सैम कीन                                                                                                                                                      [Hindi PDF, 357 kB]

आवर्त सारणी यानी चौखानों का वही ढाँचा जिसे आप अपनी रसायन शास्त्र की कक्षा में दीवार पर लटकता तका करते हैं - अपने में लगभग सारा संसार समेटे है। ब्रह्माण्ड के बुनियादी घटकों को करीने से सजाने का यह बहुत उपयोगी तरीका है। इसकी आड़ी व खड़ी कतारें सगरे जगत का एक उम्दा ट्रेलर प्रस्तुत करती हैं। और तो और, यह किस्सागोई का एक ऐसा पिटारा भी है जिसमें इन्सानियत की तमाम अच्छाइयों और बुराइयों के किस्से कैद हैं।
हमारी इस आवर्त सारणी में हर ज्ञात तत्व का ब्योरा मिलता है, जिनमें सबसे ऊपर, सबसे बाएँ स्थित सीधी-सादी हाइड्रोजन से लेकर नीचे पसरी मानव-निर्मित ऐसी असाध्य चीज़ें शामिल हैं जिन्हें फकत एक सेकण्ड के बहुत छोटे-से हिस्से के लिए ही अस्तित्व में लाया जा सकता है - यानी कि वे सारे रासायनिक पदार्थ, जो अकेले अपने दम पर या अन्य रसायनों से मिल-जुलकर, हमारे चारों ओर फैली हर वह चीज़ बनाते हैं जिसे हम देख या महसूस कर पाते हैं। अरे भई, हम तो खाते भी आवर्त सारणी हैं और हमारी हर साँस भी वहीं से आया करती है। यही नहीं, इस मुई पर लोग-बाग दाँव भी खूब लगाया करते हैं, और हारते भी अपना सब-कुछ हैं। यह ज़हर भी देती है, कहर भी ढाती है।

कुछ तत्व सभ्यता की शुरुआत से ही महत्वपूर्ण रहे आए हैं - जैसे सोना जो लगभग हर व्यक्ति का सोना खराब किए हुए है। जबकि समाज के निर्माण, पुनर्निर्माण में लोहे की अदाकारी खूब रही है। तत्वों के बड़े उपकारी उपयोग भी हुए हैं: प्राचीन मिस्री अपनी आँखों में एॅण्टीमनी का सुरमा लगाया करते थे, और रोमन लोग ढालने योग्य सीसे के पाइपों के ज़रिए अपने घरों में पानी लाया करते थे।

लेकिन, सिर्फ अपने आस-पास मिलने वाले तत्वों पर ही गुज़ारा करते रहना अक्लमन्दी की बात तो नहीं। हज़ारों-हज़ार बरसों से आइज़ॅक न्यूटन समेत कई कीमियागर असामान्य परिस्थितियों का सामना करते हुए भी नए-नए तत्व खोजते रहने व उनके गुणों का अध्ययन करने के उद्यम में लगे रहे। कई सदियों बाद, हेनिग ब्राण्ड नाम का शौकिया जर्मन कीमियागर सबसे पहला सफल व्यक्ति हुआ जब उसने मूत्र को उबालकर फॉस्फोरस की खोज की। लेकिन तत्वों सम्बन्धी हमारे ज्ञान की असली उड़ान तो 1700 के उत्तरार्द्ध में तब जाकर सम्भव हुई जब रसायनज्ञों ने तत्वों के पृथक्करण व शुद्धिकरण के नए-नए तरीके विकसित किए। उस समय की टेक्नोलॉजी के परिप्रेक्ष्य में इस तरह का अनुसंधान अविश्वसनीय रूप से अधुनातन था। इस सन्दर्भ में, सर हम्फ्री डेवी का नाम बड़े-बड़े खिलाड़ियों में शुमार होता है। सोडियम, मॅग्नीशियम, बोरॉन, क्लोरीन जैसे कई तत्व खोजकर उन्होंने खूब वाहवाही बटोरी।

इस तरह दर्ज़नों तत्वों की खोज के चलते समूचे वैज्ञानिक जगत के सामने नई चुनौतियाँ पेश हुईं। जैविकी की अपनी एक ‘जीवन-वृक्ष’ अवधारणा थी जिसके अनुसार नाना प्रकार की जैव-प्रजातियों की परस्पर-नातेदारी बनती थी। इसी तर्ज़ पर सवाल यह उठा कि क्या रासायनिक तत्वों की परस्पर-नातेदारी दर्शाने वाली भी ऐसी कोई नई-नवेली तरतीब कहीं थी क्या भला? या फिर वे स्वभाव से ही ऐसे अगड़म-बगड़म थे कि किसी चिर-परिचित गुण के आधार पर भी उन्हें वर्गीकृत किया जा सकता था?
इसका जवाब बेशक यही था कि हाँ, इन्हें तरतीब से जमाने की एक शैली है तो - आवर्त सारणी। अपने सहज रूप में तत्वों को व्यवस्थित जमाने की क्या तो तरकीब है यह भी- परमाणु संख्या के हिसाब से हरेक का अपना एक नियत खाँचा। और बात इतनी बस नहीं, बात यह भी कि एक-सरीखे गुण-धर्म वाले सगरे तत्व, एक ही कॉलम में समाए हैं।

लेकिन बात तो बात ठहरी। इतनी आगे बढ़ी, इतनी रोचक भई कि वैज्ञानिकों के हत्थे ऐसे ढेर नए-नए तत्व चढ़े जिनकी समरूपताएँ इस हिसाब थीं कि उन्नीसवीं सदी के मध्य में छह अलग-अलग बन्दे स्वतंत्र रूप से आवर्त सारणी सम्बम्धी अपनी-अपनी अवधारणा लेकर अवतरित हुए, जिनमें तत्वों की जमाहट उनकी अपनी प्रकृति व परस्पर-अभिक्रियाओं के आधार पर की गई थी।
अरे! तो फिर आज क्यों अधिकांश लोग उन छह में से केवल एक ही का नाम जानते हैं - द्मित्रि मेंदलीव - रूसी रसायनज्ञ जिसने अपनी आवर्त सारणी अपने प्रतिद्वन्द्वियों के मुकाबले कई-कई बरस बाद जाकर सन् 1869 में प्रकाशित की? इसका सुराग उसकी जीवनी में है। चौदह भाई-बहनों में सबसे छोटा, मेंदलीव, अपने कैशोर्य में ही अनाथ हो, एक दाढ़ीदार द्विपत्नीक उग्रवादी के रूप में बड़ा हुआ। अपने प्रकाशक द्वारा दी गई समय-सीमा चूक जाने के चलते उसे अपनी प्रथम आवर्त सारणी स्वयं ही प्रकाशित करनी पड़ी क्योंकि अपने तत्व-ज्ञान को वह एक सटीक रूप में समेटना चाहता था। फिर चाहे उसे अपनी यह किताब पूरी करने के लिए स्थानीय चीज़-कारखानों की इन्स्पेक्टरी करने की अपनी नौकरी की अनदेखी ही क्यों न करना पड़ी हो।

अपनी यह सारणी छपवाने में लेट-लतीफ क्यों न हो गया हो मेंदलीव, पर था बड़ा दिमागी बन्दा वो। देर से भले आई हो उसकी सारणी, पर थी इतनी दुरुस्त कि लगभग सारे तत्व उसमें समाते थे। और यही नहीं, अपनी आवर्त सारणी के आधार पर मेंदलीव, गॅलियम और जर्मेनियम जैसे उन तत्वों की भी भविष्यवाणी कर देता था जो अभी अपनी होनी में नहीं आए थे। देखा जाए तो उसका यह काम, जैविक विकास पर डार्विन के काम से किसी भी लिहाज़ से कम न था: हालाँकि इन दोनों ने ही सारा का सारा काम नहीं किया, पर काम का अधिकांश हिस्सा उन्होंने किया और औरों के मुकाबले क्या तो नफासत से किया।
मेंदलीव के बाद कई वैज्ञानिकों ने आवर्त सारणी को भरा-पूरा किया, बेहतर बनाया। इनमें पैरिस की उस क्यूरी दम्पति - मैरी व पियरे - का नाम भी शुमार है जिन्होंने रेडियोधर्मिता का अध्ययन किया और उस अँधेरे-में-चमकते रेडियम की खोज की जिसकी चमकार में सारी दुनिया चौध गई। फिर अर्नेस्ट रदरफोर्ड भी हुए जिन्होंने परमाणविक संरचना का ताना-बाना बुना, और बताया कि किस तरह एक तत्व, एक-दूसरे में ‘तत्वान्तरित’ होता है। और इस तरह कीमियागरों का सपना आखिरकार सच हुआ।

मेंदलीव द्वारा पेश की गई आवर्त सारणी:मेंदलीव से पहले भी तत्वों को वर्गीकृत करने की कोशिश हुई है। ब्रिटिश वैज्ञानिक न्यूलैंड ने 1865 में उस समय के ज्ञात 56 तत्वों को उनके भौतिक गुणों के आधार पर 11 वर्गों में रखा था।
मेंदलीव ने तत्वों की उनके परमाणु भार के आधार पर तालिका में जमावट की थी। 1869 में रशियन केमिकल सोसाइटी ने मेंदलीव की आवर्त सारणी का प्रस्तुतिकरण आयोजित किया था। जल्द ही यह तालिका पहले रूसी जर्नल में प्रकाशित हुई, और तुरंत बाद शोध-पत्रिका में।

रदरफोर्ड से भी अधिक प्रतिभाशाली शायद मॅनचेस्टर यूनिवर्सिटी में उसका छात्र रहा हेनरी मोज़ली था। मोज़ली के पहले वैज्ञानिक यह तो जानते रहे कि आवर्त सारणी ठीक काम करती है, लेकिन उन्हें यह न समझ आता था कि उसमें तत्वों की जगह कैसे-क्या नियत होती थी - खासकर तब जब परमाणु भार के हिसाब से कोबाल्ट व निकिल जैसे कुछ तत्वों की आपस में न पटती थी, और उन्हें इधर-उधर कर अपने सरीखे तत्वों के कॉलम में जमाना पड़ता था। मोज़ली ने धनात्मक आवेश के आधार पर तत्वों की जगह बनाते हुए इस बाबत होने वाली सारी ऊहापोह मिटा डाली (आज आप इसे यूँ कहेंगे कि जैसे-जैसे हम आवर्त सारणी में बाएँ से दाएँ चलते जाते हैं, हर नए तत्व के नाभिक में एक नया धनावेशित प्रोटॉन जुड़ता जाता है)। पच्चीस साल की उम्र के लिहाज़ से मोज़ली की प्रतिभा कुछ अधिक ही परिपक्व थी। पर अपनी सफलता का जश्न मनाना मोज़ली को नसीब न हुआ- दो बरस बाद ही वह गलीपोली में चल बसा। उसके एक साथी का दावा तो यहाँ तक था कि अकेले उसकी मृत्यु के चलते ही यह तय हो चुका था कि उस वक्त चल रहे विश्वयुद्ध की गिनती ‘इतिहास के सबसे भयानक व अक्षम्य अपराधों’ में होगी।

मोज़ली की मृत्यु, हालाँकि, युद्ध व आवर्त सारणी के बीच एकमात्र कड़ी न रही। पहले विश्वयुद्ध के दौरान जब इस्पात में मॉलिब्डेनम बुरका गया, दाब-ताप झेलने की जर्मन तोपों की क्षमता में बहुत सुधार देखा गया। इसके चचेरे भाई टंग्स्टन ने भी नाज़ियों के लिए ठीक इसी तरह की भूमिका निभाई।

हाल ही की बात करें तो, (मोबाइल फोन सर्किट के एक घटक) टैण्टेलम नामक तत्व की मांग के चलते कांगो में गृह-युद्ध भड़क उठा। पूरी दुनिया की 60 प्रतिशत टैण्टेलम आवक पर कांगो का नियंत्रण है, और 90 के दशक के उत्तरार्ध में मोबाइल फोन की मांग में उछाल ने उन लोगों को मालामाल कर दिया जो बन्दूकों का अवैध कारोबार व आम नागरिकों की सेना चलाते थे। फोन-निर्माताओं ने हालाँकि टैण्टेलम का दूसरा स्रोत ढूँढ़ निकाला, पर गृह-युद्ध में हलाक हुए कोई पाँच करोड़ लोगों में से ज़्यादातर की मौत का धब्बा तो उनके सिर ही लगता है।

रासायनिक तत्व-संचालित ऐसे और भी संकट शायद हमें झेलने पड़ें। अफगानिस्तान में मिली खरबों की प्राकृतिक/तात्विक सम्पदा को अगर ठीक से नियंत्रित न रखा गया तो उस देश की बरबादी और भी विकट हो चलेगी। बहुत-से कृषि वैज्ञानिक इस बात से परेशान हैं कि उर्वरकों के महत्वपूर्ण घटक फॉस्फोरस की आमद दुनिया भर में घट चली है, और इसका कोई फौरी समाधान भी सामने नहीं है।

हेनरी मोज़ली: परमाणु भार के आधार पर तत्वों की जमावट वाली आवर्त सारणी काफी समय तक चलती रही। 1914 में मोज़ली को अपने अध्ययन के दौरान तत्वों की एक्स-रे तरंग लम्बाई और तत्व के परमाणु क्रमांक के बीच कुछ सम्बन्ध दिखाई दिया। इस आधार पर उसने तत्वों को परमाणु भार की बजाए परमाणु संख्या के आधार पर जमाने के कोशिश की। मोज़ली के इस प्रयास ने इस बात की ओर इशारा किया कि परमाणु क्रमांक को प्रयोग द्वारा मालूम किया जा सकता है। मोज़ली ने भी कुछ तत्वों की खोज से पहले भविष्यवाणी की थी।

दूसरी तरफ ऊर्जा का संकट भी गहरा रहा है। इस कारण दुनिया भर के वैज्ञानिक कार्बन के इस्तेमाल से ही निजात पाने की धुन में लगे हैं। अब इनमें से कुछ को तो लीथियम बैटरियों में उम्मीद की किरण दिखलाई पड़ती है, जबकि कुछ हाइड्रोजन ईंधन पर अपनी निगाह टिकाए हुए हैं। ऊर्जाओं की बहुत-सी वैकल्पिक किस्मों का दारोमदार उत्प्रेरक परिवर्तित्रों (catalytic converters), सुपरकण्डक्टरों, सौर-पैनलों, विंड-टरबाइनों, ऊर्जा-दक्ष प्रकाश बल्बों व टोयोटा प्रिअस के इंजिन में पाए जाने वाले ‘दुर्लभ मृदा तत्व’ (57 से लेकर 71 तक के तत्व) के भरोसे होता है। इन सारी तकनीकों में कोई-न-कोई खामी ज़रूर है - इसीलिए आवर्त सारणी अगर दाँव लगाने वाला कोई बोर्ड होती तो उस पर हमें खपचियाँ ही खपचियाँ लगी मिलतीं।

इसी साल, वैज्ञानिकों ने इसमें सबसे ताज़ातरीन तत्व (कैदी नं. 117) जोड़ा है- उननसेप्टियम। लेकिन अब नए तत्व बनाना बहुत मुश्किल काम हो चला है, क्योंकि सबसे भारी तत्व क्षणभंगुर परमाणविक पदार्थ पर कुछ करकुराकर बहुत ही थोड़ी-सी मात्रा में बनाए जा सकते हैं, और वे भी देखते-न-देखते, चन्द मिली-सेकण्डों में ही, फुर्र-फुर्र हो जाते हैं। सो एक प्रकार से हम शायद आवर्त सारणी के समापन के करीब ही आन खड़े हों। लेकिन इसके आश्चर्य तो कम होने से रहे आए! हम लगातार पुराने तत्वों की नई-नई शरारतों से वाकिफ हुए जा रहे हैं। अब से कोई खरबों साल बाद होने वाले हमारे सूरज के विस्फोट, और उसके चलते हमारी अपनी प्यारी धरती के टाँय-टाँय फिस्स हो जाने से कमतर कोई चीज़, हमारी यादों से आवर्त सारणी को तो क्या मिटाएगी भला! और उस परम-विस्फोट के बाद भी, ब्रह्माण्ड में, हमारे सौर मण्डल को रचने वाले 92 प्राकृतिक तत्वों के बचे रहने की सम्भावनाएँ तो फिर भी कायम हैं ही, जिनसे बनेंगे नए-नवेले ग्रह, उपजेंगे नए-नकोरे जीवन-रूप और आएँगी ऐसी नई-नई कहानियाँ, जो हमारी कल्पना में अभी तो जन्मीं ही नहीं।


सैम कीन: अमेरिकी लेखक हैं। इनका काम द न्यूयॉर्क टाइम्स, मेंटल फ्लोस, स्लेट, द बिलीवर और द न्यू साइंटिस्ट जैसी पत्रिकाओं और ब्लॉग्स में देखने को मिलता है। ‘द डिसअपीअरिंग स्पून’ पुस्तक के लेखक हैं।

अँग्रेज़ी से अनुवाद: मनोहर नोतानी: शिक्षा से स्नातकोत्तर इंजीनियर। पिछले 20 वर्षों से अनुवाद व सम्पादन उद्यम से स्वतंत्र रूप से जुड़े हैं। भोपाल में रहते हैं।

यह लेख ‘द टेलीग्राफ’ समाचार पत्र, 03 अगस्त, 2010 से साभार।