कमलेश उप्रेती एवं विनोद उप्रेती

कुछ अंक पहले हमने पनचक्की के संबंध में एक लेख प्रकाशित किया था। लेख के अंत में भारत में पनचक्कियों (घाट) पर संक्षिप्त जानकारी भी दी थी। यह जानकारी मुख्य रूप से पनचक्कियों के सामाजिक और आर्थिक पहलुओं से संबंधित थी।
हमारे कई पाठक भारत की पनचक्कियों की तकनीक के बारे में थोड़ा विस्तार से जानना चाहते थे। हाल ही में उत्तरांचल से । हमारे दो पाठकों ने 'घराट' के बारे में कुछ जानकारी भेजी है। जिसे हम यहां प्रस्तुत कर रहे हैं।
 
आवश्यकता और भौगोलिक अनुकूलता के कारण भारत के कई पहाड़ी इलाकों में घराट का उपयोग होता है। पहाड़ों पर घराट उन जगहों पर बनाए जाते हैं जहां आसपास पानी का बारह मासा स्रोत उपलब्ध हो - जैसे नदी या गधेरों के किनारे। आखिर पानी ही है जो घराट को गतिमान बनाए रखता है। पहाड़ी इलाकों में घराट का कई तरह से इस्तेमाल किया जाता है। जैसे - अनाज पीसना, तेल पेरना, लकड़ी के मोटे तनों से बर्तन बनाना। यहां तक कि घराट से बिजली का निर्माण भी किया जाता है।
पहाड़ों में आम जनता का घराट से गहरा जुड़ाव है और इसे सारे गांव की संपत्ति माना जाता है। पर समय के साथ आर्थिक रूप से सक्षम लोग धराट से दूर होते गए और नए साधनों की ओर उन्मुख हुए हैं। लेकिन धराट अब भी गरीबों के लिए मित्रवत बना हुआ है और निशुल्क मदद देता रहा है। इन सबके चलते कई जगहों पर घराट के रख-रखाव का काम निम्न आये वाले समूहों के हाथों में आ गया है।
जिन लोगों ने घराट को देखा नहीं होता उन्हें घराट के तकनीकी पक्ष को समझने में काफी रुचि होती है। इसलिए हम यहां इसके तकनीकी पक्ष पर थोड़ी बात करेंगे।

घराट में काफी सरल और सहज युक्तियों का इस्तेमाल होता है। पहाड़ के किसी नदी या गधेरे के किनारे घूमते हुए आपको सहसा घरघराहट की आवाज़, पानी की छप-छप के साथ सुनाई दे तो रुक जाइए, आसपास कहीं घराट चल रहा होगा। ध्यान देने पर छोटा-सा दुमंजिला मकान दिखेगा, जिसे झोपड़ी कहना ज्यादा सही होगा, इसी मकान के भीतर रहता है घराट।
पास की नदी या गधेरे से पानी को एक कूल (नहर) से घराट तक लाया जाता है और इससे एक पनेले (पाइप) द्वारा निचली मंजिल में गिराया जाता है। ये पाइप लकड़ी के तने को भीतर से खोखला कर बनाया जाता है। यह पाइप ऊपर की ओर चौड़ा और निचले हिस्से की ओर क्रमशः संकरा होता है, जिससे पानी के गिरने की गति तेज़ हो जाती है।

निचली मंजिल में पानी टरबाइन की पंखुड़ियों पर गिरता है। टरबाइन तैयार करने के लिए चीड़ की लकड़ी का तीन फीट लंबा बेलन बनाया जाता है। बेलन की बाहरी सतह पर लंबे-लंबे खांचे बनाकर उन खांचों में चीड़ के फट्टे थोड़े झुकाकर ठोके जाते हैं। पाइप से आने वाला पानी लकड़ी के इन्हीं फट्टों पर गिरता है। यहां तक आते-आते टरबाइन तो लगभग तैयार हो गया है, बस टरबाइन के घूमने के लिए व्यवस्था बनानी बाकी है। टरबाइन के घूमने के लिए एक लोहे की लंबी छड़ को बेलन की लंबाई में ठोंककर निचले सिरे की तरफ से एक ठोस पत्थर के आधार पर खड़ा कर देते हैं। फलस्वरूप टरबाइन घूमती है। लोहे की छड़ के ऊपरी सिरे को ऊपरी मंजिल पर चक्की से जोड़ा जाता है। चक्की का निचला पाट फिक्स कर दिया जाता है और इस पाट में से गुजरती हुई लोहे की छड़ से चक्की का ऊपरी पाट जोड़ दिया जाता है। इस व्यवस्था के बाद टरबाइन के घूमने पर चक्की का सिर्फ ऊपरी पाट ही घूमेगा।

घराट में एक खास व्यवस्था होती है - अनाज को मोटा या महीन पीस सकने की सुविधा। अनाज महीन पीसने के लिए दोनों पाटों के बीच की दूरी को कम करना होता है। और अनाज को मोटा पीसने के लिए जरूरी है कि दोनों पाटों के बीच का फासला बढ़ जाए। फासले को कम-ज्यादा करने के लिए टरबाइन को उसके आधार के साथ ऊपर-नीचे किया जाता है जिससे टरबाइन की छड़ से जुड़ा ऊपरी पाट भी ऊपर-नीचे होता है। इसके लिए टरबाइन को जिस आधार पर टिकाया जाता है उसे एक लकड़ी के तख्ते पर फिट किया जाता है। तख्ते से एक लंबी लकड़ी जोड़कर उसे ऊपरी मंज़िल में निकाला जाता है। इस लीवरनुमा रचना से टरबाइन को ऊपर उठाना और नीचे करना संभव है। इस युक्ति को चाबी भी कह सकते हैं।

यहां तक पहुंचते-पहुंचते घराट तो बन गई। परन्तु पानी से चलने वाली यह घराट धीमी रफ्तार से अनाज पीसती है। अब कौन यहां बैठा रहेगा अपना अनाज धीरे-धीरे डालने के लिए, और अगर यही करना है तो घर में हाथ से चलाई जाने वाली चक्की में क्या बुराई है? मशीन तो होती ही है मानवीय श्रम और समय की बचत के लिए, सो घराट में भी अनाज डालने के व्यवस्था है। पाटों के ऊपर लकड़ी का एक बर्तन लटकाया जाता है। इस बर्तन के तले में एक छेद होता है, यह छेद पाटे के छेद के ठीक ऊपर होता है। इस बर्तन के छेद से अनाज घूमते हुए पाटे में गिरता है और पिसाई होकर बाहर गिरता है। यहां बस एक छोटी-सी दिक्कत है - वह यह कि बर्तन को लगातार धीमे-धीमे हिलाना होता है ताकि अनाज छेद से होकर पाटों पर गिरता रहे। इसके लिए लकड़ी की एक घुडी बर्तन के निचले हिस्से से लटकी होती है जो हौले-हौले पत्थर के पाट से टकराती है और लकड़ी का बर्तन एक लय में धीमे-धीमे हिलता रहता है तथा अनाज भी गिरता रहता है।

इतनी सब जानकारी के बाद जब आप अनाज पीसने घराट पर जाएं तो सबसे पहले कूल को नदी से जोड़ दें और जैसे ही इसमें पानी बहना शुरू हो जाए, लकड़ी के बर्तन में अनाज डाल दीजिए। घराट चलना अभी शुरू नहीं हुआ है। घराट शुरू करने के लिए चाबी से चक्की के ऊपरी पाट को थोड़ा ऊपर उठाना जरूरी है क्योंकि उपयोग न होने की स्थिति में चक्की को बैठा दिया जाता है और पाट आपस में चिपके रहते हैं। जैसे ही आपने ऊपरी पाट को थोड़ा ऊपर उठाया कि घराट चल पड़ा; और टरबाइन पर गिरते पानी की छप-छप और पाटों से टकराती लकड़ी की धुंडी की टक-टक की आवाज आसपास सुनाई देने लगेगी।
डीजल-बिजली से चलने वाली चक्कियों और नई तकनीकों के चलते घराट का प्रचलन कम होता जा रहा है। लेकिन बिजली के होने की अनिश्चितता व डीज़ल की लगातार बढ़ती कीमत की वजह से घराट आज भी एक सस्ता विकल्प है। उत्तरांचल के कुछ इलाकों में तो इनका व्यापारिक इस्तेमाल भी होता रहा है। बहुत सारी सरकारी और गैर सरकारी संस्थाएं भी इनके विकास के लिए प्रयासरत हैं।


कमलेश उप्रेतीः एम. एस. सी. गणित के छात्र हैं। विज्ञान लेखन में रुचि।
विनोद उप्रेतीः बी. एस सी. के छात्र हैं। चित्रकारी व फोटोग्राफी में रुचि।
सभी रेखाचित्रः विनोद उप्रेती।
धराट/पनचक्की पर संदर्भ के अंक 40 में भी एक लेख प्रकाशित हो चुका है।