पारुल सोनी

दीमक का नाम सुनते ही लोगों के मन में नाज़ुक-सी शारीरिक रचना लेकिन विध्वंसक काम को अंजाम देने वाले जीव की तस्वीर सामने आ जाती है। बदकिस्मती से इन कोमल शरीर वाले कीटों की नकारात्मक छवि बनी हुई है। मगर आप इनकी खूबियों पर गौर करें तो पाएँगे कि ये आला दर्ज़े की वास्तुकार हैं।
यहाँ हम अफ्रीकी दीमक, मेक्रोटर्मीस बेलीकोसस के बारे में बात करेंगे जो सच में एक विस्मयकारी जीव है। ये टर्मीटिडी कुल और मेक्रोटर्मीटिनी उपकुल की सदस्य हैं। ये दीमक अफ्रीका के सब-सहारा क्षेत्र (सहारा का दक्षिणी भाग), घास के मैदानों (सवाना) और नम जंगलों में पाई जाती हैं और इनकी खासियत है - वातानुकूलित सामुदायिक आवास बनाने में दक्षता।

चूँकि इन दीमकों की मौजूदगी का पर्यावरण पर सकारात्मक असर होता है इसलिए अफ्रीकी लोग इन दीमकों का हमेशा स्वागत करते हैं। ये दीमक निर्जीव (सड़ी) लकड़ी को खाती हैं और उर्वरीकरण के लिए आवश्यक सामग्री को छोटे टुकड़ों में बाँट देती हैं जो दीमक के मल और लार के रूप में बाहर आते हैं।

टीले का निर्माण और बनावट
दीमक का आवास टीले की शक्ल में होता है जहाँ वे अपने पूरे समूह के साथ रहती हैं। टीलों को ये अपनी सुविधा और ज़रूरत, दोनों के अनुरूप बनाती हैं।
मेक्रोटर्मीस बेलीकोसस अपने टीले का निर्माण कुछ इस तरह से करती हैं कि टीले के अन्दर की ऊष्मा और तापमान का नियंत्रण किया जा सके। मेक्रोटर्मीस बेलीकोसस की इस अद्भुत क्षमता पर बहुत-से अध्ययन हुए हैं। सबसे पहले मैं आपको बता दूँ कि अफ्रीकी दीमक के टीलों के अन्दर के मुख्य हिस्सों का तापमान 31-31.6 डिग्री सेल्सियस के बीच ही बना रहता है फिर चाहे मौसम सर्दी का हो या अत्यधिक गर्मी का। यह इनकी अद्भुत कारीगरी का नमूना है।

एक परिपक्व टीले का अन्दरूनी भाग हमेशा एक निश्चित योजना के अनुसार ही बना होता है जिसमें एक या एक से ज़्यादा प्रजनन केन्द्र होते हैं जहाँ से मुख्य कक्ष के लिए बहुत-से मार्ग जाते हैं। इन मुख्य कक्ष में खाना, पानी और टीले के निर्माण के लिए ज़रूरी सभी तरह के मिट्टी के कण (जैसे मोटी रेत, महीन रेत, तलछट (silt), चिकनी मिट्टी, ऑर्गेनिक कार्बन) इकट्ठे किए जाते हैं।

दीमक हमेशा नमी वाले गड्ढे के ऊपर मिट्टी से निर्माण करते हैं। वो ज़मीन के जलस्तर तक कम-से-कम दो लम्बी सुरंग खोदती हैं और फिर 3 मीटर चौड़े तलकक्ष का निर्माण करती हैं। यह लगभग 1 मीटर गहरा होता है जिसके बीच में एक मोटा स्तम्भ होता है जो टीले के मुख्य भाग को सहारा देता है। इसमें रानी रहती है और यहीं पर बागवानी और फफूँद की खेती होती है। तलकक्ष की भीतरी छत पर पतली, वृत्ताकार संघनन (condensation) नली होती हैं और टीले के चारों तरफ वायुसंचालन के लिए दरारें होती हैं। हवा टीले के निचले भाग से अन्दर जाती है और ऊपरी भाग से बाहर निकलती है जिससे अन्दर के वातावरण में हमेशा ताज़गी बनी रहती है और ऑक्सीजन की पूर्ति भी होती रहती है।

अफ्रीका के विभिन्न क्षेत्रों में पाए जाने के कारण इन दीमकों के टीलों की संरचना में भी भिन्नता होती है।
सहारा और घास के मैदान होने के कारण बाहरी तापमान में बहुत उतार-चढ़ाव आ सकते हैं (जैसे रात में -1 डिग्री सेल्सियस से नीचे और दिन में 37.7 डिग्री सेल्सियस से ऊपर)। इसलिए ठण्डी रातों के दौरान ताप-क्षति को कम करने के लिए मिट्टी की आड़ का निर्माण करके दरारें बन्द कर दी जाती हैं और सूरज निकलने के दौरान हवा की आवा-जाही को बढ़ाने के लिए दरारें पूरी तरह खोल दी जाती हैं। ऊपर खोखली मीनार - चिमनी - होती हैं जो भूतल से 6 मीटर (20 फीट) की ऊँचाई पर होती हैं। ये चिमनियाँ हवा और नमी की नियमित आवा-जाही का संचालन करती हैं। ऐसा अनुमान है कि अगर दीमकों ने ऐसा नहीं किया तो रात के वक्त टीले के अन्दर का तापमान बहुत घट जाएगा और सूरज निकलने के बाद बहुत बढ़ जाएगा। और इससे उनके भोजन निर्माण में मुश्किल हो सकती है।

दूसरी ओर, नम जंगलों की जलवायु तुलनात्मक रूप से ठण्डी होती है। इस वातावरण में मेक्रोटर्मीस बेलीकोसस के लिए ताप-क्षति को रोकना बहुत ज़रूरी होता है। इसलिए यहाँ के टीले मोटी दीवारों वाले और गुम्बद के आकार के होते हैं। इसका कारण यह है कि इस तरह के आवासों में विस्तारित नालियों का होना ज़रूरी नहीं होता क्योंकि इससे ताप-क्षति बढ़ जाएगी।

कुछ अन्य प्रजातियाँ अपने टीले को पानी और धूप से बचाने के लिए मिट्टी की छतरी से ढाँक लेती हैं। एक और दिलचस्प बात यह है कि वे सतह के नीचे से पानी इकट्ठा करती हैं और टीले के अन्दरूनी भाग में बिखरा देती हैं। इससे आश्चर्यजनक रूप से टीले का अन्दरूनी तापमान अच्छे खासे ढंग से संचालित होता है। भले ही बाहर का भाग कितना भी गर्म क्यों न हो, अन्दर का माहौल स्थिर और आरामदायक रहता है।

टीलों में कवक की खेती
चींटियों की कुछ प्रजातियाँ - सबसे प्रसिद्ध लीफकटर चींटियाँ - अपने कोष्ठ में तुरन्त उपलब्ध होने वाले खाद्य पदार्थ के रूप में फफूँद उगाती हैं। और ऐसा ही गुबरैलों की कुछ प्रजातियाँ भी करती हैं। लेकिन कोई भी कीट मेक्रोटर्मीस बेलीकोसस की तुलना में इतनी तकनीक आधारित खेती करता नहीं दिखता। मेक्रोटर्मीस बेलीकोसस का आहार टर्मीटोमायसीज़ फफूँद है। वे लकड़ी को चबाती हैं और जो भी पौष्टिक तत्व ग्रहण किए जा सकते हैं उन्हें पचा लेती हैं। बाकी बचा हुआ मल के द्वारा निकल जाता है और फफूँद की बागवानी में इस्तेमाल किया जाता है। इन दीमकों का प्राथमिक खाद्य स्रोत लकड़ी नहीं बल्कि फफूँद होती है। इन टीलों का अध्ययन करते समय पहले-पहल फफूँद की खेती के विचार को लेकर कुछ सवाल उठ खड़े हुए। कुछ लोगों का मानना था कि इस फफूँद की भूमिका टीले में वायु-संचालन में रहती होगी। गहरी जाँच-पड़ताल से यह समझ में आया कि यह कवक कुछ मेक्रोटर्माइन प्रजातियों के लिए एक महत्वपूर्ण खाद्य सहजीवी है। यह फफूँद मेक्रोटर्मीस बेलीकोसस दीमक के टीलों में ही पाई जाती है।

मेक्रोटर्मीस बेलीकोसस के टीले का एक मॉडल: मेक्रोटर्मीस दीमक के टीलों के अध्ययन के बाद टीले में तापमान को नियंत्रित करने के तरीके को समझा गया। इसके आधार पर टीले का एक मॉडल बनाकर उसमें हवा की आवा-जाही और टीले में फफूँद की खेती जैसे इलाकों को यहाँ दिखाया गया है। इस मॉडल में तीर के निशान हवा के बहाव को दिखा रहे हैं।

अफ्रीकी दीमक के मल पर फफूँद उपजती है। दीमक की पूरी बस्ती को ये खाद्य स्रोत (फफूँद) उपलब्ध हो सके इसलिए टीले में फफूँद उगाने के लिए कक्ष बने होते हैं। इस फफूँद की वृद्धि के लिए एक तयशुदा 31o-31.6o सेल्सियस तापमान की ज़रूरत होती है। नियत तापमान के बारे में एक मत है कि यह तापमान 30.5o सेल्सियस है। मेक्रोटर्मीस बेलीकोसस अपने टीलों को इतनी दक्षता से बनाती हैं कि जहाँ फफूँद उगती है वहाँ वे 31o-31.6o सेल्सियस  के बीच का एक निश्चित तापमान बनाकर रखते हैं। यह दक्षता इसलिए भी महत्वपूर्ण होती है क्योंकि फफूँद की पैदावार तभी बढ़ सकती है जब उन्हें नियत  तापमान  लगातार मिलता रहे। इसलिए दीमक के टीले की रचना के अनेक पहलू इस तापमान को एकदम ऐसा ही बनाए रखने की एक कोशिश का हिस्सा हैं।


पारुल सोनी: संदर्भ पत्रिका से सम्बद्ध।