सुशील जोशी   [Hindi PDF, 200 kB]

हालाँकि कुछ बातें ऐसी हैं जिनका पता वैज्ञानिकों ने एक-दो सदियों पहले ही लगा लिया था मगर लोक मानस में वे भ्रम पैदा करती रहती हैं। विज्ञान की पाठ्य पुस्तकें भी इन भ्रमों को दूर करने में कोई मदद नहीं करतीं। और तो और, कई बार तो पाठ्य पुस्तकें भ्रम को हवा देने का काम करती हैं। ऐसा ही एक मामला साँस लेने से सम्बन्धित है।
यह तो सब जानते हैं कि मनुष्य समेत सारे प्राणी श्वसन करते हैं। अधिकांश प्राणियों की श्वसन की क्रिया में शर्करा (मूलत: ग्लूकोज़) और ऑक्सीजन की क्रिया होती है। इस क्रिया में काफी सारी ऊर्जा मुक्त होती है जो प्राणी अपने कामकाज के लिए उपयोग करते हैं। इस क्रिया में कार्बन डाईऑक्साइड और पानी पैदा होते हैं। कार्बन डाईऑक्साइड को किसी-न-किसी तरह शरीर से बाहर निकाल दिया जाता है। मनुष्य और कई अन्य प्राणियों में ऑक्सीजन प्राप्त करने और कार्बन डाईऑक्साइड को बाहर निकालने के लिए विशेष अंग पाए जाते हैं, जबकि कई प्राणियों में इस कार्य के लिए कोई विशेष अंग नहीं होते।

प्राणियों के समान पेड़-पौधे भी श्वसन की क्रिया करते हैं; आखिर शरीर के कामकाज के लिए ऊर्जा तो उन्हें भी चाहिए। पेड़-पौधों में भी श्वसन में शर्करा का उपयोग होता है, ऑक्सीजन से उसकी क्रिया होती है और कार्बन डाईऑक्साइड व पानी बनते हैं।

कुछ भ्रम, कुछ तथ्य
चूँकि श्वसन की क्रिया में ऑक्सीजन का उपयोग होता है और कार्बन डाईऑक्साइड का निर्माण होता है, इसलिए हमारी अधिकांश पाठ्य पुस्तकें आपको बताएँगी कि श्वसन में हम ऑक्सीजन लेते हैं और कार्बन डाई-ऑक्साइड छोड़ते हैं। यह पहला भ्रम है। यह वक्तव्य देते हुए यह नहीं बताया जाता कि साँस लेना और छोड़ना श्वसन का एक अंश मात्र है। श्वसन के अन्तर्गत साँस लेना व छोड़ना, ली गई साँस में से ऑक्सीजन को सोखकर कोशिकाओं तक पहुँचाना, कोशिकाओं में इस ऑक्सीजन की मदद से शर्करा का ऑक्सीकरण करना (आन्तरिक अथवा कोशिकीय श्वसन), इस ऑक्सीकरण के दौरान उत्पन्न कार्बन डाईऑक्साइड को वापिस फेफड़ों तक पहुँचाना तथा अन्तत: उसे शरीर से बाहर निकालना तक शामिल हैं।

दिन में श्वसन क्रिया: वनस्पतियों में दिन के समय श्वसन के दौरान कार्बन डाईऑक्साइड पैदा होती है। इस कार्बन डाईऑक्साइड का उपयोग प्रकाश संश्लेषण की क्रिया में कर लिया जाता है।

सवाल यह है कि यदि मनुष्य श्वसन की क्रिया में ऑक्सीजन लेकर कार्बन डाईऑक्साइड छोड़ते हैं, तो ज़रा सोचिए कि फिर एक व्यक्ति द्वारा दूसरे को कृत्रिम श्वसन देने की बात कैसे सम्भव है। दरअसल, आप जो हवा फेफड़ों में खींचते हैं और जो हवा फेफड़ों से छोड़ते हैं, यदि उनका विश्लेषण करें तो उनमें बहुत अन्तर नहीं होता। जैसे जो हवा आप साँस में लेते हैं उसमें करीब 79 प्रतिशत नाइट्रोजन, 20 प्रतिशत ऑक्सीजन और 1 प्रतिशत अन्य गैसें व जलवाष्प होते हैं। अन्य गैसों में करीब 0.03 प्रतिशत कार्बन डाई-ऑक्साइड शामिल है। अब साँस में छोड़ी जाने वाली हवा पर गौर करें। इसमें 79 प्रतिशत नाइट्रोजन, करीब 16 प्रतिशत ऑक्सीजन और करीब 3 प्रतिशत कार्बन डाईऑक्साइड होती है (शेष प्रमुख तौर पर जलवाष्प)। आप देख ही सकते हैं कि साँस लेने व छोड़ने में मौजूद इन दो हवाओं में कोई बड़ा अन्तर नहीं है।

अब सवाल पेड़-पौधों का। पेड़-पौधों में श्वसन के लिए कोई विशेष अंग नहीं होते। इनमें हवा का आदान-प्रदान मूलत: पत्तियों में उपस्थित छिद्रों के ज़रिए होता है। इन छिद्रों को स्टोमेटा कहते हैं। इनके अलावा तने पर भी कुछ छिद्र होते हैं और जड़ें अपनी पूरी सतह से ‘साँस’ लेती हैं। श्वसन की क्रिया में पेड़-पौधे भी ऑक्सीजन का उपयोग करते हैं और कार्बन डाई-ऑक्साइड का निर्माण करते हैं।
गौरतलब है कि सारे सजीव श्वसन करते हैं और चौबीसों घण्टे करते हैं क्योंकि शरीर की किसी भी बुनियादी जीवन क्रिया या ज़रूरी हुआ तो हिलने-डुलने, चलने-फिरने के लिए ज़रूरी ऊर्जा श्वसन के ज़रिए ही मिलती है।

प्रकाश संश्लेषण और श्वसन
मगर हम यह भी पढ़ते आए हैं कि पेड़-पौधे ऑक्सीजन देते हैं। यहीं से अगला चक्कर शु डिग्री होता है। वास्तव में अठारहवीं सदी में कई वैज्ञानिकों के प्रयासों से यह स्पष्ट हो पाया था कि पेड़-पौधे हवा की मदद से एक क्रिया और करते हैं। उस क्रिया को प्रकाश संश्लेषण कहते हैं और उसमें पेड़-पौधे कार्बन डाईऑक्साइड तथा पानी की क्रिया से शर्करा और ऑक्सीजन का निर्माण करते हैं। काफी पापड़ बेलने के बाद इस क्रिया को भलीभाँति समझा जा सका। जो बात यहाँ महत्वपूर्ण है, वह है कि प्रकाश संश्लेषण की क्रिया के लिए प्रकाश ज़रूरी है। दूसरी बात यह है कि यह क्रिया पेड़-पौधों के सिर्फ उन भागों में होती है, जहाँ क्लोरोफिल होता है।

इसके आधार पर दो बातें साफ हैं। प्रकाश संश्लेषण अधिकांश पौधों में सिर्फ पत्तियों तक सीमित होता है और रात में नहीं होता। दूसरी ओर, श्वसन दिन-रात हर समय चौबीसों घण्टे चलता रहता है। इसके साथ एक बात और ध्यान देने योग्य है।

प्रकाश संश्लेषण की क्रिया बहुत तेज़ गति से होती है। सुबह होने के साथ ही तमाम पत्तियाँ कारखानों की तरह काम करना शु डिग्री कर देती हैं और कार्बन डाईऑक्साइड और पानी की क्रिया से शर्करा बनाने लगती हैं। इस शर्करा को कई अन्य पदार्थों में बदला जाता है। प्रकाश संश्लेषण की तेज़ रफ्तार का ही नतीजा है कि ये पदार्थ न सिर्फ पौधों के लिए बल्कि समस्त प्राणियों के लिए भी जीवन का आधार बन पाते हैं।

ध्यान दें कि दिन उगने के बाद भी श्वसन की क्रिया चल रही है। मगर पेड़-पौधों में श्वसन की क्रिया धीमी होती है। उन्हें हिलना-डुलना, चलना-फिरना, धड़कना तो है नहीं। इसलिए उनकी ऊर्जा की ज़रूरत भी कम होती है और श्वसन की रफ्तार भी। श्वसन की क्रिया में जो कार्बन डाईऑक्साइड पैदा होती है, वह पत्तियों के अन्दर ही खाली स्थानों में पहुँचती है। इन्हीं पत्तियों में प्रकाश संश्लेषण की क्रिया भी चल रही है। इस प्रकाश संश्लेषण क्रिया के लिए हवा में मौजूद कार्बन डाईऑक्साइड का उपयोग किया जाता है। इसके अलावा श्वसन क्रिया में बनी कार्बन डाईऑक्साइड भी इसी में खप जाती है। इसलिए कुल मिलाकर लगता है कि दिन में पौधे कार्बन डाईऑक्साइड लेकर ऑक्सीजन छोड़ते हैं। वैसे ध्यान दें कि स्टोमेटा में से जो हवा अन्दर जाती है उसमें भी 20 प्रतिशत ऑक्सीजन, 79 प्रतिशत नाइट्रोजन और अल्प मात्रा में कार्बन डाईऑक्साइड व अन्य गैसें होती हैं। स्टोमेटा से बाहर आने वाली हवा में कार्बन डाईऑक्साइड नहीं होती जबकि ऑक्सीजन की मात्रा बढ़ जाती है और नाइट्रोजन उतनी ही रहती है।

पत्तियों में प्रकाश संश्लेषण: सूरज की रोशनी में पत्तियाँ अपने भीतर मौजूद कार्बन डाइऑक्साइड और पानी को लेकर प्रकाश संश्लेषण की क्रिया शु डिग्री करती हैं जिसके परिणाम स्वरूप शर्करा बनने लगती है और ऑक्सीजन पत्तियों से बाहर निकलती है। 

दिन के समय भी श्वसन तो बदस्तूर जारी रहता है और इस क्रिया में कार्बन डाईऑक्साइड पैदा होती है। मगर होता यह है कि श्वसन में उत्पन्न कार्बन डाईऑक्साइड का उपयोग प्रकाश संश्लेषण की क्रिया में कर लिया जाता है। लिहाज़ा दिन के समय पत्तियों से नेट ऑक्सीजन बाहर निकलती है।

अब आई रात। प्रकाश संश्लेषण तो हो गया बन्द, मगर श्वसन चलता रहा। यानी रात को ऑक्सीजन निर्माण नहीं हो रहा है। श्वसन के कारण ऑक्सीजन खर्च हो रही है और कार्बन डाईऑक्साइड बन रही है। दिन का टाइम होता, तो इस कार्बन डाई-ऑक्साइड का उपयोग हो जाता मगर ये न थी हमारी किस्मत।

यानी पौधे रात में कार्बन डाई-ऑक्साइड छोड़ेंगे। और मनुष्य सहित सारे प्राणी तो दिन में यही कर रहे थे और रात में भी यही करेंगे। इसके आधार पर कहा जाता है कि रात में यदि आप पेड़ के नीचे सोए, तो आपकी खैर नहीं क्योंकि रात में आपको ऑक्सीजन के लिए पेड़ के साथ प्रतिस्पर्धा करनी होगी। साथ ही, पेड़ जो कार्बन डाईऑक्साइड छोड़ेगा वह आपके फेफड़ों में घुस जाएगी और आपका दम घोट देगी। इसे मेरा एक मित्र मनोहर झाला बहुत ही रोचक ढंग से बयान किया करता था। वह कहता था कि रात में पेड़ भी ऑक्सीजन खींच रहे हैं और आप भी। अब पेड़ तो इतना बड़ा है, इसलिए उसकी ऑक्सीजन खींचने की ताकत भी बहुत ज़्यादा है। तो वह आसपास की हवा की सारी ऑक्सीजन खींच लेगा। जब हवा में ऑक्सीजन खत्म हो जाएगी, तो वह आपके फेफड़ों के अन्दर से भी ऑक्सीजन खींचेगा। ऑक्सीजन के साथ-साथ फेफड़े भी खिंचकर बाहर आ जाएँगे - ठीक उसी तरह जैसे किसी थैली को खाली करते वक्त हम उसे उलट देते हैं - और आप खींचे जाकर फेफड़ों के ज़रिए पेड़ पर चिपक जाएँगे।

पेड़ बनाम कमरा
हकीकत इससे कहीं अधिक रोचक है। पेड़ हालाँकि बहुत बड़े होते हैं मगर प्राणियों और पेड़-पौधों का एक अन्तर बच्चा-बच्चा जानता है। पेड़-पौधे चलते-फिरते नहीं, हिलते-डुलते नहीं। इसलिए उनकी ऊर्जा की ज़रूरत प्राणियों की अपेक्षा बहुत कम होती है। इस वजह से उनकी श्वसन दर भी बहुत कम होती है। एक मनुष्य औसतन प्रतिदिन करीब 500 ग्राम कार्बन डाई-ऑक्साइड छोड़ता है। यह दिन भर का औसत है, यदि दिन और रात को अलग-अलग करके देखेंगे तो रात में कम कार्बन डाईऑक्साइड छोड़ी जाएगी क्योंकि उस समय अधिकांश मनुष्य सोते हैं और उनकी श्वसन दर काफी धीमी हो जाती है। सम्भवत: रात भर में मनुष्य करीब 100-150 ग्राम कार्बन डाईऑक्साइड छोड़ेगा। पेड़ों की श्वसन दर निकालना मुश्किल काम है। फिर भी मोटे तौर पर 10 टन वज़न का एक बड़ा पेड़ रात भर में करीब 10 ग्राम कार्बन डाईऑक्साइड छोड़ेगा

अब आसानी से देखा जा सकता है कि एक पेड़ के नीचे सोने एवं एक और व्यक्ति के साथ कमरे में सोने के बीच क्या अन्तर है। ज़ाहिर है, एक और व्यक्ति के साथ सोना ज़्यादा घातक साबित हो सकता है। पेड़ के नीचे सोने के खतरे की बात एक और कारण से भी बेतुकी है। किसी भी स्थान की हवा को एक स्थिर आयतन मानना कदापि ठीक नहीं है। आपके आसपास की हवा लगातार बदलती रहती है। खास तौर से तब जब आप खुले में सो रहे हैं। इतने सारे पक्षी, प्राणी पेड़ों पर ही रहते हैं। यदि वे सब ऑक्सीजन के लिए पेड़ों से प्रतिस्पर्धा करें तो उपरोक्त अधकचरे तर्क के आधार पर सब के सब, रातों रात मर जाने चाहिए। इसी प्रकार से, जाड़े के दिनों में ट्रेन के किसी खचाखच भरे डिब्बे में हमें किसी के बचने की उम्मीद नहीं करनी चाहिए क्योंकि जाड़ों में खिड़कियाँ तो सारी बन्द रहती हैं।

पेड़ के नीचे सोने का खतरा, दरअसल, अधूरी वैज्ञानिक जानकारी के अधकचरे उपयोग का नतीजा है। जो खतरे हो सकते हैं, उनमें पेड़ की शाखा का गिरना और किसी पक्षी द्वारा बीट किया जाना वगैरह गिनाए जा सकते हैं। और इनका सम्बन्ध ऑक्सीजन से कदापि नहीं है।


सुशील जोशी: एकलव्य द्वारा संचालित स्रोत फीचर सेवा से जुड़े हैं। विज्ञान शिक्षण व लेखन में गहरी रुचि।
यह लेख स्रोत फीचर्स के अंक जून, 2013 से लिया गया है।