कालू राम शर्मा

मैं काम के सिलसिले में धरमपुर इलाके की एक आश्रमशाला में पहुँचा। शिक्षकों के साथ दुआ-सलाम के दौरान एक शिक्षक ने मुझसे कहा, “एक ज़रूरी बात करनी है...।” मैंने सोचा कि हमेशा की तरह कोई व्यवस्थागत मसला होगा। मगर जब आश्रमशाला में बैठे तो शिक्षक ने कक्षा छठवीं की विज्ञान की किताब से ‘जड़, तना और पत्तियों के कार्य’ पाठ का एक प्रयोग दिखाते हुए कहा, “इस प्रयोग के बारे में बताओ।”

मैंने प्रयोग पर सरसरी नज़र डाली और पूछा, “क्या आप इस प्रयोग को करके देख पाए?” शिक्षक ने थोड़ा व्यथित होते हुए कहा, “पाठ में दी गई विधि से बच्चों के सामने प्रयोग की बात तो हो गई। सब कुछ ठीक-ठाक ही है।”

“तो फिर दिक्कत किस बात की है?” मैंने उनसे पूछा तो वे आगे बोले, “जब मैंने क्लस्टर रिसोर्स सेंटर की बैठक में यह सवाल पूछा तो वहाँ किताब के इस प्रयोग को सिर्फ पढ़ा गया। मगर मुझे दिक्कत है। चूँकि आप यहाँ आए हैं तो एक बार आप फिर से इस प्रयोग को करा देते।”

मैं अभी भी पूरी तरह नहीं समझ पाया था कि शिक्षक की मूल समस्या आखिर है क्या। मैंने प्रयोग को गम्भीरतापूर्वक पढ़ा तो लगा कि कुछ गड़बड़ तो है जिसके बारे में शिक्षक कुछ कहने की कोशिश कर रहे हैं। मैंने शिक्षक से कहा, “तो एक बार फिर से इसी प्रयोग को किताब में दिए गए तरीके से करके देख लेना चाहिए।”

पाठ्य पुस्तक में दिया प्रयोग  
दरअसल, जिस प्रयोग का ज़िक्र शिक्षक कर रहा था वह प्रकाश संश्लेषण की क्रिया में सूर्य प्रकाश की ज़रूरत को साबित करने को लेकर था। पुस्तक में दिया गया विवरण कुछ इस प्रकार है:

‘किसी मोटी पत्ती वाले पौधे का एक गमला लीजिए। चित्र में दिखाए अनुसार मोटे कागज़ की पट्टी काटकर पौधे की किसी पत्ती पर बाँध दीजिए। चार-पाँच घण्टे के बाद पट्टी बँधी पत्ती को तोड़ लीजिए। अब इस पत्ती पर आयोडीन का घोल डालें और अवलोकन करें।’

आगे कहा गया है- ‘पत्ती के कागज़ से ढँके हिस्से पर जामुनी रंग नहीं आता। जिस भाग पर सूर्य का प्रकाश पड़ता है वह भाग जामुनी हो जाता है।’ इस आधार पर कहा जा सकता है कि

-पत्ती के जिस भाग पर सूर्य प्रकाश नहीं गिर रहा है उस भाग में स्टार्च नहीं बनता। अर्थात उस भाग में प्रकाश संश्लेषण की क्रिया नहीं होती। पत्ती के जिस हिस्से को सूर्य का प्रकाश मिलता है उस भाग में स्टार्च बनता है। अर्थात् उस भाग में प्रकाश संश्लेषण की क्रिया होती है। इससे यह साबित होता है कि पत्ती में प्रकाश संश्लेषण की क्रिया के लिए सूर्य प्रकाश की उपस्थिति अनिवार्य है।’

प्रयोग को करके देखना  
इस प्रयोग को शिक्षक के साथ पढ़कर मैंने कहा,“जैसा किताब में कहा गया है उसी तरह से प्रयोग को करके देखना चाहिए।”

मैंने उनसे कहा, “सूर्य की रोशनी तो सभी पेड़-पौधों की पत्तियों पर गिर रही है। तो आप इनमें से जिस भी पत्ती को उपयुक्त समझें उसे तोड़ लाइए (हालाँकि ऐसा कोई सुझाव पाठ्य पुस्तक में नहीं दिया गया था) और किताब के कहे अनुसार जाँच कर लीजिए कि आयोडीन डालने पर पत्तियों का रंग जामुनी होता है या नहीं।” यानी हम यहाँ मानकर चल रहे थे कि सूर्य प्रकाश में मौजूद पत्तियों में स्टार्च तो होगा ही।

हम सभी जोश से भरे हुए थे, तुरन्त ही एक मोटी पत्ती तोड़कर लाई गई। किट बॉक्स में से खोजकर आयोडीन का घोल लाया गया। जब आयोडीन का घोल डाला गया तो जामुनी रंग नहीं आया। इस पर एक के बाद एक नई पत्तियाँ तोड़कर उन पर आयोडीन के घोल की बूँदें डाली गईं, मगर जामुनी रंग का कहीं अता-पता नहीं था। बल्कि हो यह रहा था कि आयोडीन तो पत्ती की बाहरी परत से ही बह जा रहा था। इसलिए हमने तय किया कि कुछ देर तक पत्ती को आयोडीन के घोल में ही डाल दिया जाए। इसके बावजूद अपेक्षित नतीजे तक नहीं पहुँचा जा सका।

मैंने शिक्षकों की ओर मुखातिब होकर कहा, “इसका मतलब है कि पत्तियों में स्टार्च नहीं बनता।” यह सुनकर शिक्षक बोले, “ऐसा कैसे हो सकता है! किताब गलत तो नहीं हो सकती।”

जाँच के नतीजे अपेक्षा अनुरूप न आने की वजह से मैंने शिक्षकों के सामने एक आशंका रखी, “कहीं ऐसा तो नहीं कि आयोडीन का घोल ही गड़बड़ हो।”

शिक्षकों को मेरी शंका ठीक लगी और वे बोले, “हाँ, ये बात भी ठीक है।”

मैंने उनसे कहा, “ऐसा करते हैं कि इस आयोडीन को किसी स्टार्च वाले अनाज पर जाँच कर देखते हैं।”

इस इलाके में धान की पैदावार खूब होती है। इसलिए यहाँ अकसर रोटियाँ भी चावल के आटे की ही बनती हैं। शिक्षकों को यह जानकारी थी कि चावल में स्टार्च खूब होता है। इसलिए शिक्षक बोले कि चावल का आटा ठीक रहेगा। तुरन्त ही आश्रमशाला की रसोई से एक बच्चा चावल का आटा ले आया। अब तक

कुछ बच्चे भी हमारी इस चर्चा में शामिल हो चुके थे। हमने चुटकी भर चावल का आटा लिया और उस पर आयोडीन की बूँदें डालीं। आटे पर जहाँ बूँद गिरी थी वहाँ गहरा नीला रंग आ गया।

“किताब में तो जामुनी रंग की बात की है मगर यहाँ तो रंग गहरा नीला आ रहा है।” शिक्षक एक बार फिर से अपने से ही सवाल कर रहे थे। मैंने उनसे कहा, “कोई बात नहीं। रंग ज़रूर थोड़ा गाढ़ा है लेकिन आयोडीन का घोल सही लग रहा है।”

अब शिक्षक कुछ और खाद्य पदार्थों में स्टार्च जाँचने के लिए आतुर थे। उन्होंने विविध खाद्य सामग्री पर आयोडीन की बूँदें डालकर जाँच की। कुछ बच्चे फिर से नई पत्तियाँ तोड़कर लाए और उन पर भी आयोडीन डालकर देखा लेकिन पत्तियों के रंग में कोई परिवर्तन नहीं दिखाई दिया।

अब शिक्षक कुछ हताश होकर बोल पड़े, “अब क्या करें?” तभी एक सुझाव आया कि पत्ती को मसल दिया जाए और फिर आयोडीन डालकर देखें। इस सुझाव पर भी अमल करके देखा लेकिन रंग नहीं बदला।

उस शिक्षक साथी का सवाल अभी भी जस-का-तस था कि आखिर इस प्रयोग को बच्चों के साथ कैसे करवाएँ। शिक्षक मुझे बता रहे थे कि वे तो अब तक विज्ञान को बस पढ़ा भर रहे थे। मैंने उनकी मायूसी को समझते हुए कहा कि इसमें गलत कुछ भी नहीं है। विज्ञान की तो तासीर ही है, ‘करके देखना।’ अगर हम सवाल नहीं करेंगे तो वह विज्ञान कैसा! अगर इस मामले का ज़िक्र नहीं किया जाता तो इस पर सार्थक चर्चा भी नहीं हो पाती, है न?

पत्तियों में स्टार्च कहाँ है?  
दरअसल, इसे विडम्बना ही कहें कि विज्ञान शिक्षण में करके सीखने की बजाय महज़ पढ़वा देने का माहौल बना हुआ है। किताब के पाठों को मशीनी रूप से बस पढ़ते जाओ। न कोई सवाल, न कोई जाँच-पड़ताल करने की छूट। साथ ही, पाठ्य पुस्तक लेखन के दौरान प्रयोगों को पुस्तक में शामिल करने के पहले उन्हें करके देखने या भली-भाँति पड़ताल कर लेने पर बिलकुल ज़ोर नहीं दिया जाता। पाठ्य पुस्तकों की संरचना ही ऐसी होती जा रही है कि हर प्रयोग के तुरन्त बाद उसके निष्कर्ष भी प्रस्तुत कर दिए जाते हैं। प्रयोग से निष्कर्ष निकालने की ज़रा भी गुंजाइश नहीं छोड़ी जाती।

मैंने शिक्षकों से कहा, “प्रकाश संश्लेषण की क्रिया में स्टार्च बनता है, यह बात तो सही है। इसे जाँचने के लिए प्रयोग भी है। परन्तु इस पाठ्य पुस्तक में इस प्रयोग को सही तरीके से डिज़ाइन नहीं किया गया है। यह प्रयोग कुछ सामग्री और समझ की माँग करता है।”

अब उनके साथ चर्चा की गई कि पत्तियों में स्टार्च को जाँचने के लिए एक अलग तरीका अपनाना होगा। पहले यह समझ लें कि पत्तियों में जो स्टार्च बनता है वह कोशिकाओं में जमा होता है। पौधों की कोशिका की भित्ति अर्थात् दीवार सेल्यूलोज़ की बनी होती है। हम जब पत्ती के ऊपर आयोडीन डालते हैं तो वह कोशिकाओं में मौजूद स्टार्च तक तो पहुँच ही नहीं पाता। साथ ही, पत्तियों में हरा रंग अर्थात् क्लोरोफिल होता है। इस वजह से पत्ती को मसल भी दें तो भी स्टार्च की जाँच नहीं की जा सकती। दरअसल, पत्तियों में स्टार्च की जाँच के लिए पत्ती में से हरे रंग को हटाना बेहद ज़रूरी है।

शिक्षक जानना चाह रहे थे कि आखिर पत्तियों में से हरा रंग हटाने का क्या तरीका है। इस पर उनके साथ सिर्फ विस्तार से चर्चा ही कर पाए क्योंकि आश्रमशाला में ज़रूरी सामग्री का अभाव था। मगर बाद में हमें जब अवसर मिला तो इस प्रयोग को अन्य शिक्षक साथियों के साथ किया।

...पत्तियों में स्टार्च की जाँच  
स्कूली स्तर पर पत्तियों में स्टार्च की जाँच करने के प्रयोग की बुनियाद इस पर टिकी हुई है कि पत्तियों से हरा रंग हटा दिया जाए तो स्टार्च की जाँच आसानी से हो सकती है। हरा रंग हटाना थोड़ा पेचीदा है मगर कुछ सावधानियों को ध्यान में रखकर यह कार्य किया जा सकता है। इसके कुछ चरण हैं जिनका ज़िक्र यहाँ किया जा रहा है।

‘सबसे पहले पेड़-पौधों की पत्तियों को तोड़कर पानी में उबाला जाता है। तपेली में पानी इतना लिया जाए कि पत्तियाँ उसमें डूब जाएँ। अब इन पत्तियों को तब तक उबाला जाए जब तक कि वे नरम न पड़ जाएँ।’

पानी में उबालने की वजह यह है कि पत्तियों की कोशिकाओं की सेल्यूलोज़ भित्ति कमज़ोर हो जाए। ऐसा करने पर पत्तियाँ थोड़ी भुरभुरी हो जाती हैं। पाँच-सात मिनट तक पत्तियों को अच्छे से उबालने के बाद उन्हें निकाल लिया जाता है।

अब इन उबली पत्तियों को स्प्रिट (ऐब्सल्यूट अल्कोहल) में उबालना होता है। वही स्प्रिट जो इंजेक्शन लगाने से पहले और बाद उस जगह पर रूई के फाहे से लगाया जाता है। तो इस प्रयोग के लिए कहीं से स्प्रिट का जुगाड़ करना होगा। यह तो हम जानते हैं कि स्प्रिट ज्वलनशील होता है। इस कार्य को वैसे नहीं किया जा सकता जैसा कि पत्तियों को पानी में उबालने में किया जाता है।

इस चरण में एक कोनिकल फ्लास्क में उबली पत्तियों को आहिस्ते-से डालकर इतना स्प्रिट डालें कि पत्तियाँ उसमें पूरी तरह से डूब जाएँ। अब आगे की प्रक्रिया सावधानी से करना है।

जिस तपेली में पत्तियों को उबाला गया था उसकी ज़रूरत अभी भी पड़ेगी।

कोनिकल फ्लास्क के मुँह पर चित्र में दिखाए अनुसार एक सूती कपड़े की दो-तीन तह बनाकर, उसे गीला कर रखना होगा। अब तपेली में दो-तिहाई पानी भरकर स्टोव या गैस पर उबलने के लिए रख दिया जाता है। तपेली के उबलते पानी में कोनिकल फ्लास्क (जिसमें उबली पत्तियाँ और स्प्रिट है) के मुँह पर गीले सूती कपड़े को कसकर पकड़े रखा जाता है। इस कार्य में काफी सावधानी रखनी होती है। वजह यह कि स्प्रिट एक ज्वलनशील पदार्थ है। तपेली के उबलते पानी में रखे कोनिकल फ्लास्क में स्प्रिट भी उबलने लगता है। थोड़ी देर में पत्तियों से हरा रंग छूटने लगता है। जब पत्तियों से हरा रंग पूरी तरह छूट जाता है तो इनका रंग हल्का भूरा हो जाता है। ज़ाहिर है कि पत्तियों में मौजूद हरा रंग स्प्रिट में घुलनशील होता है। तो यह प्रक्रिया पृथक्करण पर आधारित है। पत्तियों से छूटने वाला हरा रंग स्प्रिट में साफतौर पर दिखाई देता है।

कोनिकल फ्लास्क जब ठण्डा हो जाए तो उसमें से पत्तियों को किसी प्लेट में निकाल लिया जाता है। अब बारी है पत्तियों को आयोडीन के घोल में डालने की। जब इन पत्तियों को आयोडीन के घोल में डुबाया जाता है तो नीला-काला रंग आता है जो स्टार्च के होने की पुष्टि करता है।

स्प्रिट में पत्ती को उबालना: पत्तियों से क्लोरोफिल बाहर करने के लिए पत्ती को पहले पानी में और बाद में स्प्रिट में उबालना पड़ता है। चूँकि स्प्रिट अत्यन्त ज्वलनशील पदार्थ है, कोनिकल फ्लास्क के मुँह पर गीला कपड़ा रखकर उसे उबलते पानी में डुबाना चाहिए।

पत्तियों में प्रकाश संश्लेषण में बाधा पहुँचाने के लिए पत्ती पर काले कागज़ की पट्टी पर कोई आकार काटकर उसे पत्ती पर लगाते हैं। काला कागज़ दो-तीन दिन लगाकर रखने के बाद कागज़ हटाकर, पत्ती को तोड़कर पहले पानी और बाद में स्प्रिट के साथ उबालते हैं। तत्पश्चात् पत्ती की आयोडीन के घोल के साथ जाँच करते हैं। पत्ती पर जहाँ काला कागज़ था वहाँ का रंग नहीं बदलता, शेष पत्ती में स्टार्च की मौजूदगी की वजह से नीलाकाला रंग उभरता है।

चूँकि उस समय आश्रमशाला में स्प्रिट उपलब्ध नहीं था इस वजह से यह प्रयोग नहीं हो पाया। मगर बाद में हमने इसी प्रयोग को इस क्षेत्र के अन्य शिक्षक साथियों के साथ किया। धरमपुर में तो आर्च के दवाखाने से एक साथी स्प्रिट ले आए और इस प्रयोग को कुछ अन्य शिक्षक साथियों ने करके देखा।

जब हम कुछ अन्य आश्रमशालाओं में गए तो कई जगहों पर आयोडीन का घोल खत्म हो चुका था। कुछ शिक्षक पास-पड़ोस के अस्पतालों से घाव पर लगाने वाली दवा टिंचर आफ बेंज़ोइन लेकर आए मगर इससे स्टार्च की जाँच वाला प्रयोग सफल नहीं हो पाया। अभी भी आयोडीन घोल का विकल्प हमारे सामने नहीं था। किसी एक आश्रमशाला में मेरी नज़र वहाँ रखे ‘फस्र्ट एड बॉक्स’ पर पड़ी। मैंने देखा कि उसमें पायोडीन मल्हम था, जिसे अकसर चोट पर लगाया जाता है। जब पायोडीन के खोखे पर पढ़ा तो पाया कि इसमें तो आयोडीन है।

मैंने तुरन्त ही एक कप में पानी लेकर पायोडीन मल्हम की थोड़ी मात्रा को घोला। हालाँकि, पायोडीन आसानी से नहीं घुलता मगर थोड़ी देर तक चम्मच से हिलाते रहें तो वह आंशिक रूप से घुल जाता है। पायोडीन के इस घोल की जब चावल के आटे वगैरह पर जाँच की तो पाया कि यह एकदम कारगर है। कहने की ज़रूरत नहीं कि ...‘जहाँ चाह है वहाँ राह है।’

...अगला कदम  
जब पत्तियों में स्टार्च की उपस्थिति को जाँचने का तरीका हाथ लग गया तो अगला कदम था पत्तियों पर गिरने वाले प्रकाश को नियंत्रित करने का। गुजरात की पाठ्य पुस्तक में कहा गया है कि पत्ती के कुछ हिस्से को मोटे कागज़ से ढँककर चार-पाँच घण्टे बाद जाँचना। दरअसल, चार-पाँच घण्टे वाली बात भी सही नहीं है।

पेड़ पर लगी पत्तियों को दो-तीन दिन के लिए काले कागज़ से ढँकना होता है। इसके बाद उन पत्तियों को तोड़कर उपरोक्त प्रयोग की प्रक्रिया अपनाई जाती है। जिस हिस्से को मोटे काले कागज़ से ढँका जाता है उस पर आयोडीन से जाँचने पर गहरा नीला या काला रंग नहीं आता। हमने चार-पाँच घण्टे तक काले कागज़ से ढँककर पत्तियों में जाँच की तो अपेक्षित नतीजे नहीं मिले।

एक और बात यहाँ कहनी होगी कि कक्षा छठवीं के स्तर पर स्टार्च की जाँच अचानक टपक पड़ती है। इसके पहले पाठ्य पुस्तक में इसका कहीं ज़िक्र भी नहीं है। हमने स्टार्च की जाँच के लिए अनाज, फल, नमक, शक्कर आदि चीज़ों का चुनाव करके उनमें परखने की कोशिश की। इस प्रक्रिया ने विभिन्न चीज़ों में स्टार्च की उपस्थिति या अनुपस्थिति की समझ बनाने में मदद की।

खैर, शिक्षकों के साथ की गई इस सारी मशक्कत के दौरान मैं शिक्षकों के खयालात से वाकिफ हो सका, साथ ही पाठ्य पुस्तकों को कक्षा में पढ़ाने में आने वाली मुश्किलों पर भी गौर कर पाया। इस अनुभव को ‘संदर्भ’ पत्रिका में लिखने का मेरा उद्देश्य यही है कि इस तरह की कठिनाई में रास्ता तलाश रहे शिक्षकों को कुछ मदद मिल पाए।


कालू राम शर्मा: विज्ञान शिक्षण एवं फोटोग्राफी में रुचि। वर्तमान में अज़ीम प्रेमजी फाउंडेशन, उत्तराखण्ड में कार्यरत हैं। देहरादून में निवास।