ज़्यादा था। वहाँ मैंने पढ़ाने के बारे में उस सच को जाना जिसकी मुझ पर गहरी छाप पड़ी। मेरा पुत्र नाथन, जो स्वयं एक पर्वतारोही था, ने स्कूल में कार्य करना शुरु  करने से पहले सैण्डस् के बच्चों के एक समूह को पर्वतारोहण के लिए हे-टॉर ले जाने का ज़िम्मा लिया। मैं उन्हें स्कूल की बस से वहाँ ले गया और देखा वे क्या करते हैं। वहाँ पहँुचकर उसने एक चट्टान पर चढ़कर धूल साफ की, सुरक्षा की व्यवस्थाएँ जुटाई, वापस नीचे उतर आया और फिर पूछा कि कौन पर्वतारोहण करना चाहता है। पता चला कि हर कोई ऊपर चढ़ना चाहता था। उसने एक का चयन किया, उसे बताया कि सुरक्षा के उपकरण कैसे पहनते हैं और पीछे हट गया। उसने किसी के पूछे बिना कोई सलाह नहीं दी। आश्चर्य की बात यह थी कि सलाह जल्दी ही माँगी गई और वो भी ज़ोरों से।
बहुत से शिक्षकों का विश्वास है कि बच्चों को कुछ काम करने देने से पहले उस काम को करने का सही ढंग उन्हें बताना चाहिए। बढ़ई का काम सीखने वाले सबसे पहले जोड़ बनाना सीखते हैं। अगर शिक्षक, बच्चे खुद मदद/सलाह माँगें तब तक इन्तज़ार करने का धैर्य रखें तो बच्चे कहीं ज़्यादा गम्भीरता और मज़े से सीखेंगे। अगर बच्चे कक्षा में कुछ ऐसा करने में मशगूल हैं जिसे वे किसी भी हालत में हासिल करना ही चाहते हैं, तो मुश्किल सामने आते ही मदद मांगने के लिए वे अत्यन्त तत्पर रहेंगे।


डेविड ग्रिबल: ‘इंटरनेशनल डेमोक्रेटिक एजुकेशन नेटवर्क’ संस्था के को-आर्डिनेटर और ‘लिव एड’ पत्रिका के सम्पादक हैं। शिक्षा में बदलाव से सम्बन्धित अनेक पुस्तके लिखी हैं। न्यू साउथ वेल्स, ऑस्ट्रेलिया में रहते हैं।
अँग्रेज़ी से अनुवाद: श्रीकान्त आप्टे: स्वतंत्र लेखक हैं। नाटक लेखन एवं चित्रकारी में रुचि। भोपाल में निवास।
मूल लेख डेविड ग्रिबल की पुस्तक ‘इस्केप फ्रॉम ट्रेडिसन’ से साभार।
सभी चित्र: बोस्की जैन: सिम्बायोसिस ग्राफिक्स एण्ड डिज़ाइन कॉलेज, पुणे से ग्राफिक्स डिज़ाइनिंग में स्नातक। मध्य भारत के गोंड क्षेत्र की आदिवासी कला के अध्ययन में विशेष रुचि। भोपाल में निवास।