विश्व विजया सिंह                                                                                                                                                [Hindi PDF, 90kB]

भाषा सभी के लिए एक आवश्यक विषय है चाहे वे शिक्षक हों या विद्यार्थी। स्कूलों में पढ़ाई जाने वाली हमारी भाषा की किताबें व्याकरणगत पहलुओं से भरी पड़ी होती हैं, मगर पढ़ने-पढ़ाने का जो तरीका हमारे पास मौजूद है वह कतई रोचक और प्रभावी नहीं है। अगर भाषा शिक्षण में खेल की मदद ली जा सके तो बच्चों की भागीदारी खुद-ब-खुद सुनिश्चित हो जाएगी और साथ ही इसमें आ जाएगा रोमांच और उत्साह।

वार्षिक परीक्षा से पहले जब पुनराभ्यास चल रहा था तो कक्षा-5 में हिन्दी पढ़ाते हुए मैंने पाया कि पूरी पुस्तक में विलोम शब्दों का काफी उपयोग हुआ है। अभ्यास प्रश्नों में कई शब्दों के पर्यायवाची शब्द भी पूछे गए हैं। इसी प्रकार शब्दों के समूह के लिए एक शब्द जानना भी अपेक्षित है।
हमने इस पर एक खेल बनाने का निर्णय लिया। सर्वप्रथम कक्षा के 3-4 बच्चों को सभी पाठों में इस्तेमाल किए गए विलोम शब्द छाँटने का काम सौंपा गया। काफी लम्बी सूची तैयार हो गई। अब उन्हें कागज़ की अलग-अलग पर्चियों पर लिखना था। इस काम में बच्चे बड़े उत्साह से जुट गए।

अगले दिन कक्षा में प्रवेश करते ही जब मैंने बच्चों से कहा, “चलो आज एक खेल खेलते हैं,” तो बच्चे खुशी से उछल पड़े। वार्षिक परीक्षा से पूर्व के गम्भीर-से दिनों में खेल की बात से उन्हें बड़ा सुकून और आनन्द मिला। बच्चों को यह निर्देश दिया गया कि वे अपना बस्ता साथ न लें, कोई कॉपी, किताब, पेन-पेन्सिल कुछ भी नहीं। इस बात से तो उनके चेहरे और भी चमक गए। सब ऊपर सभा-कक्ष में पहुँच गए जहाँ कोई मेज़ कुर्सियाँ नहीं थीं। दरी पर सब गोला बनाकर बैठ गए। अब एक बच्चे ने वह डिब्बा जिसमें सारी पर्चियाँ रखी थीं उठाया और बारी-बारी से सभी बच्चों के सामने गया। सबने एक-एक पर्ची उठा ली। जब सबको एक-एक पर्ची मिल गई तो उन्हें दो मिनट का समय दिया गया जिसमें उन्हें अपनी पर्ची में लिखे शब्द के विलोम शब्द वाली पर्ची के बच्चे को ढूँढ़ कर जोड़ा बनाना था। ताली बजते ही खेल शुरू हो गया और दो मिनट के लिए कमरे में बड़ी तेज़ हलचल और शोर-शराबा शुरू हो गया। बच्चे अपने-अपने जोड़े के साथ हाथ पकड़कर पंक्तिबद्ध खड़े होते गए। जो सबसे आगे थे उन्होंने सबसे कम समय में अपना साथ ढूँढ़ लिया था। धीरे-धीरे बचे हुए विद्यार्थियों की संख्या कम होती गई और खेल आसान होता गया। जब सभी के जोड़े बन गए तो बच्चों को क्रमबद्ध आगे आकर अपने-अपने शब्द बोलने थे। इस प्रकार जिन बच्चों को कुछ शब्दों के विलोम मालूम नहीं थे वे खेल-खेल में ही उन्हें जान गए।

इस प्रकार खेल के ज़रिए मिला विलोम का ज्ञान शायद उन्हें उम्र-भर याद रहे। इस खेल में उनका उत्साह देखते ही बन रहा था जो शायद ही कभी किताबी शिक्षा के दौरान पाया जाता है। इस खेल की पढ़ाई या पढ़ाई के खेल में बच्चों ने खुद को लगाया जो ज्ञान प्राप्त करने के लिए सबसे ज़रूरी होता है।

विलोम शब्दों के इस खेल के बाद हमने ऐसी ही प्रक्रिया भाषा के कुछ और पहलुओं के साथ भी दोहराई। इसी प्रकार का खेल पर्यायवाची शब्दों के लिए भी रचा गया। इस खेल में भी सभी बच्चों को एक-एक पर्ची मिली। इस बार उन्हें निर्देश दिए गए कि एक शब्द बोलने पर उसके पर्यायवाची या समानार्थी शब्द वालों को एक समूह में जुड़ना है। मेरे द्वारा एक शब्द यथा ‘आकाश’ बोलते ही गगन, अम्बर, नभ, अन्तरिक्ष आदि पर्चियों वाले बच्चे कमरे के एक कोने में दौड़कर एकत्र हो गए। इसी प्रकार अन्य शब्दों की पुकार के साथ एक के बाद एक समूह बनते गए। सभी शब्द पूरे होने के बावजूद कुछ बच्चे बीच में बैठे रह गए - यह स्पष्ट था कि उन्हें अपने शब्द के पर्यायवाची मालूम नहीं हैं। ऐसे में अब उन्हें बारी-बारी खड़े होकर अपना शब्द बोलना था। जैसे ही वे शब्द पुकारते उनका पर्यायवाची समूह उन्हें आवाज़ देकर अपने पास बुला लेता।

इससे पता चलता है कि ज़्यादातर बच्चों को अपने शब्दों के पर्यायवाची मालूम थे और जिन्हें नहीं थे, अब हो गए। सभी बच्चों के समूह में जुड़ने पर प्रत्येक समूह को अपने-अपने शब्द बोलने थे। इस प्रकार सभी बच्चे दिए गए शब्दों के पर्यायवाची रूपों से अवगत हो गए।
खेलों का क्रम यहीं खत्म नहीं हो जाता। हम चाहते हैं कि भाषा के कुछ अन्य पहलुओं से सम्बन्धित छोटे खेल भी बनाए जाएँ ताकि उन्हें कक्षा के दौरान ही खेला जा सके।

इसी तरह के कुछ प्रयोग आम दिनों की कक्षाओं में किए गए। बच्चों से कहा गया कि संज्ञा शब्द बताएँ, तो वे बहुत सारे शब्द बोल गए। बोले गए शब्दों में से अब कोई 10 शब्द उन्हें चुनने थे जिन्हें ब्लैक-बोर्ड पर लिखा गया। बच्चों से कहा गया कि इन शब्दों को प्रयोग करते हुए एक कहानी बनाएँ। जल्द ही बच्चों ने अपनी कहानियों की रचना कर ली। कुछ बच्चों की कहानियाँ अपूर्ण रह गईं, जिन्हें गृह-कार्य के रूप में पूरी करके अगली कक्षा में लाना था। इस पूरी प्रक्रिया के दौरान उन संज्ञा शब्दों को लेकर अलग-अलग तरह की कहानियाँ एकत्र हो गईं, जिनमें से कुछ को विद्यालय की पत्रिका में प्रकाशित भी किया गया। इस तरह से बच्चे कहानी बुनने के हुनर से भी वाकिफ हुए।
कहानी रचना की दिशा में बच्चों को प्रोत्साहित करने का एक और प्रयास हमने किया। कतार में बैठे बच्चों से कहा गया कि एक बच्चा एक वाक्य बोलेगा, अगला बच्चा उसी से जोड़ते हुए बात आगे बढ़ाएगा अर्थात्, एक ऐसा वाक्य बोलेगा जिससे कहानी आगे बढ़ सके। इस तरह हर बच्चे को बोलने का मौका मिला। प्रत्येक बच्चे द्वारा बोले गए वाक्य को ब्लैक-बोर्ड पर लिखा गया, और फिर एक बच्चे ने पूरी कहानी को पढ़ा। सभी बच्चे सन्तुष्ट थे, क्योंकि यह उनकी सम्मिलित उपलब्धि थी।

हमने पाया है कि कुछ वर्णाक्षरों के प्रयोग में बच्चों को दिक्कत आती है। उसमें स्पष्टता लाने के लिए एक रोचक गतिविधि तैयार की। बच्चों से कहा गया कि एक पृष्ठ को लम्बाई में तीन भागों में बाँटो। प्रत्येक खण्ड के ऊपर क्ष - त्र - ज्ञ लिखना था। अब ऐसे शब्दों को इन खण्डों में लिखना था जिनमें इन अक्षरों का उपयोग आरम्भ, बीच या अन्त में हुआ हो। अधिकतर बच्चे बड़े उत्साहित होकर यह काम करीब 15-20 मिनिट तक करते रहे। जब देखा कि वे रुकने लगे हैं तो बच्चों से कहा गया कि वे चाहें तो अपनी किताब खोलकर उसमें से भी ऐसे शब्द ढूँढ़कर लिख सकते हैं। बच्चों को मज़ा आ गया, उनके चेहरे खुशी से चमक उठे और एक बार फिर उनकी हरकत तेज़ हो गई। अपने काम में वे इतने मशगूल थे कि उन्हें पता ही नहीं चला कब पीरियड खत्म हो गया। काम शेष रह गया था और वे इसे पूरा करना चाहते थे इसलिए बचे काम को गृहकार्य के रूप में दे दिया गया। वैसे भी ये काम तो था नहीं। उनके लिए तो यह एक खेल था जो घर पर किया जाए या स्कूल में, मज़ा तो आना ही है। इस तरह का प्रयोग अन्य वर्णों के साथ भी किया जा सकता है।

इस प्रकार के कुछ मौलिक खेल या गतिविधियाँ भाषा शिक्षण को आनन्ददायी बनाने में सहायक हो सकती हैं। खासतौर पर जब कक्षा में बच्चों की संख्या ज़्यादा हो तो ये गतिविधियाँ शिक्षण के लिए बहुत प्रभावशाली होती हैं क्योंकि सामूहिक गतिविधि के दौरान समूह बड़े और ज़्यादा संख्या के हो सकते हैं।
इस तरह की गतिविधियों की मदद से दी जाने वाली शिक्षा बच्चों की नज़र में खेल ज़्यादा और शिक्षा कम होती है। बच्चे इसमें पूरे जी-जान से जुड़ जाते हैं और ऐसा प्राप्त ज्ञान चिरस्थाई होता है क्योंकि यहाँ थ्योरी और प्रैक्टिकल साथ-साथ चलते हैं।


विश्व विजया सिंह: विद्या भवन स्कूल में 34 वर्ष कार्यरत रहकर प्रधानाध्यापिका पद से सेवानिवृत। वर्तमान में विद्या भवन सोसायटी, उदयपुर में सेवारत। कविता, कहानी, शिक्षा सम्बन्धी लेख एवं बच्चों के लिए नाटक लिखने में रुचि।

छायांकन: जितेन्द्र ठाकुर: एकलव्य, भोपाल में डिज़ाइन एवं प्रोडक्शन इकाई में कार्यरत।