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चकमक का यह अंक जनवरी-फरवरी का संयुक्तांक है। 

सम्पादकीय – विनता विश्वनाथन

चकमक को बधाई – प्रेमपाल शर्मा

ढोंगी लड़ैया - प्रस्तुति: मनोज साहू ‘निडर’
चित्र: कैरन हेडॉक
एक बुन्देलखण्डी लोककथा कॉमिक फॉरमैट में। एक लड़ैया की सरपंची की कहानी। 

मीठा खाने का मस्तिष्क पर प्रभाव
मीठा खाना हम सबको पसन्द है। मीठा खाने से खुद को रोक पाना इतना कठिन होता है कि मानो मस्तिष्क को मीठा खाने के लिए प्रोग्राम किया गया हो। लेकिन क्या चीनी का अत्याधिक सेवन मस्तिष्क पर कोई नकारात्मक प्रभाव डालता है? पढ़कर जानो। 

बाघ आया उस रात – नागार्जुन
चित्र: अनाम, आनन्द निकेतन स्कूल, सेवाग्राम, वर्धा, महाराष्ट्र
“वो इधर से निकला
उधर चला गया”
वो आँखें फैलाकर
बतला रहा था-
“हाँ बाबा, बाघ आया उस रात,
आप रात को बाहर न निकलो!
जाने कब बाघ फिर से बाहर निकल जाए!”...

रेवा – प्रभात
चित्र: नीलेश गहलोत
रेवा छठवीं में पढ़ती थी और पलाश आठवीं में। घर की परिस्थितियाँ कुछ ऐसी बन जाती हैं कि रेवा के परिवार को मकान बदलना पड़ता है। पलाश उसे रोज़ ढूँढता है, स्कूल का रास्ता तक बदल देता है। आखिर एक दिन रेवा उसे मिल जाती है लेकिन... 

 तुम भी बनाओ - हेलीकॉप्टर
इस बार सीखेंगे आसान-सा एक हेलीकॉप्टर बनाना।

तेरा तुझको अर्पण – रोहन चक्रवर्ती
देखोगे तो हँसोगे, लेकिन दो सैकण्ड के लिए रुककर ध्यान से पढ़ोगे तो सोच में पड़ जाओगे।

 दादी-नानी क्यों होती हैं – सुशील जोशी
इस लेख का शीर्षक ही अपनेआप में एक काफी बड़ा सवाल है। क्या तुमने कभी सोचा है कि हमारे व अन्य जीवों के जीवन में दादी-नानी की क्या भूमिका होती है। 

 एक बौना लिपिक – सी एन सुब्रह्मण्यम्
कर्नाटक के मैसूर शहर के पास कावेरी नदी के तट पर सोमनाथपुर का प्रसिद्ध मन्दिर है। इस मन्दिर की सैर करते समय लेखक ने देखा कि मन्दिर के शिखर के एक स्तर पर कई मोटे बौने बने हुए थे। कोई नाच रहा था, कोई बीन बजा रहा था और एक कुछ लिख रहा था...  

प्यारे भाई रामसहाय – स्वयं प्रकाश
चित्र: जोएल गिल
स्वयं प्रकाश जी की याद में चकमक में छपी उनकी एक कहानी हम यहाँ फिर दे रहे हैं। 

 दर्दनाक दवाएँ किस तरह काम करती हैं – प्रनन्दिता बिस्वास
दर्द हमारे जीवित रहने के लिए बहुत ज़रूरी चीज़ है। दर्द इस बात का संकेत होता है कि हमारे शरीर में कुछ खतरनाक चीज़ हो रही है, जिसे रोकने की हमें कोशिश करनी चाहिए। लेकिन हम अकसर दर्द को रोकने या कम करने के लिए दवाइयाँ लेते हैं। ये दवाएँ कैसे काम करती हैं इस लेख से जान सकते हैं। 

 चिड़ियों के झुण्ड – वीरेन्द्र दुबे
चित्र: हबीब अली
सर्दी की एक सुबह कुछ मेहमानों के नाम।

विशाल घास – नेचर कॉन्ज़र्वेशन फाउंडेशन
घास का मतलब अकसर हम अपने घुटने से नीचे ही समझते हैं। लेकिन कुछ घास हमसे कई गुना बड़ी होती हैं। कौन-सी? इस खास घास के बारे में कुछ बातें। 

क्यों-क्यों
इस बार का क्यों-क्यों का सवाल था कि बच्चों को अपने निर्णय लेने की स्वतंत्रता मिलनी चाहिए या नहीं, और क्यों? कई दोस्तों ने अपने जवाब भेजे जिनमें से कुछ यहाँ तुम्हारे साथ साझा कर रहे हैं।
इस बार हमने कुछ बड़ों से भी यह सवाल किया। बड़ों के कुछ लम्बे जवाब...

समानता व बन्धुता के बिना स्वतंत्रता बेमतलब – झरना साहू
टीचर, कक्षा 5, शहीद स्कूल, रायपुर, छत्तीसगढ़

एक बच्ची ने तय किया – रश्मि पालीवाल
लम्बे समय तक एकलव्य के सामाजिक अध्ययन कार्यक्रम से जुड़ी रही हैं।

बाल अधिकार क्या हैं? – आर पद्मिनी
लगभग 25 साल UNICEF के साथ काम, अब बेंगलुरु के चाइल्ड राइट्स ट्रस्ट के साथ हैं।

आज़ादी – इसके मायने हैं क्या? – अंजलि नरोना
स्कूल, राज्य व राष्ट्रीय स्तर पर विद्यार्थियों और शिक्षकों के लिए पाठ्यचर्या, सामग्री व प्रणालियाँ विकसित करने का 35 साल से भी अधिक का अनुभव है। कुछ सालों तक वह चकमक की सम्पादकीय समूह का हिस्सा भी रहीं। हाल ही में एकलव्य से सेवानिवृत्त हुई हैं। 

कितनी स्वतंत्रता है बच्चों को? – निधि गुलाटी
दिल्ली विश्वविद्यालय, शिक्षा विभाग में शिक्षक व शोधकर्ता हैं। 

पृथ्वी का चक्कर – राजेश जोशी
चित्र: लोकेश खोड़के
यह पृथ्वी सुबह के उजाले पर टिकी है
और रात के अँधेरे पर... 

दादाजी का कोट – पवन चौहान
चित्र: शुभम बंसल
दादाजी का काला को
बहुत पुराना आउट ऑफ डेट
इसमें नहीं समाता अब
दादाजी का फूला पेट...

तुम भी जानो
ऑस्ट्रेलिया की भयावह आग के बारे में कुछ जानकारी।

भूलभुलैया
मुर्गे को अपने बच्चे तक पहुँचाने में ज़रा मदद तो करना।

ग्रीनिश वॉर्बलर
चित्र: रोहन चक्रवर्ती
कुछ अनोखी बातें ‘द ग्रीनिश वॉर्बलर’ नामक इक नन्ही-सी चिड़िया के बारे में।

ये सारा उजाला... – सुशील शुक्ल
चित्र: रवीन्द्रनाथ टैगोर
ये सारा उजाला सूरज का
सब देखाभाला सूरज का
दिन की इक चाबी सूरज की
और रात का ताला सूरज का...

 म्याऊँ-म्याऊँ – कनक शशि
गुठली, दीदी-भैया और छोटे मामा एक ही छत के नीचे? कुछ तो खिचड़ी पकनी ही थी! या फिर यूँ कहें स्पेशल चिकन करी पकनी ही थी।

>डायनासौर को भी जूं होती थी
इन्सानों के लिए बालों में जूं होना अपनेआप में काफी बड़ी समस्या है। लेकिन क्या तुम्हें पता है कि डायनासौर को भी इस समस्या का सामना करना पड़ा था।

 मेरा पन्ना
रंग-बिरंगे अनोखे चित्र, रोचक कहानियाँ व लेख और साथ में मज़ेदार कविताएँ भी।

पानीपूरी – इकरा सिद्दीकी
चित्र: शुभम लखेरा
मुझे पसन्द है पानीपूरी
तुम्हें पसन्द है पानीपूरी
सबको पसन्द है पानीपूरी...

चाय पीने आया एक नया दोस्त – निधि सक्सेना
चित्र: निहारिका शेनॉय
लारा और कारा दो गहरे दोस्तों के बीच नए दोस्त की दस्तक।

 खुले में शौच की समस्या – उमा सुधीर
सरकार कई वर्षों से खुले में शौच करने पर रोक लगाने की कोशिश कर रही है। हम अकसर इस मुद्दे के ऊपर कई विज्ञापन भी देखते हैं। हाल ही में एक फिल्म भी बनी है। क्यों न इस समस्या को थोड़ी और गहराई से समझा जाए।

 किताबें कुछ कहती हैं - पुस्तक समीक्षा
कुछ दोस्तों ने उनकी मनपसन्द किताबों की समीक्षा की और हमें लिख भेजा कि उन्हें क्या पसन्द आया और क्या नहीं। इनमें से कुछ हम तुम्हारे साथ साझा कर रहे हैं।

सिर का सालन – मोहम्मद खदीरबाबू
चित्र: गुलाम मोहम्मद शेख
एकलव्य की किताब सिर का सालन की कहानी अपनेआप में काफी अलग है। सिर का सालन यूँ तो स्वादिष्ट भोजन है लेकिन गुलाम मोहम्मद शेख की यह कहानी उसे और भी खूबसूरत बना देती हैं।

मेरा डायरी का एक पन्ना – सजिता नायर
चित्र: निहारिका दाईफोड़े, छह साल, गरवारे बाल भवन, पुणे, महाराष्ट्र
हमारे जीवन में कुछ न कुछ ऐसा होता रहता है जिसे हम कहीं न कहीं याद के तौर पर दर्ज कर देते हैं। कुछ अच्छी यादें होती हैं तो कुछ बुरी यादें। कोई इसे अपने दिमाग के किसी एक कोने में दर्ज कर देता है तो कोई डायरी में। सजिता ने अपनी ऐसी ही कुछ यादें अपनी डायरी में दर्ज करी हैं जिसका एक पन्ना वो तुम्हारे साथ साझा कर रही है। 

इन्हीं गलियों में... – सुशील शुक्ल
चित्र: कनक शशि
दिखने में कई गलियाँ भले ही लगभग एक जैसी हों लेकिन नज़ारे हर गली के अलग होते हैं। इस लेख में सुशील शुक्ल अपने दफ्तर के पास की गलियों के नज़ारे के बारे में बात कर रहे हैं।

हम कागज़ नहीं दिखाएँगे – विनता विश्वनाथन
चित्र: अनार्या
सीएए क्या है? एनआरसी क्या है? एनपीआर क्या है? शाहीन बाग़ में भला इतनी सारी औरतें क्यों सड़क पर आ निकली हैं? इन सारे सवालों का जवाब इस लेख में देने की कोशिश की गई है।

 एक सुबह – शशि सबलोक
चित्र: हबीब अली
कई बार हम ऐसे नज़ारे देखते हैं जिन्हें देखकर लगता है मानो वह दुनिया का सबसे खूबसूरत नज़ारा हो। उस दिन भीड़ से भरी सड़क के किनारे उसने भी कुछ ऐसा ही नज़ारा देखा। वह नज़ारा क्या था यह तो कहानी पढ़कर ही पता चलेगा।

 कितनी दुनिया – लोकेश मालती प्रकाश
चित्र: प्रिया कुरियन
कितने लोग सो रहे ट्रेन में
क्या सभी देख रहे सपने...

 तुम भी जानो
एक तारे की मौत और एक ऐसी किताब जिसे आज तक कोई पढ़ नहीं पाया।

 माथापच्ची
चार पन्ने मज़ेदार सवालों और पहेलियों से भरे हुए।

तुम भी बनाओ – लूप ग्लाइडर
पहले बनाया हेलीकॉप्टर, अब बनाते हैं बिना इंजन का हवाईजहाज़। सुनने में भले ही मुश्किल लगे, लेकिन है एकदम ही आसान।

चित्रपहेली
रंग-बिरंगी मज़ेदार चित्रपहेली इस बार की। चित्रों को देखो और शब्दों को पहचानो।