किशोर पंवार

पिछले वर्ष एक काम के सिलसिले में धारणी जाना हुआ। यह मध्य प्रदेश की सीमा से लगा महाराष्ट्र का एक तालुका है। बस यहीं से मेलघाट फॉरेस्ट रिज़र्व चालू होता है। यह एक टाइगर रिज़र्व है। यह रिज़र्व सूखे पतझड़ वनों (dry deciduous forest) का एक हिस्सा है। यहाँ धावड़ा, कुल, सलाई, पलाश और सागौन के वृक्ष बहुतायत में मिलते हैं। मैंने मेलघाट का नाम बहुत सुन रखा था, शेरों की गिनती के सन्दर्भ में, परन्तु जाना पहली बार हुआ। आदतन पहली फुरसत मिलते ही मैंने परिचितों से कहा, “चलो थोड़ा जंगल में घूम कर आते हैं।”

मकड़ी फूल
मैं और मेरे दो दोस्त मोटर साइकल पर लदकर निकल पड़े मेलघाट के दर्शन करने। धारणी से थोड़ा-सा बाहर निकलते ही छोटी-छोटी सड़कें मिलीं, जिनके दोनों तरफ की पहाडि़यों पर जंगली पेड़ लगे थे। रास्ते में नदी-नाले भी मिले और कुछ खेत-खलिहान भी। चलते-चलते मेरी नज़र अचानक एक सफेद फूल वाले छोटे-से पौधे पर पड़ी। मैंने तुरन्त चालक को रुकने का इशारा किया। पास जाकर देखा कि खेत के पास घूरे के ढेर पर हुरहुर के दो-तीन पौधे उग रहे थे। वर्षों बाद इन्हें देखने का मौका मिला था। पहले गाँवों में, खेतों, मेड़ों और घूरों पर अकसर ही ये पौधे दिख जाते थे। परन्तु अब नहीं मिलते। अँग्रेज़ी में इसे स्पाइडर प्लांट (spider plant) कहते हैं।

आपने पढ़ा ही होगा कि फूल एक रूपान्तरित प्ररोह (shoot) होते हैं। क्योंकि जिस प्रकार तने पर पर्व (node) और पर्व-सन्धियाँ (internode) पाई जाती हैं तथा पर्व पर पत्तियाँ लगी होती हैं, ठीक उसी प्रकार फूल पर भी पर्व और पर्व-सन्धियाँ होती हैं जिस पर पत्तियों की जगह अंखुड़ियाँ (calyx) और पंखुड़ियाँ (corolla) गोल घेरे में लगती हैं। पुष्प एक संघनित प्ररोह है, इसके प्रमाण हमारे आसपास मिलते रहते हैं। स्पाइडर प्लांट एक ऐसा ही बहुत सुन्दर प्रमाण है।

इसके फूल में पर्व और पर्व-सन्धियाँ स्पष्ट दिखाई देती हैं। इसमें फूल का वृन्त फिर उसकी पर्व पर अंखुड़ियाँ और पंखुड़ियाँ लगी होती हैं। इसमें अंखुड़ियों और पंखुड़ियों के चक्र के ऊपर एक स्पष्ट पर्व (internode) दिखाई देता है जिसे नाम दिया गया है एन्थोफोर या पंखुड़ियों को धारण करने वाला वृन्त।

ठीक उसी तरह पंखुड़ियों और पुंकेसरों (androecium) के बीच भी एक पर्व-सन्धि पाई जाती है इसे, एण्डोफोर यानी पुंकेसरों को धारण करने वाला दण्ड (वृन्त) कहा जाता है। और-तो-और इस मकड़ी फूल में पुंकेसरों और जायांग (gynoceium) के बीच भी एक छोटा वृन्त है - इसे गायनोफोर यानी जायांगधर नाम दिया गया है। राखी (passiflora) के फूल में भी एक एंड्रोफोर दिखता है परन्तु पर्व और पर्व-सन्धियों को लेकर जो स्पष्टता हुरहुर में है वो और किसी में भी नहीं। यही विशेषता इसे विशिष्ट और महत्वपूर्ण पौधा बनाती है जहाँ हम फूल की संरचना के सिद्धान्तों, याने यह कथन कि फूल एक रूपान्तरित प्ररोह है, को घटित होते हुए अपनी आँखों से देख सकते हैं। इसे मकड़ी फूल क्यों कहा गया है, यह आप इसके फूल से निकलने वाले पुंकेसरों (मकड़ी की टांगों जैसे लम्बे, पतले, चारों दिशाओं में फैले हुए) के आकार-प्रकार से जान जाएँगे। वनस्पति विज्ञान में इसे क्लिओमी गायनेंड्रा (Cleome-gynandra) कहते हैं।

मेलघाट की मकड़ी
यह तो हुई मेलघाट की एक मकड़ी जिसे हम नकली फूल मकड़ी कह सकते हैं परन्तु यहाँ मेरी मुलाकात एक सबसे बड़ा और मज़बूत जाला बनाने वाली मकड़ी से भी हुई। शाम का धँुधलका हो चला था, अचानक सागौन के ऊँचे-ऊँचे पेड़ों के बीच बड़े-बड़े जाले दिखे। नज़र दौड़ाई तो एक बड़ी-सी पीले रंग की मकड़ी जाले पर बैठी थी। इतनी बड़ी मकड़ी मैंने पहली बार देखी। इसका वैज्ञानिक नाम नेफिला पिलिपेस है। हालाँकि, इसकी खूबियों के चलते इसे कई नामों से पुकारा जाता है। जैसे, गोल्डेन ऑर्ब-वेब स्पाइडर, यह नाम इसे उसके जाल के रंग के कारण मिला है जो सुनहरे रंग का होता है। यह रंग उसमें पाए जाने वाले ज़ैन्थोंयूरेनिक अम्ल के कारण मिलता है। इसे नाइट वुड स्पाइडर भी कहते हैं। यह ऐसा जाल बुनती है जिसे देखकर लगता है जैसे उसने कुछ लिखा हो। इसके जाले की इस खासियत के लिए कुछ लोग इसे राइटिंग स्पाइडर या सिग्नेचर स्पाइडर भी कहते हैं।

यह दुनिया की चुनिन्दा बड़ी-बड़ी मकड़ियों में से एक है। इसकी मादा लगभग 20 से.मी. आकार की होती हैं। जबकि नर, मादा की तुलना में उसका दशमांश भी नहीं होता। नर कुल 5-6 मि.मी. का ही होता है। मकड़ियों की दुनिया में ऐसा अकसर होता है, मादा भरी-पूरी और नर बेचारा मरा-मरा-सा।

इस मकड़ी के जाले लगभग एक मीटर के घेरे में होते हैं जिनको सहारा देने वाले धागे कई मीटर दूर एक पेड़ से दूसरे पेड़ के बीच लगे होते हैं। वयस्क मकड़ियाँ ऐसे जाले पेड़ों के बीच काफी ऊँचाई पर बनाती हैं। तितलियाँ, टिड्डे और प्रेइंग मेंटिस उड़ते-उड़ते इस बड़े जाले में फँसकर उसका शिकार बन जाते हैं। इसका ज़हर एक प्रभावी न्यूरोटॉक्सिन है, परन्तु खतरनाक नहीं। इसके काटने से स्थानीय दर्द या छाले हो जाते हैं जो एक-दो दिन में ठीक भी हो जाते हैं। ऐसा कहा जाता है कि मछुआरे इस मकड़ी के जाले की गेन्द बनाकर पानी में फेंकते हैं जो खुलकर जाल बन जाता है और मछलियाँ मछुआरों की पकड़ में आ जाती हैं।
तो अब आप कभी शेरों को देखने मेलघाट जाएँ तो इन दो मकड़ियों पर भी ज़रा गौर कीजिएगा क्योंकि प्रकृति के इन अद्भुत नज़ारों पर कभी-कभार ही नज़र पड़ती है।


किशोर पंवार:होल्कर साइंस कालेज, इन्दौर में वनस्पतिशास्त्र के प्राध्यापक हैं।