रिनचिन                                                                                                                                                       [Hindi PDF, 680 kB]

कहानी
स्कुल से घर लौटते हुए मगन सबरी को ढूँढ़ रहा है। मगर लगता है कि सबरी पहले ही घर के लिए निकल चुकी है क्योंकि वह न तो पीछे-पीछे आ रहे बच्चों की टोली के साथ नज़र आ रही है, न आगे कहीं दिख रही है। हो सकता है कि जो कुछ हुआ था, उसके बाद वह किसी से बात ही नहीं करना चाहती। मगन आह भरते हुए चलने लगता है, सामने फैली हुई पहाड़ियों और घरों की ओर, अपने ही ख्यालों में डूबा हुआ। दोपहर की धूप में इतनी दूर चलकर जाना किसी सज़ा से कम नहीं है। काश, सबरी उसके लिए रुकी होती।

सब कुछ तब शुरू हुआ था जब सुबह गुरुजी ने उनके कमरे में आकर पूछा था, “बाहर ब्लैक-बोर्ड पर वह किसने लिखा है?” क्या लिखा है? यह सवाल सबके दिमाग में कौंध गया था और गुरुजी रोक पाएँ, उससे पहले ही पूरा स्कूल बाहर ब्लैक-बोर्ड देखने कूच कर गया था। वहाँ बड़े-बड़े अक्षरों में लिखा था - नए गुरुजी झूठे हैं। सब बच्चों ने गहरी साँस ली, कुछ को लगा कि हँसी उनके होंठों को गुदगुदा रही है, मगर गुरुजी पीछे ही खड़े थे और सबको पता था कि हँसने का अंजाम अच्छा नहीं होगा। नए गुरुजी के हाथ खूब चलते थे।

उन्होंने सुना कि पीछे खड़े बड़े गुरुजी ने बाला गुरुजी को सारे बच्चों को अन्दर ले जाने को कहा और नए गुरुजी को अपने साथ हैंड-पम्प के पास पेड़ के नीचे आने को कहा। जिस ढंग से नए गुरुजी हेड मास्टर से बात कर रहे थे, उससे लगता था कि वे बहुत गुस्से में थे। ज़ाहिर था कि वे चाहते थे कि बच्चों को सज़ा दी जाए। वे कह रहे थे कि “सबकी सुताई होनी चाहिए, क्या ये लोग अपने शिक्षक का इसी तरह सम्मान करते हैं? बड़े होकर सब के सब अपने जाहिल माँ-बाप जैसे बनेंगे।” उन्होंने कहा था, “यदि हम इनको अपने बुज़ुर्गों की इज़्ज़त करना नहीं सिखा सकते तो इतनी मेहनत करने का क्या फायदा?” वे ज़ोर-ज़ोर से बोल रहे थे और उनके शब्द कान लगाए बच्चों तक पहुँच रहे थे, पूरी कड़वाहट और ज़लालत के साथ।

बाहर जाने से रोकने की कोशिश में बाला गुरुजी ने सब बच्चों को अन्दर वाले कमरे में बैठा दिया था। फिर उन्होंने खखारकर गला साफ किया और पूछा, “किसने लिखा है वो? यह कोई अच्छी बात है?” बच्चे चुप रहे। बाला गुरुजी इतने युवा हैं और इतने उनके अपने जैसे ही हैं कि इससे ज़्यादा पूछने की सामर्थ्य ही नहीं थी शायद उनमें। तो वे थोड़ी देर तक चुप रहे। जब उन्हें समझ न पड़ा कि और क्या करें, तो हिन्दी की किताब निकालने को कहा और दुर्गी से अध्याय-3 ज़ोर-ज़ोर से पढ़ने को कह दिया। सारे बच्चे उसके रुक-रुककर पढ़ने के साथ चलने की कोशिश कर रहे थे और मन-ही-मन पढ़ते जा रहे थे।

अपना सिर उसकी किताब की ओर झुकाकर मगन ने कनखियों से सबरी को देखने की कोशिश की, कहीं उसने तो नहीं लिखा था ब्लैक-बोर्ड पर? क्योंकि लिखने का किस्सा आज सुबह नहीं, कुछ दिन पहले शुरू हुआ था। उस समय जब नए गुरुजी ने उन्हें गणित पढ़ाना शुरू किया था, खासकर पाँचवीं और आठवीं के बच्चों को। वे इस स्कूल में नए-नए आए थे। वे पास के एक कस्बे में रहते थे और मोटर साइकिल पर स्कूल आते थे। ज़्यादातर वे लेट आते थे। और अक्सर वे बच्चों के साथ बुरा व्यवहार करते थे। वे उन्हें सिर्फ हिन्दी में बोलने को मजबूर करते थे। बाकी शिक्षक भाषा के बारे में इतने सख्त नहीं थे, वे लोग उन्हें उनकी बोली में समझाते थे और यदि वे आपस में अपनी बोली में बातें करें, तो डाँटते नहीं थे। मगर ये गुरुजी अलग थे। “यदि ये हिन्दी बोलना नहीं सीखेंगे, तो इस सारी शिक्षा का और स्कूल खोलने का क्या मतलब है।” यह बात उन्होंने मगन के कान उमेठते हुए बाला गुरुजी को कही थी क्योंकि वह बाला गुरुजी से अपनी भाषा में कुछ पूछते हुए पकड़ा गया था। सबको मालूम था कि बाला गुरुजी को इस बात पर कोई ऐतराज़ नहीं था कि बच्चे अपनी भाषा का उपयोग करें, आखिर वह उनकी भी तो भाषा थी और इसी में उन्हें सबसे सहज लगता था। मगर लगता था कि नए गुरुजी की हिकारत के आगे वे भी स्कूल में ज़्यादा-से-ज़्यादा हिन्दी में बोलने लगे थे।

इन्हीं सब कारणों से कोई भी इन नए शिक्षक को पसन्द नहीं करता था। मारने के लिए तैयार हाथ और दुत्कारने के लिए तैयार ज़बान के चलते कई लड़कों ने कसम खाई थी कि मौका मिलने पर वे उन्हें ठीक कर देंगे। मगर सब जानते थे कि ब्लॉक ऑफिस ने उन्हें उनके स्कूल में खास तौर से भेजा है क्योंकि पिछले साल आठवीं बोर्ड में एक भी बच्चा पास नहीं हुआ था। ज़्यादातर अँग्रेज़ी और गणित में फेल हुए थे। वे विशेष शिक्षक के रूप में आए थे ताकि इस साल कम-से-कम कुछ बच्चे तो पास हो जाएँ। इसलिए बाकी सारे शिक्षक, और तो और, बड़े गुरुजी भी उनसे दबकर रहते थे और उनके सामने हाथ डाल देते थे।

नए गुरुजी का पढ़ाने का तरीका एकदम सीधा-सादा था। उनके पास कुंजियाँ थीं, जिनमें गणित के हल किए हुए सवाल थे। वे ये सवाल बोर्ड पर लिख देते थे। बच्चे इन्हें याद कर लेते थे। इस तरह यह याद रखने की कोशिश करते कि इस सवाल को कैसे हल किया गया था ताकि इसी तरह के और सवाल छुड़ा सकें। धीरे-धीरे बच्चे नए शिक्षक के पढ़ाने के मिज़ाज के आदी हो रहे थे, यह सीख रहे थे कि क्या करें और कहें ताकि उनका गुस्सा कम फूटे। मगर फिर भी सब कुछ अनिश्चित था और कई बार वे शिक्षक के तमाचे खा चुके थे। कल नए गुरुजी का मूड खराब था। मतलब रोज़ाना जितना होता है उससे ज़्यादा खराब, और उनकी ज़बान और हाथ दोनों चाबुक जैसे चल रहे थे। गुरुजी ने कुंजी निकालने के लिए अपने झोले में हाथ डाला, मगर मिली नहीं। उन्होंने सबरी की ओर देखा और किताब माँगी। “किताब मेरे पास नहीं है गुरुजी,” सबरी ने साफ जवाब देने में देरी नहीं की। “तुम्हारे पास नहीं है? कल तुम मुझसे ले नहीं गई थीं?” “नहीं गुरुजी, मैंने आपसे माँगी थी, आपने कहा था कि आप बाद में दे देंगे और फिर आप देना भूल गए थे।”

“मैंने तुम्हें किताब दी थी, झूठी कहीं की।” गुरुजी ने सबरी को कुछ भी कहने का मौका दिए बगैर एक झापड़ जड़ दिया। “तुम सब ऐसे ही हो, चोर।” उन्होंने कहा और उस जगह जा पहुँचे जहाँ सारे झोले रखे हुए थे। उन्होंने एक दूसरे बच्चे से सबरी का झोला उठाकर पलटने को कहा। सबरी के झोले का सारा सामान गिर गया, उसका खड़ू, स्लेट, एक पेंसिल का टुकड़ा और दो नोट बुक - एक गणित और अँग्रेज़ी की और दूसरी विज्ञान, समाज विज्ञान और हिन्दी की। सब चीज़ें फर्श पर पड़ी थीं, सबके सामने, मगर कुंजी नहीं थी। सबरी भागकर अपने झोले के पास पहुँची। अब उसकी आँखों में गुस्सा था। “कुंजी मेरे पास नहीं है गुरुजी, आपने हममें से किसी को नहीं दी। आपके झोले में ही होगी, फिर से देखिए।” यह सब वह एक साँस में कह गई, थोड़ा खुद के बचाव में, थोड़ा समझाते हुए।

मगर उसका इतना कहना था कि गुरुजी का चेहरा लाल हो गया, “तुम मुझे बताओगी कि मैं क्या करूँ? तुम कह रही हो कि मैं झूठ बोल रहा हूँ?” “नहीं गुरुजी, मेरा मतलब यह नहीं था।” सबरी रुक-रुककर बोली। दूसरे बच्चों की ओर समर्थन के लिए देखते हुए फिर बोली, “मैं सही कह रही हूँ।” तब पीछे से गज्जन ने कहा, “गुरुजी आप अपने झोले में एक बार फिर से देख लें, शायद कहीं रखी होगी।” उसने यह बात मनाने के अन्दाज़ में कही थी, स्थिति को सम्भालने के लिए। गज्जन कक्षा में सबसे बड़ा था, वह स्कूल सहायक भी था और ज़्यादातर समय वह कक्षा के बड़े की भूमिका अदा करता था। मगर गुरुजी को इस सबकी कोई परवाह नहीं थी और उन्होंने गज्जन को दो झापड़ रसीद कर दिए। एक गाल पर लगा और दूसरा गर्दन और कन्धे के बीच कहीं लगा। अब तो गुरुजी भयानक गुस्से में थे और सारे बच्चे सहम गए थे। वे कर भी क्या सकते थे। किसी का कुछ भी कहना, गुरुजी के थप्पड़ को न्यौता देता था।

थोड़ी देर तक गुरुजी भी वैसे ही खड़े रहे, पता नहीं इस कक्षा के साथ क्या करें। फिर बच्चों पर एक नज़र डालकर बाहर निकल गए। सबरी सिसक-सिसक कर रो रही थी। उसे पिटने की आदत नहीं थी। वह आम तौर पर चुप रहती और बहुत आज्ञाकारी थी। कोई भी शिक्षक उससे अक्सर कुछ नहीं कहता था। गज्जन ने उसे समझाने की कोशिश की कि जाने दो। बाकी लोग तो हिलने की भी ज़ुर्रत नहीं कर रहे थे। गुरुजी वापिस आ गए तो?

फिर यकायक सबरी, अनजानी ताकत के साथ, भागकर गुरुजी के झोले के पास पहुँची और उसे खोल दिया। “तुम क्या कर रही हो?” मगन खुद को रोक न सका और भागकर उसके पास पहुँच गया। गज्जन भी आगे आ गया मगर तब तक सबरी ने झोले को पलट दिया था। और रजिस्टर, पेन, गमछे, और काले चश्मे के साथ कुंजी भी ज़मीन पर गिर गई। बिलकुल मगन के पैरों के पास। “देखो, मैंने कहा था, मैं झूठ नहीं बोल रही थी।” सबरी ने सबको कहा, उसकी आवाज़ उत्तेजना में थरथरा रही थी। उसने कुंजी हाथ में उठाई और गुरुजी की ओर दौड़ने को हुई। मगर गज्जन ने उसे रोक दिया। बगैर कुछ कहे मगन किताबें और बाकी चीज़ें वापिस गुरुजी के झोले में रखने लगा। गज्जन ने पहले ही सबरी को दूर खींच लिया था। “पागल हुई हो क्या, तुम्हें लगता है गुरुजी को यह अच्छा लगेगा?”
“मगर यह सच है,” सबरी ने कहा, “देखो, मैं नहीं, गुरुजी गलत थे।” गज्जन ने कहा, “क्या फर्क पड़ता है, वे गुरुजी हैं, यदि हमने उन्हें बताया तो उन्हें अच्छा नहीं लगेगा। वे और मारेंगे। जाने दो, बस।”

“देखो वे आ रहे हैं,” किसी ने चेतावनी दी। और मगन आखरी चीज़ भी झोले में भरकर जल्दी से उसे कुर्सी पर लटकाकर बाकी बच्चों के बीच भागा। वहाँ बैठने की जल्दी में वह एक लड़के पर गिर भी पड़ा था। जब गुरुजी लौटे, तो शान्त लग रहे थे। मगर जैसे ही उन्होंने कुर्सी की ओर देखा तो समझ गए कि बच्चों ने उनके झोले में ताक-झांक की है। बच्चे साँस थामे विस्फोट के इन्तज़ार में बैठे थे। मगर कुछ नहीं हुआ था। कुर्सी पर न बैठकर, वे बोर्ड पर जाकर एक सवाल लिखने लगे। जब वे बोले, तो उनकी आवाज़ लड़खड़ा रही थी। उन्होंने बोर्ड पर सवाल लिखकर सबसे उसे हल करने को कहा। मगन को ऐसा लगा कि सवाल उसकी समझ में आए, उससे पहले ही गुरुजी ने सबसे स्लेट सामने रख देने को कह दिया। उनके हाथ में एक छड़ी थी और वे एक स्लेट से दूसरी स्लेट को देखते जा रहे थे कि जवाब सही है या नहीं है। किसी का सही नहीं था। उन्होंने जितना समय दिया था, उतने में सवाल हल कैसे हो सकता था? मगर गुरुजी को इस सबसे कोई मतलब नहीं था, “जवाब नहीं निकला, तो करोे हाथ आगे।” और हर हाथ पर उनकी छड़ी की दो-दो चोटें पड़ी थीं। इस तरह उन्होंने बीस के बीस बच्चों को निपटाया, छड़ी फेंकी और अपना झोला उठाकर चलते बने थे।

सबरी और बाकी सब खड़े रह गए और अपनी दुखती हथेलियाँ अपनी जांघों पर मलते रहे। ऐसा नहीं था कि उन्होंने पहले छड़ी नहीं खाई थीं। मगर दिन की घटनाओं के बाद तो यह असहनीय था। मगर वे कर भी क्या सकते थे। थोड़ी देर तक तो वे बुदबुदाते रहे। फिर किसी ने आकर सबरी से कहा, “सब तुम्हारे कारण हुआ है। किसने कहा था कि उनके झोले को हाथ लगाओ?” “अरे उसने क्या गलत किया? गलती तो गुरुजी की थी, वे तो हमें हर हाल में मारते।” किसी और ने कहा। मगन ने बीच-बचाव करने की कोशिश की और कक्षा के बीचोंबीच तू-तू, मैं-मैं होते देर न लगी। काफी अजीब ढंग से इस तकरार ने कक्षा में स्थिति को सम्भालने में मदद की। सब लोग गुरुजी और उनके द्वारा किए गए अपमान को भूल गए। बराबरी के लोगों के बीच यह लड़ाई उनके काबू में थी।

मगन ने सोचा कि आखिर गुरुजी के खिलाफ जीतने की सोच भी कैसे सकते हैं। हाँ, यदि शंकर यहाँ होता तो ज़रूर कोई रास्ता निकाल लेता। चालाकी से, हँसी मज़ाक से। मगर सबरी अलग थी, इतनी साफगो, हर चीज़ को इतनी संजीदगी से लेती थी। वह लड़ते-झगड़ते लड़कों से दूर खड़ी थी, अब क्लास की लड़ाई दोस्ताना कुश्ती के मैच में तबदील हो चुकी थी। बच्चे मस्ती कर रहे थे। सबरी थोड़ी देर खड़ी रही और फिर अपना झोला उठाकर कमरे से निकल गई। दस मिनट में स्कूल का समय भी पूरा हो गया और स्कूल से निकलते-निकलते बच्चे फिर से जोश में आ चुके थे। उस दिन भी मगन अकेला ही घर लौटा था।

और आज बोर्ड पर वह लिखाई प्रकट हो गई थी। इसे देखने के बाद बड़े गुरुजी और नए गुरुजी के बीच लम्बी चर्चा हुई, और फिर वे दोनों अन्दर आए। नए गुरुजी खामोश थे। सिर्फ बड़े गुरुजी बोले, “क्या तुम बताओगे कि बोर्ड पर वह किसने लिखा है?” सब चुप रहे। “क्या तुम चाहते हो कि मैं तुम सबको सज़ा दूँ? जिसने भी यह किया है, उसे अपनी गलती कबूल करनी चाहिए।” सब खामोश। नए गुरुजी बोले, “देखिए, ये झूठे और चोर हैं। आपको लगता है, ये अपनी गलती कबूल करेंगे? सबकी इतनी पिटाई करनी चाहिए कि हड्डियाँ टूट जाएँ।” वे बोलते जाते मगर बड़े गुरुजी ने बच्चों की तरफ एक कदम बढ़ाकर पूछा, “मैं जानना चाहता हूँ कि क्या इस कक्षा में सब झूठे हैं? वो हाथ उठाए जिसने यह लिखा है।” उनकी आवाज़ में एक अपील थी। सबने अपने हाथ जांघों से बाँधकर रखे। सिवाय सबरी के। मगन की शंका सही निकली। सबरी इतनी बुद्धू क्यों है? इससे क्या फायदा होगा, गुरुजी को झूठा कहना और फिर कबूल कर लेना। मगर अब तो जो होना था हो चुका था। बड़े गुरुजी ने सबको बाहर भेज दिया और सिर्फ सबरी और दोनों गुरुजी अन्दर रह गए।

अन्तत: जब वे बाहर आए, सब बच्चों ने पेड़ के नज़दीक से उनकी ओर देखा, जहाँ वे घूम-फिर रहे थे। सबरी चुपचाप हैंड-पम्प की ओर गई थी। मगन भागकर उसके पीछे गया। उसने पूछा क्या हुआ मगर सबरी खामोश रही। मगन ने पम्प चलाया और सबरी ने पानी पीया। फिर स्कर्ट से अपना मुँह पोंछते हुए बोली, “इससे कोई फर्क नहीं पड़ता कि सच क्या है, हमेशा गुरुजी ही सही रहेंगे। मुझे उन सबसे नफरत है, मैं अब स्कूल आना नहीं चाहती।”

यह सब सोचकर मगन समझ सकता था कि स्कूल पूरा होने के बाद वह उसके लिए क्यों नहीं रुकी। वह सही थी, सही होने के लिए दण्डित किया जाना गलत था। उनके साथ जैसा सलूक हुआ, वह गलत था, बड़ों के शासन में बच्चे होना ही गलत था। और जैसा कि सबरी ने कहा होता, “उफ! सब कुछ गलत है।” मगन इन्हीं विचारों के साथ घर पहुँचा।

दोपहर को वह घरेलू काम में माँ की मदद कर रहा था मगर उसका दिमाग बहुत दूर कहीं था, सबरी के साथ। दोस्ती में यही परेशानी है, यदि तुम्हारे दोस्त को चोट पहुँचती है, या वह मायूस है, तो तुम भी चैन से नहीं बैठ सकते। तो जब माँ ने उससे एक गुंठी पानी और लाने को कहा, तो उसने सोचा कि शायद इस बार नसीब उसके साथ है। हैंड पम्प उनकी पहाड़ी के दूसरी तरफ था और सबरी का घर उसके सामने।

मगन ढलान पर भागते हुए उतरा, हैंड-पम्प को एक तरफ छोड़ते हुए सीधा सबरी के घर में। सबरी एक कोने में बैठी नोट बुक में चित्र बना रही थी। उसकी माँ घर में एक तरफ काम कर रही थी। दोपहर हो चुकी थी और मगन जानता था कि काकी अब खेत पर नहीं जाएँगी। वे घर के सारे छूटे हुए काम निपटाएँगी। यही उसके घर में भी चल रहा था। उसने सोचा कि शायद वह सबरी से कोने में बतिया सके। मगर मगन को समझ नहीं आया कि क्या कहे...उसे पता नहीं था कि कैसे कहे। सबरी इतनी बुझी-बुझी-सी लग रही थी। वह इतना ही कहना चाहता था कि वह समझता है कि सबरी ने जो कुछ किया था वह क्यों किया था। वह उसके गुस्से को समझ सकता था। लेकिन मगन जानता था कि इस वक्त वह सही ढंग से कुछ नहीं कह पाएगा, इसलिए थोड़ी देर वो चुपचाप बैठा रहा।

सबरी की माँ ने वहीं कोने में बैठे-बैठे उन्हें देखा। “सबरी, मगन के साथ जाओ और ये भाजी की गड्डियाँ उनके घर दे आओ। मैं उन्हीं के लिए लाई थी पर यहाँ छूट गईं।” मगन को अपनी किस्मत पर यकीन नहीं हो रहा था। अब सबरी को उसके साथ उसके घर आना पड़ेगा। और शायद तब वह अपनी बात समझा सकेगा। सबरी कुछ कहने को हुई मगर कहा नहीं। अनिच्छा से वह लाल भाजी की गड्डियाँ लेकर मगन के साथ चल दी। जब वे मगन के घर पहुँचे, आयटी ने आवाज़ लगाई, “देखो मैं रोटी बना रही हूँ, दोनों यहाँ आकर एक-एक गर्म रोटी खा लो।” मगन ने खुशी से कहा, “हाँ!” और सबरी को चूल्हे और आयटी के पास खींचा। रोटी बनाते हुए आयटी ने मगन और सबरी से लाल भाजी साफ करने को कहा। औरतें और बच्चे दो दिन पहले ही भाजी लाने जंगल गए थे। हर परिवार कई-कई गड्डियाँ लेकर आया था। थोड़ी देर तक वे चुपचाप भाजी साफ करने में लगे रहे, घास-फूस को अलग करके पकाने के लिए पत्तियाँ इकट्ठी करते रहे। आयटी खाना पकाने में लगी रही।

थोड़ी देर चुपचाप भाजी साफ करने के बाद आयटी ने कहा, “क्यों सबरी, सुना है आजकल खूब-लिखा पढ़ी हो रही है स्कूल में। तेरे अक्षर खूब चमक रहे हैं?” उनकी आवाज़ में हँसी थी। जैसी कि उम्मीद थी, सबरी से और रहा नहीं गया, “पता है काकी स्कूल में क्या हुआ?” उसने कहा, और बारिश की एक तेज़ बौछार की तरह पूरी कहानी उगल दी। सबरी ने मगन की ओर देखा तक नहीं, उसने तो पूरी कहानी निचोड़कर बाहर निकाली दी जैसे गमछे को धोने के बाद निचोड़ते हैं। “सब कुछ बहुत गलत हुआ मगर गुरुजी से कैसे लड़ें?” मगन आखरी में इतना ही जोड़ पाया।

आयटी रोटियाँ बनाने में लगी रही, और फिर छोटी-सी चुप्पी के बाद वो बोली, “इससे कोई फर्क नहीं पड़ता कि गुरुजी ने अपनी गलती मानने से इन्कार कर दिया, इससे कोई फर्क नहीं पड़ता कि बड़े गुरुजी ने तुम्हारा पक्ष नहीं लिया।” “लेकिन...लेकिन...” मगन और सबरी दोनों ने उन्हें टोकने की कोशिश की, मगर आयटी बोलती गई, “हाँ, मुझे पता है गुरुजी गलत थे, मगर क्या तुम्हें उम्मीद थी कि वे मान लेंगे?” दोनों बच्चे चुप रहे। आयटी ने अपनी बात जारी रखी, “तुम्हारे नए गुरुजी अपनी गलती कैसे मान लेते, उनकी बेइज़्जती नहीं हो जाती सबके सामने?” “और मेरी बेइज़्जती जो हुई उसका क्या?” सबरी गुस्से में बोल रही थी, “एक बार माफी माँग लेते तो उनका क्या जाता?”
“उनका रौब ना कम हो जाता,” आयटी ने कहा, “उनकी धाक कैसे रहती अगर एक छोटी-सी लड़की के सामने झुक जाते।”

इस पर सबरी बोल पड़ी, “गुरुजी ने जो कुछ किया, उसके बाद मैं उनका आदर नहीं करती।” “तो नुकसान किसका हुआ?” आयटी ने पूछा और खुद ही जवाब दिया, “गुरुजी का।” मगन इस पर झट से बोला, “कैसे, उन्होंने इसके बाद भी हमारी पिटाई की और किसी ने कुछ नहीं कहा।” “जानती हूँ, मगर उन्होंने कुछ गंवा दिया...तुम्हारा आदर।” सबरी के चेहरे पर कुछ भाव आए और उसने धीरे-से सिर हिलाया, इस पर मगन की माँ ने आगे कहा, “मगर तुमने मेरा आदर पा लिया। और शायद कुछ और लोगों का भी, जो शायद गुस्से का नाटक कर रहे हैं ताकि नए गुरुजी बुरा न मानें।” मगन और सबरी दोनों ने हैरानी से उनकी तरफ देखा।
“पर पिटाई तो हमें ही पड़ी ना,” सबरी ने फिर कहा। “पिटाई पड़ी, हमें पिटाई पड़ी,” आयटी ने सबरी की नकल उतारते हुए कहा। दोनों इससे इतने चकित हो गए कि हँसने लगे।

“अरे अगर टीचर से पंगा लोगे तो पिटोगो नहीं तो क्या वह तुम्हें प्यार करेंगे?” आयटी भी हँसते हुए बोली।
“सब को पता चल गई है उनकी गलती, इसलिए छड़ी चला रहे हैं तुम्हारे गुरुजी,” आयटी ने चुल्हे पर से एक रोटी उतारी और आधे में तोड़ दी। उस पर गुड़ लगाया। और एक-एक हिस्सा दोनों की ओर बढ़ा दिया। दोनों ने जल्दी से ले लिया। ऐसा रोज़-रोज़ नहीं मिलता था।

“और अगर नए गुरुजी बुरे हैं, तो तुम्हारे स्कूल ना जाने से क्या फर्क पड़ेगा,” यह वाक्य थोड़ा सख्ती से कहा था आयटी ने। पर अब हँसी भरी आवाज़ में उन्होंने सबरी को चिढ़ाया, “क्यों इतनी जल्दी हार गईं सबरी?” सबरी की आँखें झुकी थीं, पर भाव बदल रहा था। दोनों चुप-चाप रोटी खाते रहे। और धीरे बात करने लगे। जाते वक्त सबरी ने कुछ कहा तो नहीं पर ऐसा लग रहा था कि शायद वह कल स्कूल वापिस जाएगी।

वह तो जब रात को मगन पानी पीने गया, तब उसका ध्यान चबूतरे के पास रखी खाली गुंठी पर गया। तब उसे याद आया कि वह खाली गुंठी लेकर लौटा था। पता नहीं आयटी ने पूछा क्यों नहीं। और यदि घर में पानी था, तो आयटी ने और पानी लाने को भेजा ही क्यों था? वह मुस्कुराया और माँ के पास सोने को चला गया।
(सितम्बर 2008)


रिनचिन: बच्चों व बड़ों के लिए कहानी लिखती हैं। भोपाल में रहती हैं।
अँग्रेज़ी से अनुवाद: सुशील जोशी: एकलव्य द्वारा संचालित स्रोत फीचर सेवा से जुड़े हैं। विज्ञान शिक्षण व लेखन में गहरी रुचि।
सभी चित्र: जितेन्द्र ठाकुर: एकलव्य, भोपाल में डिज़ाइन एवं प्रोडक्शन इकाई में कार्यरत।