जे. बी. एस. हाल्डेन

वैज्ञानिक राशनिंग का सूत्र है कि 'हरेक को उसकी ज़रूरत के अनुरूप'। अब हमें यह तो पता है कि मनुष्य को कितने भोजन की ज़रूरत होती है किन्तु हम यह नहीं जानते कि उसे कितने वस्त्रों, मकानों वगैरह की ज़रूरत होती है। मसलन हम जानते हैं कि यदि अण्डरवेयर्स को सप्ताह में एक बार न धोया जाए तो उसमें जुएं पनपने लगती हैं। किन्तु हम कदापि नहीं जानते कि क्या उन्हें प्रतिदिन धोने से स्वास्थ्य संबंधी कोई विशेष लाभ मिलता है।

चूहा वह पहला जंतु है जिसकी भोजन संबंधी जरूरतों को पूर्ण आकलन किया गया था। मनुष्य की ज़रूरतें चूहों के समान नहीं हैं। मसलन यदि चूहों को एस्कॉर्बिक अम्ल यानी विटामिन 'सी' न मिले तो उन्हें इंसानों की तरह स्कर्वी रोग नहीं होता। दूसरी ओर चूहों को अपनी प्रोटीन की खुराक में हिस्टिडीन की ज़रूरत होती है जबकि इंसानों को नहीं होती।
सर्वप्रथम बात तो यह है कि मनुष्य को एक ऐसी खुराक चाहिए जिससे उसे अपना तापमान बनाए रखने और दैनन्दिन कार्य करने के लिए पर्याप्त ऊर्जा मिल सके। भोजन द्वारा प्रदान की गई ऊर्जा कैलोरी में नापी जाती है। कैलोरी की ज़रूरत व्यक्ति द्वारा किए जाने वाले काम पर निर्भर करती है। मसलन बिस्तर पर ही रहने वाले किसी व्यक्ति को 2000 कैलोरी तथा किसी खदान मजदूर को 5000 कैलोरी तक की ज़रूरत हो सकती है। यह ऊर्जा मुख्यतः कार्बोहाइड्रेट्स (जैसे मण्ड व शर्करा) और वसा के ऑक्सीकरण से प्राप्त होती है और यह हमें जाड़ों में गर्म बनाए रखने में विशेष रूप से मददगार होती है।

किसे कितनी ऊर्जा चाहिए।
चूंकि इंसानों की ऊर्जा की ज़रूरतों में इतनी विविधता होती है इसलिए ज़रूरी है कि खुराक की कोई एक ऐसी चीज़ पर राशन न हो जो ऊर्जा संपन्न है। ब्रिटेन में युद्ध के दौरान भी हमें ब्रेड व आन्नु मनचाही मात्रा में उपलब्ध रहे। किन्तु कड़ी मेहनत करने वाले कई मज़दूर ऊर्जा के स्रोत के रूप में काफी वसा का सेवन करते हैं। हमारे यहां बसा की कमी है। खदान श्रमिक जो अधिक मांस की मांग करते हैं उसके पीछे प्रोटीन की जरूरत के अलावा बसा की जरूरत भी हो सकती हैं।
यदि खुराक में कैलोरी की बहुत कमी हो तो व्यक्ति का वज़न कम होने लगता है और अंततः भूख से मृत्यु हो जाती है। बेलसन में कैदियों को मात्र 800 कैलोरी प्रतिदिन मिलती थी। और इतनी कम कैलोरी पर कोई भी व्यक्ति छ: महीने से ज्यादा जीने की उम्मीद नहीं कर सकता, चाहे वह कोई काम न करे।

प्रोटीन की ज़रूरत वृद्धि के लिए होती है, खासकर यदि वह व्यक्ति कम उम्र का हो या गर्भवती हो। धात्री माताओं को शरीर में दूध निर्माण के लिए भी प्रोटीन की जरूरत होती है, जबकि एक सामान्य वयस्क को शरीर में होने वाली टूट-फूट की मरम्मत के लिए प्रोटीन चाहिए। एक सामान्य वयस्क को प्रतिदिन लगभग 70 ग्राम प्रोटीन की ज़रूरत होती है। इसके अलावा प्रोटीन की गुणवत्ता का भी महत्व है क्योंकि प्रत्येक प्रोटीन में समस्त अमीनो अम्ल नहीं पाए जाते। इस लिहाज़ से दूध, चीज़ (cheese), मांस, मछली बेहतर हैं। वनस्पति बीज (जैसे गेहूं) का प्रोटीन इस दृष्टि से अच्छा नहीं है। तो, यद्यपि रोटी में प्रोटीन की काफी मात्रा होती है किन्तु हमें जंतु प्रोटीन की भी जरूरत होती है।
जिन व्यक्तियों को प्रोटीन की कमी होती है वे लंबे समय तक जी तो सकते हैं किन्तु उन्हें नाना प्रकार के रोग हो जाते हैं। इसका एक आम उदाहरण हंगर ड्रॉप्सी है जो शायद रक्त प्लाज्मा में प्रोटीन की कमी से उत्पन्न होता है। इसके चलते खून में से पानी शरीर के ऊतकों में रिस जाता है।

विटामिन किस्म-किस्म के
ऐसे कुछ कार्बनिक पदार्थ होते हैं जिनकी जरूरत हमें बहुत कम मात्रा में होती है। इन्हें विटामिन कहते हैं। मसलन हमें प्रतिदिन मात्र 75 मिलिग्राम विटामिन 'सी' की जरूरत होती है। इसका सर्वोत्तम स्रोत फल हैं। आलू में भी इतना विटामिन 'सी' होता है कि आपको स्कर्वी से बचा सके किन्तु यह उम्दा स्वास्थ्य के लिए पर्याप्त नहीं होता। हमें प्रतिदिन 20 मिलीग्राम निकोटिनिक अम्ल, तीन मिलीग्राम रिबोफ्लेबीन, तथा और भी कम मात्रा में अन्य तकरीबन दर्जन भर विटामिनों की जरूरत होती है। इनमें से किसी का भी घोर अभाव हो जाए तो पेलाग्रा, रतौंधी, रिकेट्स जैसी कोई रोग हो जाएगा किन्तु यदि इनकी थोड़ी कमी हो तो वृद्धि पर नकारात्मक असर पड़ता है तथा स्वास्थ्य खराब रहता है। ये विटामिन तमाम किस्म के भोज्य पदार्थों में पाए जाते हैं। हरी सब्जियों का प्रमुख महत्व ही यह है कि वे इनमें से कुछ विटामिन्स की स्रोत हैं। कुछ विटामिन ऐसे हैं जो कुदरती तौर पर मक्खन में पाए जाते हैं या मार्गेन में कृत्रिम तौर पर मिलाए जाते हैं। यदि आप रोज़ाना एक-सी चीज़ों का सेवन करते रहेंगे तो निश्चित है कि आपको किसी-न-किसी विटामिन की कमी होकर रहेगी।

हमें खनिज लवणों की भी जरूरत होती है। किसी गर्म खदान में काम करने वाला श्रमिक दिन भर में जितना नमक पर्माने में छोड़ता है उसकी पूर्ति करने के लिए उसे प्रतिदिन एक औंस नमक की जरूरत होगी। हमें लगभग डेढ़ ग्राम फॉस्फोरस और एक ग्राम कैल्शियम की भी दैनिक ज़रूरत होती है। और यदि हमारी हड्डियों की वृद्धि तेज़ रफ्तार से हो रही हो, तो और भी ज्यादा कैल्शियम व फॉस्फोरस चाहिए। दूध इन दोनों का अच्छा स्रोत है। हमें लगभग 12 मिलीग्राम लौह की भी ज़रूरत होती है और वह भी उस रूप में जिसे हमारे शरीर में आसानी से सोखा जा सके। कोको और कलेजी लौह के अच्छे स्रोत हैं। लौह के अभाव से एनीमिया हो जाता है। महिलाओं में एनीमिया की स्थिति ज्यादा जल्दी बन जाती है क्योंकि उनमें खून का नुकसान भी ज्यादा होता है।
उपरोक्त सारे आंकड़े लगभग हैं। धात्री व गर्भवती स्त्रियों को मारे पदार्थ ही ज्यादा मात्रा में चाहिए। बढ़ते बच्चों को भी ज्यादा पोषक पदार्थ चाहिए। यह भी नहीं सोचना चाहिए कि इन मामलों में हमारे पास पूरी जानकारी उपलब्ध है। बहरहाल, हमारे पास जितनी जानकारी है वह गंभीर कुपोषण से निपटने के लिए पर्याप्त है। किन्तु अभी भी हम सर्वोत्तम खुराक बता पाने में असमर्थ हैं।

आखिर क्यों ? आइए इस पर विचार करें। कोलम्बिया विश्वविद्यालय (न्यूयॉर्क) में चूहों की एक किस्म है। ये चूहे एक मानक खुराक पर पिछली 58 पीढ़ियों से पल रहे हैं। इन्हें यह छूट है कि इस खुराक को जितनी चाहें खा सकते हैं। मानव मापदण्डों से इसे पर्याप्त खुराक कहा जाएगा। किन्तु जब इस खुराक में विटामिन ‘ए’ की मात्रा बढ़ाकर चौगुनी कर दी गई तो इनमें से नर चूहों की औसत आयु 652 दिन से बढ़कर 723 दिन हो गई और मादा चूहों की औसत आयु 724 दिन से बढ़कर 830 दिन हो गई। इससे भी ज्यादा हैरत की बात यह रही कि मादाओं के बच्चे जानने की अवधि 265 दिन से बढ़कर 369 दिन हो गई। यदि आप 10 दिन को एक वर्ष गिनें तो आपको इंसानों के लिए आंकड़ा मिल जाएगा। इस तरह के प्रयोग स्त्री पुरुषों पर करना व्यावहारिक नहीं किन्तु जब तक सैकड़ों इंसानों को बरसों तक नियंत्रित खुराक पर रखकर नहीं देखा जाता तब तक हमें तथ्य प्राप्त नहीं होंगे। ऐसे प्रयोग बहुत महंगे होंगे किन्तु परमाणु बम और शायद युद्धपोतों से तो सस्ते ही।


जे. बी. एस. हाल्टेन: (1892-1964) प्रमिद्ध अनुवांशिकी विज्ञानी। विकास (Evolution) के सिद्धांत को स्थापित करने में महत्वपूर्ण योगदान। विख्यात विज्ञान लेखक। उनके निबंधों का एक संकलन ‘ऑन बीइंग द राइट साइज' शीर्षक से प्रकाशित हुआ है। प्रस्तुत निबंध 'बॉट इज लाइफ नामक संकलन से लिया गया है।
अनुवादः सुशील जोशी: एकलव्य के होशंगाबाद विज्ञान शिक्षण कार्यक्रम और स्रोत फीचर सेवा से जुड़े हैं। विज्ञान लेखन एवं अनुवाद भी करते हैं।