दिलिप चुघ                                                                                                                                         [Hindi PDF, 393 kB]

अमतौर पर विद्यालयों में भाषा शिक्षण के कुछ खास और बरसों से चले आ रहे अभ्यास ही बच्चों से करवाए जाते हैं। माना यह जाता है कि इन अभ्यासों के ज़रिए बच्चे पढ़ने-लिखने का कौशल सीख जाएंगे।
सरसरी तौर पर, पढ़ना-लिखना सीखने को अक्षरों, शब्दों की पहचान, वर्णमाला को क्रम से बोल पाना, विभिन्न घुमावदार मात्राओं के उच्चारण, अक्षरों से मिलाकर शब्द पढ़ना, और ऐसे ही कुछ वाक्य पढ़ना जैसी गतिविधियों से समझा जाता है। विद्यालयों के भाषा के कालांश में बच्चों को लगातार इन कवायदों में लगे हुए देखा जा सकता है और वे इसी तरह की प्रक्रिया में कक्षा 1 से 5 तक लगे ही रहते हैं। इस प्रकार से कुछ बच्चों में वर्णों को मिलाकर शब्द बनाना, फिर वाक्य बनाकर पढ़ने की आदत बन जाती है। इससे बच्चों को लिखे हुए का अर्थ समझने में कठिनाई होती है।

एक तो पढ़ना-लिखना सीखने-सिखाने के ये तौर तरीके अपने-आप में समस्याग्रस्त हैं और दूसरी परिस्थिति यह कि सुदूर ग्रामीण परिवेश के बच्चों का हिन्दी भाषा के लिखित व मौखिक स्वरूप से आमना-सामना (एक्सपोज़र) नहीं के बराबर होता है। इन बच्चों को अपने विद्यालय के अतिरिक्त घर, परिवार व परिवेश में हिन्दी भाषा बोलने-सुनने, लिखने व लिखी हुई भाषा जैसे - विज्ञापन, अखबार, विभिन्न पत्रिकाएँ, टी.वी, साइन बोर्ड, आदि साधनों के ज़रिए समझने के मौके तुलनात्मक रुप से बहुत कम या नहीं मिलते हैं।
यहाँ हमें दो तरह की समस्याएँ स्पष्ट रुप से नज़र आती हैं -
* विद्यालय में चलने वाली याँत्रिक और निरर्थक कवायदें।
* सुदूर ग्रामीण परिवेश के बच्चों का हिन्दी भाषा के लिखित व मौखिक स्वरुप से परिचय व आधार का अभाव।

इन समस्याओं के सन्दर्भ में कुछ बातें जो कि भाषा शिक्षण में मानी जाती रही हैं और एनसीएफ-2005 भी इस बात की पैरवी करता है कि बच्चा अपनी मातृभाषा पूरे सन्दर्भ में ही सीखता है। 4 से 5 साल का होने तक बच्चा अपने रोज़मर्रा के व्यवहार में उसका भरपूर उपयोग करने में सक्षम भी हो जाता है। अत: कक्षा में भी भाषा शिक्षण हेतु समृद्ध अर्थपूर्ण माहौल होना चाहिए। ऐसा माहौल जो बच्चों को लिखित व मौखिक भाषा की संरचना और उसके उपयोग के तरीकों को समझने के रोचक व अर्थपूर्ण मौके देता हो, जिसमें बच्चे की भाषा का उपयोग हो और बच्चे भी अपनी सक्रिय भागीदारी निभा सकें। दूसरी बात ये कि समझकर पढ़ पाने में अंदाज़ा लगाकर पढ़ पाने की महत्वपूर्ण भूमिका होती है। किसी भाषा के परिपक्व पाठक जब पठन सामग्री का अध्ययन करते हैं तो वे लिखे हुए का अंदाज़ा लगाते हुए आगे पढ़ते जाते हैं। हम स्वयं भी पढ़ते हुए कई दफा यह महसूस करते हैं कि अक्षरों व मात्राओं की बहुत छोटी गलतियाँ हमसे अक्सर छूट जाती हैं। जब हम अक्षरों व मात्राओं पर बहुत केन्द्रित होकर पढ़ना शुरू करते हैं तो हमें लिखे हुए में ये सब गलतियाँ पकड़ में आने लगती हैं।

इसका मतलब यही हुआ कि धारा- प्रवाह पढ़ने में दृश्य-प्रतीकों के उच्चारण से ज़्यादा उस पूरे सन्दर्भ में बन रहे अर्थ की भूमिका होती है। अत: आवश्यक हो जाता है कि भाषा शिक्षण के कालांश में बच्चों के साथ किन्हीं खास शब्दों-अक्षरों के पठन-लेखन के साथ-साथ ऐसी गतिविधियाँ भी हों जिनसे बच्चों का भाषा के लिखित व मौखिक स्वरूप के विविध रूपों से आमना-सामना हो। उन्हें अन्दाज़ा लगाकर पढ़ पाने के ज़्यादा-से-ज़्यादा अर्थवान मौके मिलें।
इसी तरह की समझ के आधार पर सन्दर्भशाला परियोजना। के अन्तर्गत बाराँ ज़िले के आदिवासी अंचल के बच्चों के साथ भाषा (हिन्दी) सीखने-सिखाने को लेकर किए गए कुछ नवाचारों व उनके अनुभवों के बारे में आगे बताया जा रहा है।

* क्रियात्मक चित्रों पर काम: समूह में शिक्षक बच्चों को क्रियात्मक चित्र दिखाते हैं और उन पर बातचीत करते हैं कि चित्र में क्या हो रहा है? या क्या दिख रहा है? बच्चों की बताई बातों में से कुछ रुचिकर बातों को आपसी सहमति बनाकर एक से दो वाक्यों में चित्र के नीचे स्केच पेन से लिखा जाता है। अब शिक्षक इस चित्र को समूह में ऐसी जगह चिपका देते हैं जहाँ बच्चे इसे आसानी से पढ़/देख सकें।

* पहेलियाँ:
स्थानीय समुदाय में प्रचलित पहेलियों में से चयनित पहेलियों को शिक्षक और बच्चे दोनों साथ मिलकर बूझने का प्रयास करते हैं। अब शिक्षक ऐसी पहेलियों को चार्ट पर लिखकर दीवार पर चिपका देते हैं। इसके अलावा दो समूह बनाकर भी पहेलियाँ बूझने का काम करवाया जाता है। इन पहेलियों को भी चार्ट पर लिखकर समूह में प्रदर्शित किया जाता है।
* आज की बात: इस गतिविधि में शिक्षक बच्चों से कोई खास बात या खबर सामूहिक रूप से बताने को कहते हैं। इच्छुक बच्चे अपने घर, गाँव, स्कूल में घटी कोई महत्वपूर्ण घटना बताते हैं। शिक्षक किसी एक या एक से अधिक बात को कक्षा में प्रदर्शित चार्ट पर या ब्लैकबोर्ड पर सभी बच्चों की सहमति से लिख देते हैं। उस पर बातचीत भी की जाती है। जिस बच्चे ने यह बात बताई है, उसका नाम भी नीचे लिख देते हैं।
* छोटी-छोटी कविताएँ: शिक्षक बच्चों को समूह में कविता चित्र दिखाते हैं और बातचीत करते हैं कि चित्र में आखिर क्या हो रहा है? या क्या दिख रहा है? इसके बाद चित्र के साथ लिखी हुई कविता बच्चों को पढ़कर सुनाई जाती है। शिक्षक इस चित्र कविता को ऐसी जगह चिपका देते हैं जहाँ इसे बच्चे देखते हुए आसानी से पढ़/देख सकें।

मौलिक लेखन व सृजन

“भाषा के कालांश में आज मैंने दो बच्चों के साथ सचित्र कहानी कार्ड पर कार्य किया। दोनों बच्चों ने कार्डों को कहानी के अनुसार जमा दिया। एक बच्चे गिर्राज ने कहानी के 8-9 वाक्य लिखे व कहानी भी ठीक बनाई।...........ये बच्चे किसी सन्दर्भ को पढ़कर भी अपने मन से लिखने में कतराते थे। लेकिन अब ये इसमें रुचि लेने लगे हैं।....” -- रामलाल, शोध शिक्षक (12.03.10)
“आज मैंने भाषा के कालांश में पहेली पर काम कराया। बच्चों ने चार पहेलियाँ फेंकी व अन्य बच्चों ने इनके जवाब दिए। सुनील ने समूह में बैठकर पहेली तुरन्त बनाई, “एक आदमी जो गाना गाए, जमे तब बात कर लो।” इस पहेली का जवाब बाकी बच्चे नहीं दे पाए। उसने इसका जवाब बताया ‘मोबाइल’। उसने बताया कि यह मैंने अभी हाथों-हाथ बनाई है।...” -- रेशमा, शोध शिक्षिका (18.3.10)

* पुस्तकालय: बच्चों के स्तर के अनुरूप पुस्तकें बच्चों के बीच रख दी जाती हैं। बच्चे अपनी पसन्द की पुस्तकें उठाते हैं और पढ़ने या देखने की कोशिश करते हैं। जो बच्चे पढ़ना लिखना सीखने की प्रक्रिया में हैं वे चित्र देखकर कहानी और लिखे हुए वाक्यों को अन्दाज़ा लगाकर पढ़ने की कोशिश करते हैं। शिक्षक द्वारा भी इन पुस्तकों में से कोई-कोई कहानी चित्र दिखाते हुए सुनाई जाती है।
इसके अलावा बच्चों के साथ मिलकर नाटक, पपेट शो करना, कहानियाँ-कविताएँ, बच्चों की कितबिया बनवाना आदि गतिविधियाँ भी शिक्षकों द्वारा की गई।

* इन गतिविधियों में किन्हीं खास अक्षरों या शब्दों को किसी खास क्रम में सिखाने का आग्रह नहीं है। यहाँ पर उद्देश्य यही रहता है कि बच्चों को अन्दाज़ा लगाकर पढ़ पाने के ज़्यादा से ज़्यादा अर्थवान व रुचिकर मौके मिलें। खासतौर पर जिनमें उनकी स्वयं की भाषा का भी इस्तेमाल हो और सीखने-सिखाने में बच्चों की सक्रिय भागीदारी हो पाए। इन प्रयासों के अनुभव बड़े ही सकारात्मक रहे हैं।
* भाषा में इन गतिविधियों से कालांश जीवन्त बना है। बच्चों को अभिव्यक्ति के ज़्यादा मौके मिले जिससे उनकी सक्रियता बढ़ी है। बच्चों ने क्रियाचित्रों को देखकर बात बताने व ‘आज की खबर’ में खुलकर भागीदारी की है। पुस्तकों के साथ की गई गतिविधियों में भी बच्चों को उत्साह रहा है। वे नई-नई किताबें चुनते रहे हैं। इन सभी से भाषा सीखना-सिखाना बच्चों और शिक्षक/शिक्षिका दोनों के लिए आनन्दमयी बन पाया है।

* बच्चों की बताई आज की बात, क्रियात्मक वाक्य, निर्देश, पहेलियों, कविताओं, कहानियों आदि को कक्ष में प्रदर्शित करने से एक ओर तो लिखित भाषा के विविध रूपों से बच्चों का आमना-सामना हुआ है; वहीं बच्चों की भाषा को उनकी कक्षा में स्थान मिलने से उनका आत्मविश्वास बढ़ा है।
* अन्दाज़ा लगाकर पढ़ने के प्रयास: इन गतिविधियों पर काम के दौरान ऐसे अनुभव सामने आए जिससे पता चलता है कि बच्चे अब लिखे हुए को अन्दाज़ा लगाकर पढ़ने का प्रयास करने लगे हैं। क्रियाचित्रों पर काम में देखा गया कि जब भी चित्रों के नीचे कुछ लिखा हुआ होता तो बच्चे उसे चित्र से अन्दाज़ा लगाकर पढ़ने का प्रयास करते। इस क्षमता के विकास में क्रियाचित्रों और पुस्तकों पर हुए काम से बहुत मदद मिली है।

कालांश के बाद भी

“... आगे देखता हूँ कि तीन लडकियाँ दीवार पर लगे शब्द-चित्र कार्डों को देखकर शब्द लिख रही हैं। मैंने जब पूछा, “जे का लिख रौ है?” तो लड़कियों ने सभी 12 से 15 शब्दों को ठीक पढ़कर सुनाया।” -- सुभाष, शोध शिक्षक (4.12.2009)
“... अपना काम समाप्त हो जाने पर यह (सरोज) दीवार पर लगे पोस्टर के शब्द पढ़ने लग जाती है।” -- अल्का बंसल, शोध शिक्षिका (4.11.2009)

* कल्पना व मौलिक लेखन: बच्चों ने स्वयं कहानियाँ-कविताएँ बनाने व अपनी बातों को लिखने में रुचि प्रदर्शित की और पूरे उत्साह से काम किया है। बच्चे 8-10 वाक्यों में अपने सपने, कविताएँ, कहानियाँ, घटनाएँ लिखने लगे हैं, किसी विषय पर मन से लेखन कर लेते हैं। वे शिक्षकों से यही काम करवाए जाने की माँग करते हैं। बच्चों ने शिक्षकों के साथ मिलकर कहानी, कविताएँ व पहेलियाँ बनाई हैं। बच्चे अक्सर इन कहानियों कविताओं को दीवार पर लगाए जाने की मांग करते हैं तथा प्रदर्शित किए जाने पर बार-बार पढ़ते देखे गए हैं। बच्चे अपनी कहानी-कविताओं को घर पर ले जाकर दीवारों पर लगाकर पढ़ते हैं। बच्चों के लेखन में बला का आत्मविश्वास नज़र आता हैं। बच्चे अपनी सुनी हुई कहानियों, कविताओं को तत्परता से लिख लेते हैं।

इस प्रकार सन्दर्भशाला परियोजना समूह द्वारा भषा शिक्षण के लिए किए इन प्रयासों से हमने जाना कि भाषा सीखने सिखाने में भाषा के लिखित व मौखिक स्वरूपों का बच्चों से लगातार साक्षात्कार एवं कक्षा में उन्हें मिलने वाली स्वतंत्रता कितनी मूल्यवान होती है।
कक्षा शिक्षण में बच्चे की भाषा का उपयोग उसके आत्मविश्वास को बढ़ावा देता है। विशेष रूप से यह उन अल्पसंख्यक, दलित, आदिवासी समुदाय के बच्चों के लिए और भी महत्वपूर्ण हो जाता है जिनकी भाषा, संस्कृति को मुख्यधारा में वो सम्मान व भागीदारी नहीं मिल पाई है जो कि एक लोकतांत्रिक समाज में होनी चाहिए।

अन्दाज़ा लगाकर पढ़ना

इसी तरह मेवा सहरिया जो कि किताब पढ़ना नहीं जानती उसके पास ‘चूहा-बिल्ली’ नाम की पुस्तक है। यह बालिका स्वयं की अंगुली वाक्य के शब्दों पर फेरते हुए मानो एक दम सही किताब पढ़ रही है। मैं उसके पीछे जाकर खड़ी हो गई। उसे मेरा पता नहीं था। वह ऐसे पढ़ रही थी, “एक ऊन्दरा था। उसके पीछे बिल्ली पड़ गई। वह चून के पीपा के पीछे घुस गया। बिल्ली उसके पीछे भागी। वह दौड़ कर पीपा में कूद गया” अंगुली फेरते हुए। एक ही ध्यान से लगातार “..........बिल्ली चारों तरफ उसे देखती रही। आँखे ऊपर नीचे करते हुए। अचानक चूहा पीपे से बाहर आया। सारा आटे से सकेड़-सकेड़, यह देखकर बिल्ली डर गई। उसने चूहे को नहीं खाया। वहाँ से भाग गई। हँसते हुए।”

—इन्द्रा शोध शिक्षिका (23.11.09)

* बच्चे अपनी मातृभाषा पूरे सन्दर्भ में ही सीखते हैं। 4 से 5 साल का होने तक वे अपने रोज़मर्रा के व्यवहार में उसका भरपूर उपयोग करने में सक्षम भी हो जाते हैं। विद्यालय में पहले दिन से ही बच्चे के लिए पढ़ने की सार्थक सामग्री का होना ज़रूरी है और यह सार्थकता उस बच्चे के सन्दर्भ में आँकी जानी चाहिए जो उक्त सामग्री का पाठक है।


दिलिप चुघ: अलवर (राजस्थान) की इब्तिदा संस्था से सम्बद्ध।
चित्र: इशिता धारप: सृष्टि स्कूल आफ आर्ट, डिज़ाइन एण्ड टेक्नालॉजी, पुणे में डिप्लोमा इन इंटरडिसिप्लिनरी डिज़ाइन की चौथे वर्ष की छात्रा हैं।
नोट: उक्त गतिविधियों की सन्दर्भ सामग्री के रूप में सन्दर्भशाला समूह ने कीर्ति जयराम, सुशील जोशी द्वारा लिखे आलेखों, एन.सी.एफ 2005 आदि पुस्तकों की मदद ली है।