लेखक:   डेनियल ग्रीनबर्ग
अनुवाद: पूर्वा याज्ञिक कुशवाहा:                                                                                                                      [Hindi PDF, 164 kB]

मुझे लगा कि पीली टेप पर हाथापाई की नौबत आ जाएगी। स्कूल पुस्तकालय को व्यवस्थित करने की लम्बी-लम्बी बैठकों की कड़ी में यह एक और बैठक थी। पॉला, जो हमारी पुस्तकालय प्रभारी भी थी, अपने पक्ष को गर्मजोशी से रख रही थी।
“छोटे बच्चों की किताबों को चिन्हित करना होगा। उन पर पीली टेप लगी होनी चाहिए ताकि उन्हें आसानी से पहचाना जा सके।” पॉला सार्वजनिक स्कूल पुस्तकालय की अनुभवी प्रभारी रह चुकी थी और सोच रही थी कि उसे हमारे साथ कुछ नया करना चाहिए। पर पुरानी आदतों से पिण्ड छुड़ाना कठिन होता है।

“हमें उसकी क्या ज़रूरत है?” मैं पूछता रहा। “क्या हमें यह डर है कि बच्चे गलती से वयस्कों की कोई किताब उठा लेंगे?”
बहस चलती रही। पॉला को डर था कि बच्चे अगर संयोग से कोई ऐसी किताब उठा लेंगे जो उन्हें कठिन लगे तो वे हतोत्साहित हो जाएँगे। उसकी नज़र में वयस्कों की दुनिया छोटों के लिए डरावनी जगह थी, और स्कूल को उन्हें उससे आमना-सामना होने से उपजी कुण्ठा और कष्ट से बचाना चाहिए।
हममे से अधिकांश के लिए पीली टेप बच्चों को अपनी महत्ता दर्शाने का एक और प्रतीक था। इस बात का एक और उदाहरण कि हम वयस्क वास्तविक दुनिया पर काबिज़ होने और उससे जीत लेने की बच्चों की दृढ़ इच्छा-शक्ति को कितना गलत पढ़ लेते हैं।
महीनों की गुरु-गम्भीर बहसबाज़ी के बाद आखिरकार मत संग्रह किया गया। पीला बिल्ला हारा। पॉला ने इसके फौरन बाद, स्कूल खुलने के पहले ही त्यागपत्र दे दिया। उसे क्रियाशील पुस्तकालय को देखने का मौका ही नहीं मिला।

खैर, दरअसल ‘क्रियाशील’ नहीं, बल्कि कहें ‘निष्क्रियाशील’। हमारे लिए पुस्तकालय का विचार सरल था: वह एक उम्दा निष्क्रिय संसाधन है, ज्ञान का ऐसा सागर जहाँ सभी ज्ञान पिपासू डुबकी लगा सकते हैं (इस मामले में मानक मुहावरे पूरी तरह लागू होते हैं)।
हमने जो स्कूली पुस्तकालय देखे थे, उनका सबसे दुखद पक्ष था उनकी अनुर्वरकता। अव्वल तो हम यह नहीं चाहते थे कि सभी किताबें एक अलग कक्ष या हिस्से में हों जिसे ‘पुस्तकालय’ कहा जाए। उसमें मुर्दाघर की ध्वनि थी: एक ऐसी अलग-थलग जगह जिसमें सबको बिना हिले-डुले बैठना और फुसफुसाना पड़ता है, जहाँ लोग सावधानी से चलते हैं और पुस्तकालय प्रभारी की पैनी नज़र से भयभीत रहते हैं। हम चाहते थे कि किताबें हर जगह हों, आरामदेह, सुखद, सुलभ जिन्हें उल्टा-पल्टा-पढ़ा जा सके, न कि सिर्फ अपने नाम पर ले जाया जा सके।

हम चाहते थे कि बच्चे खुद किताबों को आलों से निकालें। ढेरों किताबों को। हमें यह डर नहीं था कि पुस्तकालय अस्त-व्यस्त हो जाएगा।
पर हमारी प्रमुख इच्छा यह थी कि हमारे पास ढेरों अच्छी किताबें हों। ऐसी जिन्हें लोग पसन्द करें और जिनकी उन्हें परवाह हो।

इसके लिए हमें एक नई तरह की अधिग्रहण नीति बनानी पड़ी। सामान्य तरीका हमें सही नहीं लगा। हमें इस बात पर कभी पूरा विश्वास नहीं हुआ कि जिस व्यक्ति की पुस्तकों में रुचि होगी, उसे ज्ञान के प्रत्येक क्षेत्र में उपलब्ध बेहतरीन पुस्तकों को ढूँढ़ने के तरीके आते होंगे। हम चाहते थे कि प्रत्येक क्षेत्र से प्रेम करने वाले उसके नायाब नगीनों को ढूँढ़ कर लाएँ।

सो, ऐसी व्यवस्था ही की गई। यह बड़ा आसान और सस्ता भी रहा। हमने लोगों से अनुरोध किया कि वे अपने व्यक्तिगत पुस्तकालयों का कुछ भाग हमें दान दें। ये वे किताबें थीं जिन्हें लोगों ने कई सालों के दौरान चुना था, जिन्हें वे पसन्द इसलिए करते थे क्योंकि वे रोचक, उपयोगी व विशिष्ट थीं। सडबरी वैली का पुस्तकालय ‘विशेषज्ञों’ की फौज की मदद से विकसित किया गया और अब भी यही परम्परा जारी है।

बेशक, सभी किताबें अच्छी नहीं हैं। क्या किसी भी पुस्तकालय में होती हैं? किसी भी किताब को उठा लें, और जल्द ही आप उसकी विशिष्टताओं पर उतनी ही गर्मागर्म बहस छेड़ सकते हैं जितनी पीली टेप को लेकर हमने की थी। परन्तु कम-से-कम हमारे पास जो पुस्तकें हैं, उन्हें उन लोगों ने पढ़ा और पसन्द किया था, जिन्होंने उन्हें चुना था।

जल्दी ही स्कूल भवन किताबों से भर गया। साल-दर-साल, कक्ष-दर- कक्ष हमारे नए अधिग्रहण को रखने के लिए नए आले जुड़ते रहे।
बल्कि यदाकदा हम किताबों के सागर में लगभग डूब ही जाते हैं। तब हम किताबों की बिक्री आयोजित करते हैं।

कभी-कभार हमें कुछ ज़्यादा ही विचित्र दान मिल जाता है, ऐसी पुस्तकें मिल जाती हैं जो कुछ अधिक ही रहस्यमय होती हैं। जैसे मैसाच्यूसेट्स के सामान्य कानूनों की पूरी  शृंखला, जिसके साथ विस्तृत टीकाएँ भी हैं। पीली टेप सहित या उसके बिना भी यह हमारे लिए उलटने-पलटने की सामग्री नहीं थी (ना ही गम्भीर पठन सामग्री)। या फिर कई बेहद उम्दा तकनीकी वैज्ञानिक पत्रिकाएँ भी हमारे लिए उपयुक्त न थीं। हमें ऐसी पुस्तकों से निपटने की व्यवस्था या तो उन्हें बेचकर या फिर किसी और को दान देकर करनी पड़ती थी। पर हम जो कुछ पाते हैं उसका अधिकांश हिस्सा आलों में रखते हैं। और बच्चे उन्हें उलटते-पलटते रहते हैं।

बेशक, जब किसी को ऐसी किताबों की ज़रूरत पड़ती है जो हमारे पास न हों, तो हम उन्हें खरीदते भी हैं। ऐसे में वे विशेष-व्यय बन जाते हैं।
सातवें दशक के मध्य में हमें डाक से राज्य शिक्षा विभाग का एक पत्र मिला। उसमें एक चेक था। हुआ यों कि अंकल सैम ने शिक्षा की मदद की। अपनी कई उदार चेष्टाओं में से एक के तहत देशभर के स्कूलों को किताबें खरीदने के लिए वित्त देने का निर्णय लिया। मेरा अनुमान है कि काँग्रेस (अमरीकी संसद की राज्य सभा) ने हिसाब लगाया होगा कि किताबें अच्छी होती हैं और अगर अलमारियों में अधिक किताबें होंगी तो स्कूल बेहतर बन पाएँगे। मुझे लगता है कि प्रकाशकों ने शर्तिया इसका विरोध नहीं किया होगा।

बहरहाल, हमारे लिए यह स्वर्ग से टपका अमृत था, चाहे हमें उसकी ज़रूरत हो या नहीं। हमारी पहली प्रतिक्रिया थी कि चेक वापस लौटा दिया जाए, पर यह समझदारी तो न थी। ‘दानकी बछिया के दाँत नहीं गिने जाते,’ सो हमने इस राशि का उपयोग स्कूल बैठक में आने वाले पुस्तकों के विशेष-व्यय वाले अनुरोधों के लिए किया। राष्ट्रपति आते-जाते रहते हैं और राजनीति बाएँ-दाएँ, आगे-पीछे डोलती रहती है। पर चेक आते रहते हैं।

और पीली टेप का क्या हुआ? हाँ, हमने कुछेक नियम ज़रूर बनाए। जो किताबें स्वयं को स्पष्टत: नन्हे-मुन्नों के लिए होने की घोषणा करती थीं उन्हें सबसे दूरस्थ कक्ष के ऊपरी आलों में नहीं रखा जाता। आखिर उन्हें छोटे बच्चों की पहुँच में होना था, ताकि सीढ़ी की मदद से उन तक पहुँचने की ज़रूरत न हो।
पर टेप नहीं लगाए गए। ऐसी सम्भावना बिलकुल नहीं थी कि कोई वयस्क किसी बच्चे को बिना टेप लगी किताब पढ़ते देख उससे कठोरता से कहे, “तुम इसके साथ क्या कर रहे हो छोटे बच्चे!”
और ऐसी सम्भावना भी नहीं रही कि किसी बड़े छात्र को किसी अच्छी ‘बच्चों की किताब’ को चोरी-छिपे देखते हुए, उस किताब पर चिपके टेप के कारण शर्मिन्दा होना पड़े।


डेनियल ग्रीनबर्ग: सडबरी वैली स्कूल के संस्थापक सदस्य। विद्यालय संगठन के मॉडल पर इनकी अनेक किताबें प्रकाशित हो चुकी हैं। कोलम्बिया विश्वविद्यालय में भौतिकशास्त्र के प्राध्यापक रहे हैं।
अँग्रेज़ी से अनुवाद: पूर्वा याज्ञिक कुशवाहा: लेखन एवं अनुवाद कार्य में मसरूफ हैं। एकलव्य के लिए कई शैक्षिक ग्रन्थों का हिन्दी में अनुवाद। जयपुर में निवास।
यह लेख, फ्री एट लास्ट, द सडबरी वैली स्कूल, से साभार।