सुमित त्रिपाठी                                                                                                                                      [Hindi PDF, 131 kB]

पिछले अंक में आपने डिगर ततैया और टैरंटुला मकड़ी के बारे में एक लेख पढ़ा था। इस सिलसिले को आगे बढ़ाते हुए ततैया की एक अन्य प्रजाति और कॉकरोच के बीच ऐसे ही एक सम्बन्ध की गहराई से पड़ताल की जा रही है।


कई बरस पहले जब हम बच्चे ही थे, हम दोस्तों ने एक अजीबो-गरीब घटना देखी। हमने देखा कि एक हरे-चमकीले रंग की ततैया एक बड़े-से कॉकरोच को खींच-खींच कर लिए जा रही है। चमकीले हरे-नीले रंग वाली इस ततैया को शायद आपने देखा हो। इसका वैज्ञानिक नाम एम्प्यूलेक्स कम्प्रेसा है और आम तौर पर इसे एमेरल्ड ततैया भी कहते हैं। वर्गीकरण के हिसाब से यह क्लास इंसेक्टा के ऑर्डर हाय-मेनोप्टेरा की सदस्य है। यह दक्षिण एशिया, अफ्रीका व प्रशान्त महासागर के द्वीपों में पाई जाती है और कॉलोनी या झुण्ड में रहने की बजाय एकाकी जीवन व्यतीत करती है।
खैर, किस्से पर वापस आते हैं। चूँकि, यह ततैया कॉकरोच से काफी छोटी थी इसलिए हमें खासा अचरज हुआ। पहले तो हमें लगा कि शायद कॉकरोच मरा हुआ हो या फिर ततैया ने डंक मारकर उसे सुन्न या बेहोश कर दिया होगा, पर ऐसा नहीं था। कॉकरोच अपने एंटिने हिला रहा था, उसके पैर चल रहे थे। ततैया ने उसे मुँह के पास अपने जबड़ों से पकड़ रखा था और उसे खींच-खींच कर आगे चला रही थी।

कॉकरोच बना बोका

कुछ देर बाद ततैया कॉकरोच को छोड़कर उड़ गई। हमें लगा कि अब तो कॉकरोच को मौका मिल गया है, अब वह भाग जाएगा। पर हैरत की बात यह थी कि कॉकरोच वहीं रुका रहा, उसने भागने की कोई कोशिश नहीं की। उस समय भी कॉकरोच पूरी तरह सजग दिख रहा था, वह अपने पैर और एंटिने चला रहा था। कुछ ही देर में वह पलट भी गया और अपने पैर तेज़ी से चलाने लगा, जैसा कि कॉकरोच और बहुत-से कीड़े पलट जाने पर करते हैं यानी वह हर तरह से एक सामान्य कॉकरोच लग रहा था। आश्चर्य की बात यह थी कि इसके बावजूद वह चल या भाग नहीं रहा था! हमने उसे भगाने की कोशिश भी की, पर कोई फायदा नहीं हुआ। कुछ देर में ततैया वापस आई और फिर उसे मुँह से पकड़कर ले जाने लगी जैसे लगाम पकड़कर घोड़े को ले जाते हैं। हम बच्चों ने जासूसों की तरह ततैया और कॉकरोच का पीछा किया। इस बीच ततैया कई बार कॉकरोच को छोड़कर उड़ गई और कॉकरोच ततैया के वापस आने तक वहीं ठहरा रहा। इस तरह ततैया कॉकरोच को खींचकर हमारी तिमंज़िला इमारत की पहली मंज़िल तक चढ़ा ले गई (सीढ़ियों से नहीं, सीधा बाहरी दीवार पर चढ़ाई करके)। इमारत का बाहरी पलस्तर मोटा और बीच-बीच से टूटा हुआ था। अन्त में, ततैया कॉकरोच को उन्हीं दरारों के भीतर खींच ले गई। इस सारे घटनाक्रम में सबसे ज़्यादा हैरत वाली बात थी - कॉकरोच का व्यवहार। ऐसा लगता था कि उसे सम्मोहित कर दिया गया हो। किसी ने कहा कि ततैया मन्तर फूँक के कॉकरोच को बोका (बेवकूफ) बना देती है, तो किसी ने कहा कि कॉकरोच का ‘माथा फेल’ हो गया है।

‘संदर्भ’ के पिछले अंक में डिगर ततैया और मकड़ी के बीच होने वाली घटना को पढ़कर, वर्षों पुरानी यह बात याद आ गई। फिर किताबों को छाना, कुछेक पर्चे पढ़े, इंटरनेट पर ढूँढ़ा। जो जानकारी मिली उसे यहाँ रख रहा हूँ।

ततैया का जीवन चक्र

ततैयों की ढेर सारी जातियों की तरह एम्प्यूलेक्स कम्प्रेसा एक परजीव्याभ (parasitoid) है। परजीव्याभ उन्हें कहते हैं जो अपने जीवन चक्र का कुछ भाग मेज़बान में बिताते हैं और अन्तत: उन्हें मार डालते हैं और अकसर खा जाते हैं। ये परजीवियों से अलग होते हैं। परजीवी अपने मेज़बान से फायदे लेता है, जीवन-तंत्र को कमज़ोर भी करता है पर सीधा उसकी मृत्यु का कारण नहीं बनता।
एम्प्यूलेक्स कम्प्रेसा अपना प्रजनन चक्र पूरा करने के लिए कॉकरोच की एक खास प्रजाति पेरीप्लैनेटा अमेरिकाना (Periplaneta americana) का प्रयोग करती है। उसका लार्वा इस कॉकरोच को खाकर पोषण और वृद्धि प्राप्त करता है। मादा ततैया जो अण्डे देने के लिए तैयार हो, कॉकरोच की तलाश करती है। कॉकरोच को वश में करने के लिए ततैया उसे दो बार डंक मारकर अपना विष उसके शरीर में पहुँचाती है। पहला डंक वह कॉकरोच के पहले वक्षीय गैंग्लियान1 (थोरैसिक गैंग्लियान) में मारती है। इसके कारण दो से तीन मिनटों के लिए कॉकरोच के अगले पैर निष्क्रिय हो जाते हैं। यह कुछ अस्थाई लकवे जैसा होता है। अगले पैरों को विष से निष्क्रिय करके ततैया अपना मुख्य काम करती है। ततैया अपने डंक को कॉकरोच के सिर वाले हिस्से में डालती है और उसे कॉकरोच केकेन्द्रीय तंत्रिका तंत्र के दो खास हिस्सों - सब-ईसोफेजियल गैंग्लियान (sub-esophageal ganglion) और मस्तिष्क में पहुँचा कर अपना विष उसमें प्रविष्ट करा देती है। कॉकरोच का ऊपरी शरीर एक कड़े बहिर्कंकाल से ढका होता है लेकिन पेरीप्लैनेटा अमेरिकाना नाम की जिस कॉकरोच प्रजाति को एम्प्यूलेक्स कम्प्रेसा अपना निशाना बनाती है उसके सिर और धड़ के बीच इस बहिर्कंकाल में जोड़ होता है और यहीं से ततैया अपना दंश अन्दर घुसाकर सिर में स्थित तंत्रिकाओं तक पहुँचाती है।

वहाँ पहुँचकर यह विष ऑक्टोपामाइन नाम के न्यूरोट्रांसमीटर2 को बाधित कर देता है। इसका परिणाम यह होता है कि कॉकरोच में स्वयं की इच्छा से चलने की क्षमता नहीं रह जाती। यह इसलिए होता है क्योंकि ऑक्टोपामाइन चलने की जटिल प्रक्रिया को क्रियान्वित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। इसीलिए ततैया द्वारा खींचकर चलाए जाने पर तो कॉकरोच चलता है पर वह खुद से चलना शुरू करने में सक्षम नहीं होता और खतरा देखकर भाग निकलने की प्रवृत्ति जिसे पलायन-वृत्ति कहते हैं, उसका भी प्रदर्शन नहीं करता।
इसके बाद एमेरल्ड ततैया कॉकरोच को पहले से चुनी गई एक बिलनुमा जगह पर ले जाती है और उसके पेट पर एक अण्डा देती है। फिर वह उस बिल को मिट्टी, कंकड़ आदि से ढाँककर बाहर उड़ जाती है। यह ढाँक-तोप वह इसलिए करती है कि कोई दूसरा जीव कॉकरोच को न खा जाए और उसका अण्डा सुरक्षित बना रहे।

कॉकरोच को गुलाम बनाना और गुलामी से मुक्त करना


ततैया द्वारा कॉकरोच के दिमाग पर दिए एक डंक की वजह से सरपट दौड़ने और बीच-बीच में उड़ान भरने वाले कॉकरोच का व्यवहार एकदम बदला हुआ दिखता है। बेन गुरान विश्वविद्यालय, इस्राइल के शोधकर्ता फेडरिख लिबरसेट इस व्यवहार को गुलामी कहते हैं।
फेडरिख लिबरसेट और उनकी टीम ततैया की विविध प्रजातियों द्वारा उपयोग में लाई जा रही न्यूरोलॉजिकल युक्तियों का अध्ययन कर रही है।

लिबरसेट और उनके साथियों के प्रयोगों के परिणाम ‘जर्नल ऑफ एक्सपेरिमेंटल बायोलॉजी’ में प्रकाशित हुए हैं। लिबरसेट का मत है कि ज़हर कॉकरोच के न्यूरोट्रांसमीटर - ऑक्टोपामाइन को ब्लॉक करता है। यह न्यूरोट्रांसमीटर टाँगों को चलाने जैसी जटिल क्रिया को संचालित करता है।
लिबरसेट की टीम ने अपने प्रयोग को आगे बढ़ाया। उन्होंने डंक खाए हुए कॉकरोच (जो ऑक्टोपामाइन ज़हर से प्रभावित हो चुका था) के केन्द्रीय तंत्रिका तंत्र में, प्रतिविष का एक डोज़ दिया। जल्द ही परिणाम सामने आया, कॉकरोच पहले की तरह सक्रिय हो गया यानी अब वह गुलामी से मुक्त हुआ। इससे शोधकर्ताओं ने निष्कर्ष निकाला कि ततैया का ज़हर सम्भवत: इन रिसेप्टर को ब्लॉक करता है।

इस शोध के एक अन्य प्रयोग में तन्दुरुस्त कॉकरोच को ज़हर से मिलता-जुलता रसायनिक यौगिक दिया गया। यह यौगिक भी कॉकरोच के रिसेप्टर को ब्लॉक कर देता है और वही प्रभाव दिखता है जो ततैया के डंक मारने पर दिखाई देता है।
--संकलित

इस अण्डे से निकलने वाला लार्वा कॉकरोच के शरीर में छेद कर उसके भीतर चला जाता है। ध्यान रहे कि यह एक ज़िन्दा कॉकरोच है जो विष के असर से निष्क्रिय है। अब यह लार्वा एक खास क्रम में कॉकरोच के अंगों को खाता है, ऐसे क्रम में कि कॉकरोच मरे नहीं। यह सिलसिला कोई आठ दिन तक चलता है और लार्वा ज़िन्दा कॉकरोच को खाते हुए वृद्धि करता है। उसके बाद वह प्यूपा में बदलकर स्वयं को एक कोकून में बन्द कर लेता है, इस समय भी कोकून कॉकरोच के भीतर ही होता है, पर असल में अब वह सिर्फ एक मृत कॉकरोच का खोखला खोल है। कोई चार हफ्तों के बाद इस खोल को फाड़कर एक नई एमेरल्ड ततैया निकलती है।

ततैया-मकड़ी जैसे और भी कई

ततैयों की कई जातियाँ हैं जो कि परजीव्याभ जीवनशैली पर निर्भर हैं, इनके मेज़बान भी अलग-अलग होते हैं। कॉकरोच के अलावा मकड़ियों की भी कई भिन्न प्रजातियाँ हैं जो मेज़बान की भूमिका में होती हैं। ततैया की एक प्रजाति तो अपने डंक के ज़रिए सीधे अपने अण्डे को एफिड (पौधों में पाई जाने वाली एक कृमि जिसे प्लांट लाइस भी कहते हैं) के शरीर में पहुँचा देती है, कुछ ऐसे जैसे द्रुत गति के इंजेक्शन से अण्डा भीतर पहुँचा दिया गया हो। यानी मेज़बान को पकड़ने, निष्क्रिय करने की कोई जद्दोजेहद नहीं।

इस पूरे किस्से में कुछ बातें ध्यान देने योग्य हैं। पहली, ततैया के विष का प्रभाव। साँप, बिच्छू, मकड़ी, कीट, घोंघे आदि कई जीव अपना शिकार पकड़ने के लिए विष का प्रयोग करते हैं। इनमें से ज़्यादातर के विष पेशीतंत्रिका जंक्शन (neuromuscular junctions) को प्रभावित करते हैं जिससे मांसपेशियों का संकुचन बाधित होता है और शिकार लकवे जैसी स्थिति में पहुँचकर अवश हो जाता है। पर एमेरल्ड ततैया का विष कॉकरोच के केन्द्रीय तंत्रिका तंत्र को प्रभावित कर उसके व्यवहार को परिवर्तित करता है। इसी व्यवहार परिवर्तन के कारण कॉकरोच भागता नहीं है। दूसरी बात यह कि ततैया अपना डंक हमेशा कॉकरोच के तंत्रिका तंत्र में खास चुने हुए स्थानों -- वक्षीय गैंग्लियान और सब-ईसोफेजियल गैंग्लियान पर मारती है। वैज्ञानिकों का मानना है कि यह अचूक विशिष्टता उसे सीखनी नहीं पड़ती। खास गैंग्लियान तक पहुँचकर अपना विष उनमें पहुँचाने का गुण, इस ततैया में जन्मजात होता है।

वैसे अपने मेज़बान के केन्द्रीय तंत्रिका तंत्र को प्रभावित कर उसके व्यवहार में परिवर्तन का यह एकमात्र उदाहरण नहीं है। हेयर वर्म की एक प्रजाति टिड्डे के शरीर में बढ़ती है। जब अपने प्रजनन के लिए वयस्क हेयर वर्म को पानी में जाने की ज़रूरत होती है तो उसका मेज़बान टिड्डा खुद-ब-खुद पानी में छलांग लगा देता है। हेयर वर्म टिड्डे के शरीर से निकलकर पानी में आ जाता है और टिड्डा डूबकर मारा जाता है। कई वैज्ञानिकों का मानना है कि हेयर वर्म द्वारा छोड़े गए कुछ रसायन टिड्डे के केन्द्रीय तंत्रिका तंत्र को प्रभावित कर उसे इस तरह आत्महत्या करने को प्रेरित करते हैं।


सुमित त्रिपाठी: प्रकाशन समूह, एकलव्य में कार्यरत हैं।

लेख के लिए स्रोत सामग्री:
1. Libersat Frederic, Rosenberg Lior Ann, Haspel Gal, Direct Injection of Venom by a Predatory Wasp into Cockroach Brain, Journal of Neurobiology (2003), Vol: 56, Issue: 3
2. Zimmer Carl, Parasite Rex, Touchstone, 2001